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झारखंड की अधिकांश जनजातियों में प्रचलित सामाजिक संरचना के संदर्भ में ‘गोत्र’ (Gotra / Clan) की प्रमुख विशेषता क्या है?
- बहिर्वाही (Exogamous) – अर्थात एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होता है
- अंतर्विवाही (Endogamous) – अर्थात केवल अपने ही गोत्र में विवाह अनिवार्य होता है
- गोत्र का निर्धारण माता के वंशक्रम से होता है
- गोत्र का सामाजिक संरचना में कोई महत्व नहीं होता
Explanation:
- झारखंड की जनजातीय सामाजिक संरचना में गोत्र का अत्यधिक महत्व है ।
- सभी जनजातीय गोत्र बहिर्वाही (Exogamous) होते हैं, जिसका अर्थ है कि एक ही गोत्र (सगोत्र) के पुरुषों और महिलाओं के बीच विवाह संबंध पूरी तरह से वर्जित होता है ।
झारखंड के पारंपरिक जनजातीय समाज में युवाओं को अपनी संस्कृति, परंपराओं, कला और सामाजिक दायित्वों का प्रशिक्षण देने वाली संस्था ‘युवागृह’ (Youth Dormitory) के संदर्भ में कौन-सा युग्म सही सुमेलित है?
- उराँव – धुमकुड़िया | मुंडा – गितियोड़ा | संथाल – घोटुल
- उराँव – घोटुल | मुंडा – धुमकुड़िया | संथाल – गितियोड़ा
- उराँव – गितियोड़ा | मुंडा – घोटुल | संथाल – धुमकुड़िया
- उराँव – जोदड़पा | मुंडा – चाबड़ी | संथाल – टंडा
Explanation:
- युवागृह जनजातीय सामाजिक प्रशिक्षण केंद्र होते हैं ।
- उराँव जनजाति में इसे धुमकुड़िया, मुंडा एवं हो जनजाति में गितियोड़ा तथा संथाल जनजाति में इसे घोटुल कहा जाता है ।
संथाल समाज में प्रचलित सबसे कठोर सामाजिक और जातीय बहिष्कार की सजा, जिसे ‘बिटलाहा’ (Bitlaha) कहा जाता है, मुख्य रूप से किस अपराध के लिए दी जाती है?
- गंभीर यौन अपराध तथा समगोत्रीय (निषिद्ध) विवाह या यौन संबंध बनाने पर
- गाँव की संपत्ति की चोरी करने पर
- कृषि कार्यों में भाग न लेने पर
- पारंपरिक त्योहारों में अनुपस्थित रहने पर
Explanation:
- बिटलाहा संथाल समाज की सबसे कठोर सजा है, जो सामाजिक बहिष्कार के रूप में लागू की जाती है ।
- यह सजा मुख्यतः अगम्यगमन (Incest) अथवा सगोत्र यौन संबंध/विवाह जैसे सामाजिक और यौन नियमों का उल्लंघन करने पर दी जाती है ।
झारखंड की बिरहोर (Birhor) जनजाति के सामाजिक जीवन और आवास संरचना के संदर्भ में ‘टंडा’ (Tanda) और ‘कुंभा’ (Kumba) क्या हैं?
- ‘टंडा’ उनकी छोटी बस्ती या गिरोह को तथा ‘कुंभा’ पत्तों व झाड़ियों से बनी उनकी झोपड़ी को कहते हैं
- ‘टंडा’ उनका पारंपरिक नृत्य है और ‘कुंभा’ उनका मुख्य भोजन है
- ‘टंडा’ उनके ग्राम प्रधान का पद है और ‘कुंभा’ उनकी धार्मिक पूजा स्थल है
- ‘टंडा’ उनकी वधु-मूल्य प्रथा है और ‘कुंभा’ उनका गोत्र है
Explanation:
- घुमंतू और आदम जनजातीय समूह बिरहोर की सामाजिक संरचना में उनकी बस्तियों को ‘टंडा’ कहा जाता है ।
- टंडा में रहने वाले बिरहोर परिवार जिन अस्थाई, शंकुधारी झोपड़ियों में निवास करते हैं, उन्हें ‘कुंभा’ या ‘कुढ़हर’ कहा जाता है ।
झारखंड की विभिन्न जनजातियों में प्रचलित ‘वधु-मूल्य’ (Bride Price) के पारंपरिक स्थानीय नामों के संदर्भ में कौन-सा विकल्प सही सुमेलित है?
- संथाल – पोन (Pon) | हो – गोनोंग (Gonong) | उराँव – नकद/गाँव की परंपरा अनुसार
- संथाल – झाड़ | हो – डौली | उराँव – पोन
- संथाल – गितियोड़ा | हो – हरजी | उराँव – पोन
- संथाल – पोनटी | हो – सूत | उराँव – परण
Explanation:
- जनजातीय समाज में वर पक्ष द्वारा वधु पक्ष को दिया जाने वाला उपहार या मूल्य ‘वधु-मूल्य’ कहलाता है ।
- संथालों में वधु-मूल्य को पोन तथा हो जनजाति में इसे गोनोंग (या पोन) कहा जाता है ।
झारखंड के जनजातीय समाज में विवाह के विविध रूपों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए तथा सत्य कूट का चयन कीजिए:
1.’सेवा विवाह’ में वर को वधु-मूल्य न दे पाने की स्थिति में ससुर के घर रहकर सेवा करनी पड़ती है ।
2.’हठ विवाह’ (इतूत/निरबोलोक) में लड़की जबरन भावी पति के घर जाकर रहने लगती है ।
3.’क्रय विवाह’ झारखंड की जनजातियों में सबसे अधिक प्रचलित और सर्वमान्य विवाह का रूप है ।
- 1, 2 और 3 सभी
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
Explanation:
- तीनों कथन सत्य हैं; क्रय विवाह (आयोजित विवाह) सबसे प्रचलित रूप है ।
- सेवा विवाह में वधु-मूल्य के बदले श्रम दिया जाता है तथा हठ विवाह में लड़की अपनी पसंद के लड़के के घर जबरन जाकर बस जाती है ।
उराँव जनजाति की प्रसिद्ध युवागृह ‘धुमकुड़िया’ के सामाजिक संगठन के संदर्भ में कौन-सा कथन असत्य है?
- धुमकुड़िया में लड़कों और लड़कियों दोनों के लिए एक ही सांझा भवन होता है और उनका कोई अलग विभाजन नहीं होता
- युवकों के लिए बने शाखा भवन को ‘जोंख-एड़पा’ कहा जाता है
- युवतियों के लिए बने शाखा भवन को ‘पेल-एड़पा’ कहा जाता है
- जोंख-एड़पा के नियंत्रण एवं संचालन के प्रमुख को ‘धांगर महतो’ कहा जाता है
Explanation:
- कथन A असत्य है क्योंकि धुमकुड़िया में लड़कों और लड़कियों के लिए पृथक-पृथक भवन (एड़पा) होते हैं ।
- लड़कों के लिए ‘जोंख-एड़पा’ तथा लड़कियों के लिए ‘पेल-एड़पा’ होता है, जिनकी देखरेख अलग-अलग अधिकारियों द्वारा की जाती है ।
झारखंड की खड़िया (Kharia) जनजाति को उनकी सामाजिक व्यवस्था और विकास स्तर के आधार पर मुख्य रूप से किन तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है?
- पहाड़ी खड़िया, ढेलकी खड़िया और दूध खड़िया
- उत्तरी खड़िया, दक्षिणी खड़िया और केंद्रीय खड़िया
- जंगली खड़िया, मैदानी खड़िया और नगर खड़िया
- राजा खड़िया, प्रजा खड़िया और सरदार खड़िया
Explanation:
- खड़िया समाज तीन सामाजिक-आर्थिक स्तरों में विभाजित है: पहाड़ी खड़िया (सबसे पिछड़ा वर्ग), ढेलकी खड़िया और दूध खड़िया (सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से सबसे उन्नत वर्ग) ।
झारखंड के सदान और जनजातीय समुदायों के बीच सांस्कृतिक एवं सामाजिक संबंधों को दर्शाने वाले ‘सहियारी’ (Sahiyari) प्रथा का मुख्य अर्थ क्या है?
- दो अलग-अलग परिवारों या समुदायों के व्यक्तियों के बीच जीवनभर के लिए बनाई गई औपचारिक अनुष्ठानिक मित्रता
- गाँव के प्रमुख द्वारा वसूला जाने वाला व्यापारिक कर
- विवाह के समय निभाई जाने वाली एक गुप्त रस्म
- सामूहिक रूप से की जाने वाली शिकार परंपरा
Explanation:
- झारखंडी समाज की एक अनूठी पहचान ‘सहियारी’ या ‘मितान’ प्रथा है ।
- इसके तहत दो व्यक्ति (आदिवासी और सदान भी हो सकते हैं) एक अनुष्ठान के माध्यम से जीवनभर के लिए धर्म-भाई या धर्म-बहन (सहिया) का संबंध जोड़ते हैं ।
झारखंड की सदान सामाजिक संरचना में ‘गोत्र’ और ‘जातीय व्यवस्था’ के संदर्भ में कौन-सा कथन सत्य है?
- सदान समाज हिंदू वर्ण व्यवस्था और विभिन्न जातियों/उपजातियों में विभाजित है, जिनमें पितृसत्तात्मक गोत्र व्यवस्था पाई जाती है
- सदानों में जाति व्यवस्था पूरी तरह से अनुपस्थित होती है
- सदानों में केवल मातृसत्तात्मक गोत्र ही मान्य होते हैं
- सदान समाज में जातीय पंचायतों का कोई अस्तित्व नहीं होता
Explanation:
- सदान समाज में गैर-जनजातीय मूल निवासी आते हैं ।
- इनकी सामाजिक संरचना जातियों (जैसे महतो, नाई, कुम्हार, सोनार, अहीर आदि) एवं वर्ण-व्यवस्था पर आधारित है, जो पितृसत्तात्मक परंपरा का पालन करती है ।
