सूरदास
- जन्म तिथि: संवत् 1535 (सन 1478 ई.)
- जन्म स्थान: दो मत प्रचलित हैं:
- सीही (दिल्ली के निकट): आधुनिक विद्वानों (जैसे डॉ. नगेंद्र, गणपतिचंद्र गुप्त) द्वारा अधिक प्रामाणिक माना गया है।
- रुनाक्ता/रेणुका क्षेत्र (आगरा-मथुरा मार्ग): आचार्य रामचंद्र शुक्ल और श्यामसुंदर दास द्वारा समर्थित।
- साहित्यिक युग: भक्ति काल (सगुण भक्तिधारा की कृष्णभक्ति शाखा)।
- दीक्षा गुरु: महाप्रभु वल्लभाचार्य (वल्लभ संप्रदाय/पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक)।
- निवास स्थान: गऊघाट (आगरा-मथुरा के बीच), जहाँ रहकर वे श्रीनाथ जी के मंदिर में कीर्तन करते थे।
- उपाधि / उपनाम:
- पुष्टिमार्ग का जहाज (यह नाम वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने सूरदास जी के निधन पर दिया था: “पुष्टिमार्ग को जहाज़ जात है सो जाको कछु लेना होय सो लेउ”)।
- वात्सल्य रस का सम्राट (आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार)।
- खंजन नयन (अमृतलाल नागर ने इनके जीवन पर इसी नाम से उपन्यास लिखा)।
- भावाधिपति, अष्टछाप के सर्वश्रेष्ठ कवि।
- अष्टछाप में स्थान: विट्ठलनाथ द्वारा 1565 ई. में स्थापित ‘अष्टछाप’ के 8 कवियों में सूरदास जी का स्थान सर्वोपरि है।
- नेत्रहीनता का विवाद: सूरदास जी जन्मांध (जन्म से अंधे) थे या बाद में अंधे हुए, इस पर विद्वानों में मतभेद है। उनके बाल-लीला और रूप-सौंदर्य के सूक्ष्म वर्णन को देखकर अधिकांश विद्वान उन्हें जन्मांध नहीं मानते।
- सूरदास जी द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न मानी जाती है, परंतु काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अनुसार उनके 3 ग्रंथ ही प्रामाणिक और उपलब्ध हैं:
- 1. सूरसागर (मुख्य एवं सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ):
- यह श्रीमद्भागवत पुराण के 12 स्कंधों पर आधारित है।
- इसमें लगभग 1,00,000 पद बताए जाते हैं, परंतु वर्तमान में लगभग 4,930 पद ही उपलब्ध हैं।
- इसका सबसे महत्वपूर्ण अंश ‘भ्रमरगीत’ (दशम स्कंध) है।
- 2. सूरसारावली:
- इसमें कुल 1107 छंद/पद हैं।
- यह ‘सूरसागर’ का सारांश/अनुक्रमणिका माना जाता है।
- इसकी रचना ‘संसार रूपी होली’ के रूपक पर की गई है।
- 3. साहित्य लहरी (1550 ई.):
- इसमें कुल 118 दृष्टिकोण पद (गूढ़ अर्थ वाले पद) संकलित हैं।
- यह मुख्य रूप से रस, अलंकार और नायिका-भेद का निरूपण करने वाला ग्रंथ है।
- परीक्षा हेतु विशेष: इस ग्रंथ के अंत में सूरदास जी ने अपने वंशवृक्ष का उल्लेख किया है, जिसके अनुसार वे चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो के रचयिता) के वंशज सिद्ध होते हैं।
- 1. सूरसागर (मुख्य एवं सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ):
- अन्य चर्चित/अप्रकाशित रचनाएँ:
- नल-दमयंती (अप्राप्य)
- ब्याहलो (अप्राप्य)
- पद संग्रह
- प्रसिद्ध काव्य एवं कविताएँ
- वात्सल्य एवं बाल-लीला के प्रसिद्ध पद:
- “मैया मोहिं ऊपजति बहुत खिजायौ…”
- “मैया कबहिं बढ़ेगी चोटी…”
- “यशोदा हरि पालने झुलावै…”
- “किलकत कान्ह घुटरुवनि आवत…”
- भ्रमरगीत के प्रसिद्ध पद (सगुण-निर्गुण विवाद):
- “ऊधो, तुम हौं अति बड़भागी…” (NCERT कक्षा 10 में संकलित)
- “अँखियाँ हरि दरसन की भूखी…”
- “निरगुन कौन देस को बासी…”
- “संदेसो देवकी सो कहिये…”
- विनय एवं दास्य भाव के पद (आरंभिक रचनाएँ):
- “मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै…”
- “अब प्रभु कृपा करि मोहि पारे…”
- वात्सल्य एवं बाल-लीला के प्रसिद्ध पद:
- सम्राट अकबर से भेंट: ऐसा माना जाता है कि मुगल सम्राट अकबर ने सूरदास जी की ख्याति सुनकर मथुरा के निकट उनसे भेंट की थी और उनका संगीत व पद सुने थे।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कथन:
-
“सूरदास जी वात्सल्य और श्रृंगार का कोना-कोना झाँक आए हैं।”
“सूरदास जी की कविता में जो माधुर्य और सरसता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।”
-
- निधन की तिथि: संवत् 1640 (सन 1583 ई.)
- स्थान: पारसोली (गोवर्धन के पास, मथुरा, उत्तर प्रदेश)।
- अंतिम समय: निधन के समय गोस्वामी विट्ठलनाथ जी ने गुरुमंत्र के रूप में सूरदास जी से अंतिम पद सुना था:
- “खंजन नैन रूप रस माते…”
- भ्रमरगीत परंपरा के प्रवर्तक: हिंदी साहित्य में ‘भ्रमरगीत काव्य परंपरा’ का मूल प्रवर्तक सूरदास जी को ही माना जाता है। इसमें गोपियों और उद्धव के संवाद के माध्यम से ज्ञान/निर्गुण पर भक्ति/सगुण की विजय दिखाई गई है।
- मुख्य रस: वात्सल्य रस (प्रधान) एवं शृंगार रस (संयोग व वियोग दोनों)।
- भाषा: शुद्ध एवं साहित्यिक ब्रजभाषा (सूरदास जी ने ब्रजभाषा को काव्य भाषा के रूप में शीर्ष पर पहुँचाया)।
- शैली: गेय पद शैली (संगीत एवं राग-रागिनियों पर आधारित)।
- NCERT संदर्भ:
- कक्षा 10 (क्षितिज भाग-2): ‘सूरदास के पद’ (भ्रमरगीत से उद्धृत 4 पद – “ऊधो तुम हौं अति बड़भागी…”)
- कक्षा 6/8: बाल-लीला से जुड़े पद।
देव
- पूरा नाम: देवदत्त
- जन्म वर्ष: संवत् 1730 (लगभग 1673 ई.)
- जन्म स्थान: इटावा (उत्तर प्रदेश)
- जाति: यजुर्वेदीय द्विवेदी (कान्यकुब्ज ब्राह्मण)
- साहित्यिक परंपरा: रीतिकाल की ‘रीतिबद्ध’ काव्य-धारा के श्रेष्ठ आचार्य व कवि।
- व्यक्तित्व: देव आश्रयदाता राजाओं की चाटुकारिता से दूर रहने वाले स्वाभिमानी, रसिक और बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि थे। वे किसी एक राजा के यहाँ टिककर नहीं रहे, इसलिए उन्हें अनेक आश्रयदाताओं के दरबार में जाना पड़ा।
- 2. प्रमुख आश्रयदाता – देव जी ने जीवन भर अनेक राजाओं और नवाबों का आश्रय प्राप्त किया, जिनका उल्लेख परीक्षाओं में बार-बार आता है:
-
- आज़मशाह (औरंगज़ेब के पुत्र) — इन्हें देव ने अपना पहला ग्रंथ ‘भाव विलास’ सुनाया था।
- भोगिलाल — देव को सबसे अधिक सम्मान और धन भोगिलाल के दरबार में मिला (भोगिलाल ने इनकी रचनाओं से प्रसन्न होकर लाखों की संपत्ति दान की थी)।
- उद्योतसिंह (ओरछा के राजा)
- अली अकबर ख़ाँ
- भवानीदत्त वैश्य
- प्रमुख रचनाएँ – आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार देव के रचित ग्रंथों की संख्या 25 से 72 तक मानी जाती है। परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ निम्नलिखित हैं:
- (A) लक्षण एवं रसबोध ग्रंथ
- भाव विलास (1689 ई.): देव का प्रथम ग्रंथ (16 वर्ष की अवस्था में रचित)। इसमें रस और भानुदत्त की ‘रसतरंगिणी’ का प्रभाव है।
- अष्टयाम (1700 ई.): नायक-नायिका के आठों पहरों के विलास का वर्णन।
- भवानी विलास: भवानीदत्त वैश्य के आश्रय में लिखा गया ग्रंथ।
- राग रसायन / शब्द रसायन: काव्य-शास्त्रीय ग्रंथ (छंद, अलंकार, रस, शब्द-शक्ति का निरूपण)।
- रस विलास: राजा भोगिलाल के आश्रय में रचित।
- कुशल विलास: फफोला के राजा कुशलसिंह के नाम पर।
- (B) अन्य प्रसिद्ध ग्रंथ
- जाति विलास: विभिन्न जातियों और प्रदेशों की स्त्रियों के सौंदर्य का अद्भुत वर्णन।
- प्रेम तरंग: प्रेम के विभिन्न रूपों का विशद वर्णन।
- सुजान विनोद: सुजानमणि के आश्रय में रचित।
- सुखसागर तरंग: देव की काव्य-प्रतिभा का निचोड़ (इसमें उनके सर्वोत्तम कवित्त-सवैये संकलित हैं)।
- देवशतक: आध्यात्मिक एवं वैराग्य पर आधारित ग्रंथ।
- देव चरित्र: श्रीकृष्ण के जीवन पर आधारित प्रबंध काव्य।
- देव माया प्रपंच: संस्कृत के नाटक ‘प्रबोध चंद्रोदय’ का ब्रजभाषा पद्य में अनुवाद (गीतिनाट्य)।
- प्रसिद्ध कविताएँ एवं पाठ्यपुस्तक संदर्भ (NCERT Reference)
- सवैये एवं कवित्त:
- NCERT संदर्भ: कक्षा 10वीं की हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में देव के प्रसिद्ध सवैये और कवित्त संकलित हैं।
- पायनि नूपुर मंजु बजैं… (सवैया): इसमें श्रीकृष्ण के राजसी और मनमोहक बाल-रूप का अनुपम वर्णन है।
- डार द्रुम पालना, बिछौना नव पल्लव के… (कवित्त): इसमें ‘वसंत’ ऋतु को एक बालक के रूप में मानवीकृत करके प्रकृति सौंदर्य का वर्णन किया गया है।
- फटकि सिहानी सौं सुधार्यो सुधा मंदिर… (कवित्त): चाँदनी रात की सुंदरता का दूध के झाग के समान श्वेताभ बिंब।
- सवैये एवं कवित्त:
- कविता शैली एवं विशेषताएँ
- काव्य भाषा: परिमार्जित और माधुर्यपूर्ण ब्रजभाषा।
- शैली: अलंकृत, संगीतात्मक, चमत्कारपूर्ण और बिंबग्राही।
- अलंकार विधान: अनुप्रास, यमक, उपमा और रूपक का प्रचुर प्रयोग।
- विषय-वस्तु: शृंगार (संयोग व वियोग), भक्ति, वैराग्य और प्रकृति चित्रण।
- सम्मान और उपाधियाँ
- ‘कवि-आचार्य’: रीतिकाल में देव को रीति-शास्त्र के निरूपण और काव्य-सौंदर्य दोनों में निपुण होने के कारण ‘कवि-आचार्य’ का दर्जा दिया गया।
- राजा भोगिलाल द्वारा सम्मान: भोगिलाल ने देव की कविता पर रीझकर उन्हें हाथी, घोड़े और लाखों की संपत्ति पुरस्कार में दी थी।
- निधन वर्ष: संवत् 1824 (लगभग 1767 ई.) , उत्तर प्रदेश।
- विशेष तथ्य
- छल नामक 34वाँ संचारी भाव: रीतिशास्त्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल और अन्य आचार्यों ने 33 संचारी भाव माने हैं, परंतु देव जी ने ‘छल’ नामक 34वें संचारी भाव की कल्पना की थी। (यह TGT/PGT और UGC NET में बार-बार पूछा जाने वाला प्रश्न है)।
- देव बड़े या बिहारी विवाद: हिंदी साहित्य में ‘देव बड़े कि बिहारी’ विवाद अत्यंत प्रसिद्ध रहा है।
- मिश्रबंधुओं ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी नवरत्न’ में देव को बिहारी से बड़ा कवि सिद्ध करने का प्रयास किया था।
- इसके जवाब में पंडित पद्मसिंह शर्मा ने ‘बिहारी’ को बड़ा बताया और कृष्णबिहारी मिश्र ने ‘देव और बिहारी’ पुस्तक लिखकर तुलनात्मक समीक्षा की।
- अभिधा शब्द-शक्ति के समर्थक: देव जी का प्रसिद्ध कथन है:
“अभिधा उत्तम काव्य है, मध्य लक्षणा हीन। अधम व्यंजना रस-विरस, उलटी कहत प्रवीन॥”
जयशंकर प्रसाद
- जन्म: 30 जनवरी 1889 (वाराणसी / काशी, उत्तर प्रदेश)
- निधन: 15 नवंबर 1937 (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
- परिवार: प्रसिद्ध ‘सुंघनी साहू’ घराना (वाराणसी का प्रसिद्ध वैश्य परिवार)।
- उपनाम / काव्य-नाम: ‘कलाधर’ (प्रारंभ में ब्रजभाषा में ‘कलाधर’ उपनाम से कविताएँ लिखते थे)।
- साहित्यिक युग: छायावाद (1918–1936 ई.) के जनक / प्रवर्तक।
- साहित्यिक दर्शन: आनंदवाद एवं प्रत्यभिज्ञा दर्शन (विशेषकर ‘कामायनी’ में)।
- महाकाव्य एवं काव्य-संग्रह (Poetry & Epic) — अत्यंत महत्वपूर्ण
- कामायनी (1935):
- विशेषता: हिंदी साहित्य का युगांतकारी महाकाव्य (15 सर्गों में विभक्त)।
- मुख्य पात्र: मनु (मन का प्रतीक), श्रद्धा (हृदय का प्रतीक), इड़ा (बुद्धि का प्रतीक), मानव (मनुष्य का प्रतीक)।
- 15 सर्ग (क्रमशः): चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य, आनंद।
- आँसू (1925): हिंदी का प्रसिद्ध स्मृति-काव्य / विरह-काव्य।
- लहर (1933): प्रसिद्ध गीतिकाव्य।
- झरना (1918): “छायावाद की प्रथम प्रयोगशाला” माना जाने वाला संग्रह।
- कानन कुसुम (1913) — खड़ी बोली का प्रथम काव्य-संग्रह।
- उच्छवास (1911)
- चित्रधार (1918) — ब्रजभाषा में रचित प्रारंभिक रचनाओं का संग्रह।
- प्रेम पथिक (1914)
- करुणालय (1912) — हिंदी का प्रथम गीतिनाट्य (Verse Drama)।
- महाराणा का महत्व (1914)
- कामायनी (1935):
- प्रसिद्ध कविताएँ
- आत्मकथ्य (NCERT कक्षा 10 की पाठ्यपुस्तक में शामिल — ‘हंस’ पत्रिका के आत्मकथा विशेषांक हेतु रचित)
- देवसेना का गीत (“आह! वेदना मिली विदाई…” — चंद्रगुप्त नाटक का गीत)
- कार्नेलिया का गीत (“अरुण यह मधुमय देश हमारा…” — चंद्रगुप्त नाटक का गीत)
- बीती विभावरी जाग री (प्रसिद्ध जागरण गीत)
- प्रलय की छाया
- शेरसिंह का शस्त्र समर्पण
- पेशावा की प्रतिध्वनि
- प्रसिद्ध नाटक – प्रसाद जी को आधुनिक हिंदी नाटक का जनक/शिखर पुरुष माना जाता है:
- चंद्रगुप्त (1931)
- स्कंदगुप्त (1928)
- ध्रुवस्वामिनी (1933) — नारी समस्या व पुनर्विवाह पर आधारित नाटक।
- अजातशत्रु (1922)
- एक घूँट (1930) — हिंदी का प्रथम एकांकी माना जाता है।
- राज्यश्री (1915) — पहला ऐतिहासिक नाटक।
- सज्जन (1910) — पहला नाटक (महाभारत की कथा पर)।
- विशाख (1921)
- जन्मेजय का नागयज्ञ (1926)
- कामना (1927) — प्रतीक नाटक (Symbolic Play)।
- प्रायश्चित (1913)
- कल्याणी परिणय (1912)
- उपन्यास
- कंकाल (1929) — यथार्थवादी उपन्यास।
- तितली (1934) — ग्रामीण जीवन और कृषक समस्या पर आधारित।
- इरावती (1938) — ऐतिहासिक उपन्यास (अपूर्ण रह गया था)।
- कहानी संग्रह
- छाया (1912) — हिंदी का पहला कहानी संग्रह माना जाता है
- प्रतिध्वनि (1926)
- आकाशदीप (1928) — (प्रसिद्ध कहानियाँ: ‘आकाशदीप’, ‘पुरस्कार’, ‘ममता’)
- आंधी (1931)
- इंद्रजाल (1936)
- निबंध एवं आलोचना
- काव्य और कला तथा अन्य निबंध (1939)
- पुरस्कार एवं सम्मान
- मंगलाप्रसाद पारितोषिक: उनके कालजयी महाकाव्य “कामायनी” के लिए हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा सर्वोच्च ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ प्रदान किया गया।
- मुख्य बिंदु
- छायावाद के ब्रह्मा: छायावाद के चार स्तंभों में जयशंकर प्रसाद को ‘ब्रह्मा’, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को ‘महेश’ (शिव), और सुमित्रानंदन पंत को ‘विष्णु’ कहा जाता है।
- NCERT विशेष: कक्षा 10 (क्षितिज भाग-2) में इनकी कविता ‘आत्मकथ्य’ शामिल है। जब प्रेमचंद के संपादन में ‘हंस’ का आत्मकथा विशेषांक निकल रहा था, तब मित्रों के आग्रह पर प्रसाद जी ने अपने जीवन के यथार्थ और आभावों को व्यक्त करते हुए यह कविता लिखी थी।
- ‘कामायनी’ के मुख्य छंद व दर्शन: कामायनी की रचना ‘ताटंक’ छंद में हुई है तथा इसका मूल दर्शन शैव दर्शन का ‘प्रत्यभिज्ञा’ और ‘आनंदवाद’ है।
- नाटकीयता: प्रसाद जी के नाटकों में भारतीय राष्ट्रीय चेतना, अतीत का गौरव, और संस्कृति का अनुपम संगम मिलता है।
नागार्जुन
- मूल नाम: वैद्यनाथ मिश्र
- उपनाम / उपाधि: ‘जनकवि’, ‘बाबा नागार्जुन’, मैथिली भाषा में ‘यात्री’ उपनाम से लेखन।
- जन्म: 30 जून 1911 (सतलखा गाँव, ननिहाल / पैतृक गाँव: तरौनी, जिला दरभंगा, बिहार)
- निधन: 5 नवंबर 1998 (दरभंगा, बिहार)
- बौद्ध धर्म दीक्षा: 1936 में श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और ‘वैद्यनाथ मिश्र’ से ‘नागार्जुन’ नाम धारण किया।
- साहित्यिक चेतना: प्रगतिवादी (मार्क्सवादी) चिंतन, जनवादी काव्य-धारा, किसान-मज़दूर चेतना और राजनीतिक चेतना।
- (A) प्रमुख काव्य-संग्रह (Poetry Collections) — अत्यंत महत्वपूर्ण
- युगधारा (1953) — पहला प्रसिद्ध काव्य-संग्रह
- सतरंगे पंखों वाली (1959)
- प्यासी पथराई आँखें (1962)
- तालाब की मछलियाँ (1974)
- तुमने कहा था (1980)
- खिचड़ी विप्लव देखा हमने (1980)
- हज़ार-हज़ार बाहों वाली (1981)
- पुरानी जूतियों का कोरस (1983)
- रत्नगर्भ (1984)
- ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या! (1985)
- भूल जाओ पुराने सपने (1985)
- अपने खेत में (1997)
- (B) प्रसिद्ध एवं चर्चित कविताएँ (Famous Poems)
- अकाल और उसके बाद (NCERT एवं प्रतियोगी परीक्षाओं की अति-प्रसिद्ध कविता — “कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास…”)
- यह दंतुरित मुस्कान एवं फसल (NCERT कक्षा 10 की पाठ्यपुस्तक में शामिल)
- बादल को घिरते देखा है
- सिंदूर तिलकित भाल
- प्रेत का बयान
- हरिजन गाथा
- शासन की बंदूक (तीखा राजनीतिक व्यंग्य)
- मंत्र कविता
- गुलाबी चूड़ियाँ
- आओ रानी हम ढोएंगे पालकी (नेहरू काल पर तीखा व्यंग्य)
- इंदु जी, इंदु जी क्या हुआ आपको! (आपातकाल के विरुद्ध लिखी गई प्रसिद्ध राजनीतिक कविता)
- (C) प्रमुख उपन्यास (Novels) — प्रगतिवादी व आंचलिक
- रतिनाथ की चाची (1948) — पहला उपन्यास
- बलचनमा (1952) — हिंदी का प्रारंभिक आंचलिक उपन्यास (शोषित किसान बालक बलचनमा का संघर्ष)
- नयी पौध (1953)
- बाबा बटेसरनाथ (1954) — बरगद के वृक्ष को केंद्र में रखकर रचित उपन्यास
- वरुण के बेटे (1957) — मछुआरों के जीवन और संघर्ष पर आधारित
- दुखमोचन (1957)
- कुंभीपाक (1960) / चंपक
- जमनिया का बाबा (1968)
- पारो (1975)
- उग्रतारा (1977)
- हीरक जयंती (1979)
- (D) मैथिली एवं अन्य भाषाओं की रचनाएँ
- पत्रहीन नग्न गाछ (1967) — मैथिली काव्य-संग्रह (साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित)
- चित्रा (मैथिली काव्य-संग्रह)
- पारो (मैथिली उपन्यास)
- धर्मधातु (संस्कृत काव्य-रचना)
- (E) निबंध एवं गद्य-साहित्य (Essays & Prose)
- अन्नहीनम क्रियाहीनम (निबंध संग्रह)
- बम भोले (निबंध)
- 3. पुरस्कार एवं सम्मान (Awards & Honors)
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1969): मैथिली काव्य-संग्रह “पत्रहीन नग्न गाछ” के लिए।
- भारत भारती सम्मान (1988): उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा।
- मैथिलीशरण गुप्त सम्मान: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा।
- कबीर सम्मान: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा।
- साहित्य अकादमी फेलोशिप (1994): साहित्य अकादमी का सर्वोच्च सम्मान।
- राजेंद्र शिखर सम्मान: बिहार सरकार द्वारा।
- परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु (Quick Revision Notes)
- ‘यात्री’ और ‘नागार्जुन’: मैथिली साहित्य में वे ‘यात्री’ नाम से और हिंदी साहित्य में ‘नागार्जुन’ नाम से प्रसिद्ध हुए।
- आंचलिकता का अग्रदूत: फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आँचल’ (1954) से पूर्व ही नागार्जुन ने ‘रतिनाथ की चाची’ (1948) और ‘बलचनमा’ (1952) के माध्यम से हिंदी में आंचलिक उपन्यास लेखन की शुरुआत कर दी थी।
- NCERT विशेष: कक्षा 10 (क्षितिज भाग-2) में इनकी दो कविताएँ शामिल हैं:
- ‘यह दंतुरित मुस्कान’: शिशु की निश्छल मुस्कान के सौंदर्य का वर्णन।
- ‘फसल’: मिट्टी, पानी, हवा, सूरज की किरणों और मानव-श्रम के सम्मिश्रण के रूप में फसल की व्याख्या।
- काव्य-शैली: नागार्जुन को “कबीर की परंपरा का आधुनिक कवि” कहा जाता है क्योंकि वे भी कबीर की तरह सीधे, फक्कड़, बेबाक और जनसाधारण की भाषा (तत्सम, देशज, खड़ी बोली) में तीखा प्रहार करने में माहिर थे।
गिरिजाकुमार माथुर
- जन्म: 22 अगस्त 1919 (अशोकनगर, मध्य प्रदेश)
- निधन: 10 जनवरी 1994 (नई दिल्ली)
- साहित्यिक गुट/धारा: ‘तार सप्तक’ (1943, अज्ञेय द्वारा संपादित) के प्रमुख कवि; प्रयोगवादी व छायावादोत्तर काव्य धारा।
- व्यवसाय/सेवा: आकाशवाणी (All India Radio) तथा दूरदर्शन में उच्च पदों पर लंबे समय तक सेवा दी।
- मुख्य विषय-वस्तु: रोमानी ऐंद्रिकता, सौंदर्यबोध, चित्रमयी बिंब-विधान, समकालीन सामाजिक यथार्थ और देशप्रेम।
- (A) प्रमुख काव्य-संग्रह (Poetry Collections) — अत्यंत महत्वपूर्ण
- मंजीर (1941) — पहला काव्य-संग्रह
- नाश और निर्माण (1946)
- धूप के धान (1955)
- शिलापंख चमकीले (1961)
- जो बंध न सका (1968)
- भीतरी नदी की यात्रा (1975)
- साक्षी रहे वर्तमान (1980)
- मैं वक्त के हूँ सामने (1990) — साहित्य अकादमी एवं व्यास सम्मान से पुरस्कृत
- छाया मत छूना (1978)
- पृथ्वीकल्प (प्रबंध काव्य)
- (B) प्रसिद्ध एवं चर्चित कविताएँ (Famous Poems)
- छाया मत छूना (NCERT कक्षा 10 की पाठ्यपुस्तक में शामिल — अतीत की यादों में न खोकर वर्तमान का सामना करने का संदेश)
- हम होंगे कामयाब (विश्वप्रसिद्ध अमेरिकी गीत “We Shall Overcome” का कालजयी हिंदी अनुवाद)
- 15 अगस्त (स्वतंत्रता के अवसर पर रचित प्रसिद्ध कविता — “आज जीत की रात, पहरुए सावधान रहना!”)
- धूप के धान
- निर्माण
- (C) नाटक एवं काव्य-नाटक
- कल्पांतर (काव्य-नाटक / गीतिनाट्य)
- पृथ्वीकल्प (काव्य-नाटक)
- (D) आलोचना एवं गद्य-साहित्य
- नई कविता: सीमाएँ और संभावनाएँ (1966) — प्रसिद्ध आलोचनात्मक ग्रंथ
परीक्षा उपयोगी तथ्य: गिरिजाकुमार माथुर मुख्य रूप से कवि, गीतकार, नाटककार और आलोचक थे। इन्होंने कथा-साहित्य (उपन्यास/कहानी) में विशेष कार्य नहीं किया।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1991): उनके काव्य-संग्रह “मैं वक्त के हूँ सामने” के लिए।
- व्यास सम्मान (1991): के. के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा काव्य-संग्रह “मैं वक्त के हूँ सामने” के लिए ही प्रदान किया गया।
- सलाका सम्मान (हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा)
- परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु
- ‘तार सप्तक’ के कवि (1943): अज्ञेय द्वारा संपादित प्रथम ‘तार सप्तक’ में शामिल 7 कवियों में से एक थे (अन्य कवि: अज्ञेय, मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, रामविलास शर्मा)।
- NCERT विशेष: कक्षा 10 (क्षितिज भाग-2) में संकलित इनकी कविता ‘छाया मत छूना’ के माध्यम से कवि ने संदेश दिया है कि अतीत की सुखद स्मृतियों में खोए रहने से वर्तमान का दुख कम नहीं होता, बल्कि और बढ़ जाता है; इसलिए मनुष्य को यथार्थ का सामना करना चाहिए।
- “हम होंगे कामयाब”: इस गीत के हिंदी रूपांतरण का श्रेय गिरिजाकुमार माथुर जी को ही जाता है, जो आज भारत में प्रेरणादायक राष्ट्र-गीत के रूप में गाया जाता है।
- काव्य-शैली: माथुर जी के काव्य में संगीतात्मकता, बिंब-विधान और लय पर विशेष बल दिया गया है। क्लिष्ट संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के स्थान पर भावानुकूल तत्सम एवं देशज शब्दों का संतुलित प्रयोग इनकी विशेषता है।
ऋतुराज
- जन्म: 10 फ़रवरी 1940 (भरतपुर, राजस्थान)
- निधन: 24 जनवरी 2024 (जयपुर, राजस्थान)
- शिक्षा एवं कार्य: राजस्थान विश्वविद्यालय (जयपुर) से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए.। लगभग 40 वर्षों तक अंग्रेज़ी अध्यापन का कार्य किया।
- साहित्यिक चेतना: जनवादी एवं प्रगतिशील काव्य-चेतना; समाज के शोषित, वंचित और हाशिए के लोगों के दैनिक जीवन के यथार्थ का चित्रण।
- मुख्य विषय-वस्तु: स्त्रियों के सामाजिक दुख-दर्द, मध्यवर्गीय विडंबनाएँ, सत्ता का शोषण और लोक-जीवन की परिस्थितियाँ।
- (A) प्रमुख काव्य-संग्रह (Poetry Collections) — अत्यंत महत्वपूर्ण
- पुल पर पानी (1977) — पहला प्रसिद्ध काव्य-संग्रह
- एक मरणधर्मा और अन्य (1978)
- सूरत निरत (1979)
- लीला मुखारविंद (1983)
- कितना कुछ धैर्य (1998)
- आशा नाम नदी
- मानव समाज
- मुनि श्रेष्ठ
- (B) प्रसिद्ध एवं चर्चित कविताएँ (Famous Poems)
- कन्यादान (NCERT कक्षा 10 की पाठ्यपुस्तक में शामिल — अत्यंत प्रसिद्ध)
- पुल पर पानी
- चित्रकूट का घाट
- अंगुलिमाल
- अकाल में नींद
- पुरस्कार एवं सम्मान (Awards & Honors)
- सोमदत्त सम्मान
- परिमल सम्मान
- मीरा पुरस्कार (राजस्थान साहित्य अकादमी का सर्वोच्च सम्मान)
- पहल सम्मान
- बिहारी पुरस्कार (के. के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा उनके काव्य-संग्रह “कितना कुछ धैर्य” के लिए प्रदान किया गया)
- परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु
- NCERT विशेष: कक्षा 10 (क्षितिज भाग-2) में संकलित इनकी कविता ‘कन्यादान’ विवाह के अवसर पर माँ द्वारा बेटी को दी जाने वाली पारंपरिक सीख से हटकर, उसे शोषण और सामाजिक बंधनों के प्रति सचेत करने वाली एक क्रांतिकारी कविता है।प्रसिद्ध पंक्तियाँ: “लड़की होना पर लड़की जैसी दिखाई मत देना।”
- काव्य-भाषा: ऋतुराज की भाषा अत्यंत सहज, लोक-जीवन के निकट और आत्मीय है। उसमें क्लिष्टता के स्थान पर सीधा और मर्मस्पर्शी प्रभाव होता है।
- स्त्री-विमर्श: समकालीन हिंदी कविता में स्त्री के यौनिक व सामाजिक उत्पीड़न तथा उसकी वास्तविक स्थिति को बिना किसी आडंबर के प्रस्तुत करने वाले कवियों में इनका नाम प्रमुखता से आता है।
मंगलेश डबराल
- जन्म: 16 मई 1948 (काफ़लपानी गाँव, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड)
- निधन: 9 दिसंबर 2020 (दिल्ली / एम्स, कोविड-19 जनित जटिलताओं के कारण)
- पत्रकारिता क्षेत्र:
- ‘हिंदी पेट्रियट’, ‘प्रतिपक्ष’ और ‘आस-पास’ में कार्य।
- दिल्ली में ‘जनसत्ता’ समाचार पत्र में ‘रविद्वारीय जनसत्ता’ के संपादक रहे।
- ‘इलाहाबाद’ से प्रकाशित ‘अमृत प्रभात’ तथा ‘भोपाल’ से प्रकाशित ‘पूर्वाग्रह’ से जुड़े रहे।
- बाद में ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ (NBT) में भी संपादन कार्य किया।
- मुख्य विषय-वस्तु: पहाड़ी जीवन का सौंदर्य एवं विस्थापन का दर्द, महानगरीय सभ्यता की विषमता, मध्यवर्गीय जीवन का संताप, और संगीत व कला चेतना।
- (A) प्रमुख काव्य-संग्रह (Poetry Collections) — अत्यंत महत्वपूर्ण
- पहाड़ पर लालटेन (1981) — पहला और अत्यंत प्रसिद्ध काव्य-संग्रह
- घर का रास्ता (1988)
- हम जो देखते हैं (1995) — साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित
- आवाज़ भी एक जगह है (2000)
- नए युग में शत्रु (2013)
- कवि ने कहा (प्रतिनिधि कविताओं का चयन)
- (B) प्रसिद्ध एवं चर्चित कविताएँ (Famous Poems)
- संगतकार (NCERT कक्षा 10 की पाठ्यपुस्तक में शामिल — मुख्य गायक का साथ देने वाले सह-गायक के समर्पण पर आधारित)
- पहाड़ पर लालटेन
- गुजरात के विवरण
- सिटी (शहर)
- गुमशुदा
- अकाल में नींद
- बच्चे का सपना
- (C) गद्य एवं निबंध संग्रह (Prose & Essay Collections)
- लेखक की रोटी (1998) — प्रसिद्ध निबंध एवं टिप्पणी संग्रह
- कवि का अकेलापन (2008) — साहित्यिक एवं वैचारिक निबंध संग्रह
- (D) यात्रा-वृत्तांत (Travelogues)
- एक बार आयोवा (1996) — अमेरिका यात्रा पर आधारित प्रसिद्ध यात्रा-संस्मरण
- (E) साक्षात्कार संग्रह (Interviews)
- साक्षात्कार (विभिन्न रचनाकारों व विचारकों से बातचीत)
- (F) अनुवाद कार्य (Translations)– मंगलेश डबराल जी एक बेहतरीन अनुवादक भी थे। उन्होंने विश्व साहित्य की अनेक कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया:
- बर्तोल्ट ब्रेख्त, पाब्लो नेरुदा, एर्नेस्तो कार्देनैल, यानिस रित्सोस, तादेऊश रूज़ेविच और ज़्बिगनीव हर्बर्ट की कविताओं के अनुवाद।
- ‘संसार की श्रेष्ठ कविताएँ’ नाम से अनुदित कविताओं का संपादन।
- पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (2000): उनके काव्य-संग्रह “हम जो देखते हैं” के लिए।
- पहल सम्मान
- ओमप्रकाश स्मृति सम्मान
- श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार
- शमशेर सम्मान
- हिंदी अकादमी (दिल्ली) का ‘साहित्यकार सम्मान’
- परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु
- NCERT विशेष: कक्षा 10 (क्षितिज भाग-2) में संकलित इनकी कविता ‘संगतकार’ संगीत और कला के क्षेत्र में पर्दे के पीछे रहकर मुख्य कलाकार को संबल देने वाले सहयोगियों के महत्त्व और उनकी “मनुष्यता” को रेखांकित करती है।
- काव्य-शैली: मंगलेश डबराल की कविता में कोई अनावश्यक गर्जना या भारी-भरकम शब्दजाल नहीं होता; उनकी शैली अत्यंत पारदर्शी, संयमित और गहरी मानवीय संवेदना से भरी है।
- संगीत-प्रेम: मंगलेश जी शास्त्रीय और लोक संगीत के गहरे जानकार थे, जिसका प्रभाव उनकी कविताओं में लय और बिंब विधान के रूप में दिखता है।
- ‘जनसत्ता’ का रविद्वारीय पृष्ठ: उनके संपादन में ‘जनसत्ता’ का रविवार का अंक हिंदी साहित्य में सांस्कृतिक-साहित्यिक विमर्श का एक बड़ा केंद्र बन गया था।
स्वयं प्रकाश
- जन्म: 20 जनवरी 1947 (इंदौर, मध्य प्रदेश)
- निधन: 7 दिसंबर 2019 (मुंबई, महाराष्ट्र)
- व्यवसाय: मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) के ‘हिंदुस्तान ज़िंक लिमिटेड’ में सेवा दी। सेवानिवृत्ति के बाद भोपाल में निवास।
- साहित्यिक विचारधारा: प्रगतिशील/जनवादी विचारधारा, मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थ चित्रण, वर्ग-भेद और जातिगत चेतना पर करारा व्यंग्य।
- पत्रिका संपादन: प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ और ‘पहल’ के संपादन मंडल से जुड़े रहे।
- प्रमुख कहानी संग्रह
- मात्रा और भार (1975) — पहला कहानी संग्रह
- सूरज कब निकलेगा (1980)
- आस-पास (1981)
- बोलो चील (1983)
- सबगेहैन में अज़ीज़ (1989)
- आदमी जात का आदमी (1994)
- अगले जन्म (2002)
- संधानी (2000)
- छोर हीन
- फिर वही संशय
- कसप (कहानियाँ)
- प्रसिद्ध एवं चर्चित कहानियाँ
- नेताजी का चश्मा (NCERT कक्षा 10 की पाठ्यपुस्तक में शामिल — अत्यंत प्रसिद्ध)
- पार्टी का अपराध
- जंगल का दाह
- बलिदान
- संक्रमण
- बाबूजी का डंडा
- (C) उपन्यास (Novels)
- जलते मकान (1977)
- ज्योति रथ के सारथी (1979)
- बीच में विनय (1994)
- ईंधन (1998)
- उत्तर जीवन कथा
- (D) नाटक एवं एकांकी (Plays)
- फीनिक्स (नाटक)
- चौरस
- (E) संस्मरण एवं निबंध (Memoirs & Essays)
- एक कहानी यह भी (प्रसिद्ध आत्मकथ्य/संस्मरण)
- रंगशाला में एक दोपहर (संस्मरण)
- दस्तावेज (निबंध)
- स्वांतः सुखाय (निबंध व साक्षात्कार संग्रह)
- पुरस्कार एवं सम्मान
- पहल सम्मान
- बनमाली पुरस्कार
- राजस्थान साहित्य अकादमी का ‘रांगेय राघव पुरस्कार’ (उपन्यास ‘बीच में विनय’ के लिए)
- भवभूति अलंकार सम्मान
- विशिष्ट साहित्यकार सम्मान (राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा)
- परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु
- NCERT विशेष: कक्षा 10 (क्षितिज भाग-2) में संकलित कहानी ‘नेताजी का चश्मा’ के रचयिता हैं। इसमें ‘कैप्टन चश्मेवाले’ के माध्यम से साधारण नागरिकों के देशभक्तिपूर्ण योगदान और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा के प्रति श्रद्धा को दर्शाया गया है।
- शिल्पगत विशेषता: इनकी भाषा आम व्यावहारिक हिंदी (जिसमें तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों के साथ-साथ व्यंग्य का सटीक प्रयोग है) के बहुत करीब है।
- वसुधा पत्रिका: भोपाल से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित पत्रिका ‘वसुधा’ के संपादन से लंबे समय तक जुड़े रहे।
- मुख्य सरोकार: समाज में व्याप्त संकीर्णता, जातिवाद, लिंग-भेद और मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं पर अपनी पैनी शैली में प्रहार करना।
रामवृक्ष बेनीपुरी
- जन्म: 23 दिसंबर 1899 (बेनीपुर गाँव, मुजफ्फरपुर जिला, बिहार)
- निधन: 7 सितंबर 1968 (मुजफ्फरपुर, बिहार)
- उपनाम/उपाधि: “कलम का जादूगर”
- साहित्यिक योगदान: रेखाचित्र (Sketch), संस्मरण, नाटक, उपन्यास, निबंध तथा पत्रकारिता में युगांतकारी योगदान।
- राजनीतिक/सामाजिक योगदान: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी, अनेक बार जेल यात्राएँ तथा बिहार में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक।
- (A) रेखाचित्र एवं संस्मरण (Sketches & Memoirs) — अत्यंत महत्वपूर्ण
- माटी की मूरतें (1946) — 12 रेखाचित्रों का प्रसिद्ध संग्रह (UGC NET के पाठ्यक्रम में शामिल)
- गेहूं और गुलाब (1950) — प्रसिद्ध निबंध एवं रेखाचित्र संग्रह (गेहूं = भौतिकता/भूख, गुलाब = कला/संस्कृति)
- लाल तारा (1938) — पहला रेखाचित्र संग्रह
- मील के पत्थर (1957)
- जंजीरें और दीवारें (संस्मरण)
- मंगुर
- (B) प्रसिद्ध नाटक एवं एकांकी (Plays)
- अंबपाली (1950) — ऐतिहासिक नाटक (वैशाली की नगरवधू अंबपाली पर आधारित)
- नेत्रदान (1948)
- सीता की माँ (1948)
- रामराज्य (1948)
- नया समाज (1953)
- विजेता (1953)
- गाँव के देवता (1954)
- बैजू मामा
- (C) उपन्यास (Novels)
- पतितों के देश में (1930-32) — पहला व प्रसिद्ध उपन्यास
- कैदी की पत्नी (1940)
- (D) निबंध एवं विचार-साहित्य (Essays)
- गेहूं और गुलाब (प्रसिद्ध विचारात्मक निबंध)
- वंदे वाणी विनायकौ (1954) — ललित निबंध संग्रह
- सतरंगा बहुरंगा
- (E) यात्रा-वृत्तांत (Travelogues)
- पैरों में पंख बांधकर (1952)
- उड़ते चलें, उड़ते चलें (1954)
- (F) जीवनियाँ एवं संपादन (Biographies & Editing)
- कार्ल मार्क्स (जीवनी)
- जयप्रकाश नारायण (जीवनी)
- राणा प्रताप (जीवनी)
- संपादित ग्रंथ: ‘बिहारी सतसई’ की टीका — ‘बिहारी सतसई की सुबोध टीका’
- प्रमुख पत्र-पत्रिकाएँ (Journalism) – बेनीपुरी जी एक उत्कृष्ट पत्रकार थे। उन्होंने निम्नलिखित प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया:
- तरुण भारत (1921)
- किसान मित्र (1922)
- गोलमाल (1924)
- युवक (1929) — क्रांतिकारी विचारों का पत्र
- हिमालय (1946)
- नई धारा (1950)
- जनवाणी
- योगी
- सम्मान एवं स्मारक (Honors & Memorials)
- डाक टिकट जारी (1999): भारतीय डाक विभाग द्वारा बेनीपुरी जी की जन्मशताब्दी के अवसर पर ₹2.00 का स्मारक डाक टिकट जारी किया गया।
- बिहार राष्ट्रभाषा परिषद सम्मान: हिंदी साहित्य और गद्य-शैली में उनके उत्कृष्ट योगदान हेतु।
- परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु
- “कलम का जादूगर”: यह उपाधि रामवृक्ष बेनीपुरी जी को उनके भावात्मक और काव्यात्मक गद्य लेखन शैली के लिए दी गई है (ध्यान रखें: ‘कलम का सिपाही/मजदूर’ प्रेमचंद को कहा जाता है)।
- NCERT विशेष: कक्षा 10 (क्षितिज भाग-2) में इनका प्रसिद्ध रेखाचित्र ‘बालगोबिन भगत’ संकलित है, जो एक कबीरपंथी गृहस्थ-साधु के माध्यम से सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करता है।
- ‘माटी की मूरतें’ के मुख्य रेखाचित्र: रज़िया, बलदेव सिंह, सिरिया, मंगुर, देव, परमेसर, बालगोबिन भगत, भौजी आदि।
- शैलीगत विशेषता: इनकी शैली में ‘अलंकृत भावात्मकता’ और ‘चित्रोपमता’ पाई जाती है, जिससे शब्दचित्र जीवंत हो उठते हैं।
यशपाल
- जन्म: 3 दिसंबर 1903 (फ़िरोज़पुर छावनी, पंजाब)
- निधन: 26 दिसंबर 1976 (लखनऊ, उत्तर प्रदेश)
- क्रांतिकारी पृष्ठभूमि: विद्यार्थी जीवन में ही ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) से जुड़े और भगत सिंह, सुखदेव व चंद्रशेखर आज़ाद के साथी रहे।
- साहित्यिक विचारधारा: मार्क्सवादी/प्रगतिवादी चिंतन, सामाजिक-राजनीतिक विषमता का विरोध, और वर्ग-संघर्ष का चित्रण।
- पत्रिका: ‘विप्लव’ (लखनऊ से प्रकाशित प्रसिद्ध राजनीतिक-साहित्यिक पत्रिका, जिसके वे संपादक थे)।
- (A) प्रसिद्ध उपन्यास (Novels)
- झूठा सच (दो भाग):
- भाग 1: ‘वतन और देश’ (1958)
- भाग 2: ‘देश का भविष्य’ (1960)
- विशेषता: भारत-विभाजन की त्रासदी पर लिखा गया हिंदी साहित्य का सबसे प्रामाणिक एवं महाकाव्यात्मक उपन्यास।
- प्रमुख पात्र: तारा, जयदेव पूरी, कनक, सोलोमन, गिल (विभाजन के दर्द और शरणार्थी जीवन का यथार्थ)।
- दिव्या (1945):
- विशेषता: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित नारी मुक्ति और उसकी अस्मिता का सशक्त उपन्यास।
- दादा कामरेड (1941): पहला उपन्यास (क्रांतिकारी जीवन और साम्यवाद पर आधारित)।
- देशद्रोही (1943)
- पार्टी कामरेड (1946)
- मनुष्य के रूप (1949)
- अमिता (1956): ऐतिहासिक उपन्यास (अशोक के कलिंग विजय की पृष्ठभूमि)।
- अप्सरा का शाप (1965)
- मेरी तेरी उसकी बात (1974):
- विशेषता: साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित।
- झूठा सच (दो भाग):
- (B) प्रमुख कहानी संग्रह (Short Story Collections)
- पिंजड़े की उड़ान (1939) — पहला कहानी संग्रह
- ज्ञानदान (1943)
- वो दुनिया (1944)
- अभिशप्त (1943)
- तर्क का तूफान (1944)
- भस्मावृत चिंगारी (1946)
- फूलों का कुर्ता (1949)
- धर्मयुद्ध (1950)
- उत्तमी की माँ (1955)
- चित्र का शीर्षक (1951)
- तुमने क्यों कहा था मैं सुंदर हूँ (1954)
- सच बोलने की भूल (1962)
- (C) प्रमुख प्रसिद्ध कहानियाँ (Famous Stories)
- लखनवी अंदाज (NCERT कक्षा 10 की पाठ्यपुस्तक में शामिल — पतनशील सामंती वर्ग पर व्यंग्य)
- परदा (मध्यवर्गीय झूठे आडंबर और सामाजिक विडंबना पर प्रसिद्ध कहानी)
- मकरील
- दुख का अधिकार (NCERT कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में शामिल)
- चार खूँटे
- (D) आत्मकथा एवं संस्मरण (Autobiography & Memoirs)
- सिंहावलोकन (3 भाग: 1951, 1952, 1955):
- विशेषता: हिंदी साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण आत्मकथा, जिसमें भारत के क्रांतिकारी आंदोलन का जीवंत विवरण है।
- लोहे की दीवार के दोनों ओर (यात्रा संस्मरण / यात्रा साहित्य – 1953)
- राह बीती (यात्रा साहित्य – 1956)
- सिंहावलोकन (3 भाग: 1951, 1952, 1955):
- (E) नाटक एवं निबंध (Plays & Essays)
- नशा (नाटक)
- नशे-नशे की बात (नाटक)
- न्याय का संघर्ष (निबंध संग्रह)
- बात-बात में बात (निबंध संग्रह)
- चक्कर क्लब (व्यंग्य निबंध संग्रह)
- गांधीवाद की शव-परीक्षा (वैचारिक/राजनीतिक निबंध)
- पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1976): उपन्यास “मेरी तेरी उसकी बात” के लिए।
- पद्म भूषण (1970): साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु भारत सरकार द्वारा।
- सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार
- देव पुरस्कार: ‘मार्गशीर्ष’ / अन्य रचनाओं के लिए।
- परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु
- मार्क्सवादी दृष्टिकोण: यशपाल प्रेमचंदोत्तर काल के सबसे प्रमुख प्रगतिवादी (मार्क्सवादी) कथाकार माने जाते हैं।
- NCERT विशेष:
- कक्षा 10 में संकलित ‘लखनवी अंदाज’ (नवाब साहब द्वारा खीरे को केवल सूँघकर फेंकने की सामंती सनक)
- कक्षा 9 में ‘दुख का अधिकार’ (गरीबी में दुख मनाने के अधिकार का अभाव)
- विप्लव पत्रिका: यशपाल ने जेल से छूटने के बाद लखनऊ से इस क्रांतिकारी पत्रिका का संपादन व प्रकाशन किया था।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
- जन्म: 15 सितंबर 1927 (बस्ती जिला, उत्तर प्रदेश)
- निधन: 24 सितंबर 1983 (नई दिल्ली)
- साहित्यिक गुट/काव्य धारा: ‘तीसरा सप्तक’ (1959, अज्ञेय द्वारा संपादित) के महत्वपूर्ण कवि।
- पत्रकारिता क्षेत्र:
- ‘दिनमान’ पत्रिका में “चरखे और चरचे” नाम से बेहद लोकप्रिय स्तंभ (Column) लिखा।
- प्रसिद्ध बाल पत्रिका ‘पराग’ के यशस्वी संपादक रहे।
- मुख्य विषय-वस्तु: आम आदमी का संघर्ष, मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाएँ, व्यवस्था के प्रति व्यंग्य, और प्रकृति प्रेमी मानवीय संवेदना।
- (A) प्रमुख काव्य-संग्रह (Poetry Collections)
- काठ की घंटियाँ (1959)
- बांस का पुल (1963)
- एक सूनी नाव (1966)
- गर्म हवाएं (1966)
- कुआनो नदी (1973) — प्रसिद्ध प्रबंधात्मक काव्य
- जंगल का दर्द (1976)
- खूटियों पर टंगे लोग (1982) — इसके लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला
- क्या कहकर पुकारूं
- कविताएँ-1 एवं कविताएँ-2
- (B) प्रसिद्ध कविताएँ (Famous Poems)
- इब्ने बतूता (NCERT एवं बाल साहित्य में प्रसिद्ध)
- मेघ आए (NCERT कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में शामिल)
- शाम – एक किसान (NCERT कक्षा 7 की पाठ्यपुस्तक में शामिल)
- लीक पर वे चलें जिनके चरण दुर्बल और हार गए हैं
- देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता
- अहमद नगर का किला
- (C) नाटक एवं एकांकी (Plays)
- बकरी (1974) — अत्यंत महत्वपूर्ण: जनवादी नाट्य परंपरा का राजनीतिक व्यंग्य नाटक (अनेक परीक्षाओं में पूछा जाता है)।
- अब गरीबी हटाओ (1979)
- कल भात आएगा / हवालात
- रूपमती बाज बहादुर
- (D) उपन्यास (Novels)
- सोया हुआ जल (1977) — प्रयोगात्मक उपन्यास
- पागल कुत्तों का मसीहा (1977) — लघु उपन्यास (व्यंग्यात्मक)
- उड़े हुए रंग
- (E) कहानी संग्रह (Short Stories)
- काठ की घंटियाँ
- अंधेरे पर अंधेरा
- 3000 टेस्ट
- (F) बाल साहित्य (Children’s Literature)
- बतूता का जूता
- महंगू की टाई
- भौं-भौं म्याऊँ-म्याऊँ
- (G) निबंध एवं स्तंभ लेखन (Essays & Columns)
- चरखे और चरचे (‘दिनमान’ पत्रिका में प्रकाशित व्यंग्यात्मक स्तंभों का संग्रह)
- कुछ रंग कुछ गंध
- पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1983): उनके प्रसिद्ध काव्य-संग्रह “खूटियों पर टंगे लोग” के लिए (मरणोपरांत प्रदान किया गया)।
- परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु
- तीसरा सप्तक के कवि: अज्ञेय द्वारा 1959 में संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल थे (अन्य कवि: प्रयाग नारायण त्रिपाठी, मदन वात्स्यायन, विजयदेव नारायण साही, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, कीर्ति चौधरी)।
- ‘बकरी’ नाटक: लोकनाट्य शैली (नौटंकी) पर आधारित राजनीतिक भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार करने वाला प्रसिद्ध नाटक है।
- NCERT विशेष: इनकी कविताएँ ‘मेघ आए’ (मानवीकरण अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण) तथा ‘शाम – एक किसान’ (रूपक रूपी जाड़ा) परीक्षाओं में बार-बार पूछी जाती हैं।
- संपादक: ‘पराग’ बाल पत्रिका का संपादन कर इन्होंने बाल-साहित्य को नई दिशा दी।
मन्नू भंडारी
- पूरा नाम: मन्नू भंडारी (मूल नाम: महेंद्र कुमारी)
- जन्म: 3 अप्रैल 1931 (भानपुरा, मंदसौर जिला, मध्य प्रदेश)
- निधन: 15 नवंबर 2021 (गुरुग्राम, हरियाणा)
- पति: प्रसिद्ध लेखक राजेंद्र यादव (1959 में विवाह)
- साहित्यिक युग: नई कहानी आंदोलन (60-70 का दशक)
- मुख्य विषय-वस्तु: स्त्री चेतना, आधुनिक जीवन का तनाव, पारिवारिक संबंध एवं पारिवारिक बिखराव।
- (A) प्रसिद्ध उपन्यास (Novels)
- आपका बंटी (1971):
- विशेषता: तलाकशुदा माता-पिता के बीच पिसते हुए बच्चे (बंटी) की मनोवैज्ञानिक स्थिति का वर्णन।
- हिंदी साहित्य में बाल-मनोविज्ञान का उत्कृष्ट उपन्यास।
- मुख्य पात्र: बंटी, शकुन (मां), अजय (पिता)।
- महाभोज (1979):
- विशेषता: राजनीतिक भ्रष्टाचार, दलित उत्पीड़न एवं मीडिया की भूमिका पर तीखा व्यंग्य (राजनीतिक उपन्यास)।
- बाद में इसका नाट्य-रूपांतरण भी किया गया जो अत्यंत सफल रहा।
- मुख्य विषय: सरोहा गाँव की पृष्ठभूमि में दलित बालक ‘बिंदा’ और राजनीतिक षड्यंत्र।
- एक इंच मुस्कान (1962):
- विशेषता: अपने पति राजेंद्र यादव के साथ मिलकर लिखा गया प्रयोगात्मक उपन्यास।
- स्वामी (1982):
- विशेषता: जैनेंद्र कुमार के उपन्यास ‘स्वामी’ पर आधारित / प्रेरित रचना।
- आपका बंटी (1971):
- (B) प्रमुख कहानी संग्रह (Short Story Collections)
- मैं हार गई (1957) — पहला कहानी संग्रह
- तीन निगाहों की एक तस्वीर (1959)
- एकहारे की दावत (1962)
- यही सच है (1966)
- विशेष फिल्म संदर्भ: इस प्रसिद्ध कहानी पर बासु चटर्जी ने लोकप्रिय फिल्म ‘रजनीगंधा’ (1974) बनाई थी।
- त्रिशंकु (1978)
- श्रेष्ठ कहानियाँ
- (C) नाटक एवं एकांकी (Plays)
- बिना दीवारों का घर (1960)
- महाभोज (उपन्यास का नाट्य रूपांतरण)
- (D) आत्मकथा एवं संस्मरण (Autobiography)
- एक कहानी यह भी (2007)
- मन्नू भंडारी की प्रसिद्ध आत्मकथा, जिसमें उनके साहित्यिक सफर और पारिवारिक संदर्भों का उल्लेख है।
- पुरस्कार: इसी पुस्तक के लिए इन्हें व्यास सम्मान (2008) मिला।
- प्रौड़ शिक्षा (संस्मरण)
- एक कहानी यह भी (2007)
- (E) पटकथाएँ एवं अन्य कार्य (Screenplays)
- रजनीगंधा (‘यही सच है’ कहानी पर आधारित)
- स्वामी (फिल्म)
- प्रियतमा (फिल्म)
- निर्मला (धारावाहिक पटकथा)
- पुरस्कार एवं सम्मान (Awards & Honors)
- व्यास सम्मान (2008): आत्मकथा “एक कहानी यह भी” के लिए (के. के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा)।
- उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान पुरस्कार
- भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार (कोलकाता)
- राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
- केरल हिंदी प्रचार सभा पुरस्कार
- माधवराव सप्रे पुरस्कार
- परीक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु
- ‘नई कहानी’ आंदोलन: इस आंदोलन की त्रयी/प्रमुख स्तंभों में कृष्णा सोबती और उषा प्रियंवदा के साथ इनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
- ‘रजनीगंधा’ फिल्म: ‘यही सच है’ कहानी पर आधारित।
- ‘आपका बंटी’ का मुख्य पात्र: बंटी, शकुन (मां), अजय (पिता)।
- ‘महाभोज’ का मुख्य विषय: सरोहा गाँव की पृष्ठभूमि में दलित बालक ‘बिंदा’ और राजनीतिक षड्यंत्र।
महावीर प्रसाद द्विवेदी
- जन्म तिथि: 15 मई 1864
- जन्म स्थान: ग्राम- दौलतपुर, जिला- रायबरेली (उत्तर प्रदेश)।
- पिता का नाम: पंडित रामसहाय द्विवेदी
- साहित्यिक युग (द्विवेदी युग): हिंदी साहित्य में सन 1900 ई. से 1920 ई. तक के कालखंड को इन्हीं के सम्मान में ‘द्विवेदी युग’ (जागरण-सुधार काल) कहा जाता है।
- ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन:
- यह परीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। द्विवेदी जी सन 1903 ई. में प्रसिद्ध ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक बने और 1920 ई. तक इस पद पर रहे।
- इसी पत्रिका के माध्यम से इन्होंने हिंदी गद्य और पद्य की भाषा (खड़ी बोली) का परिष्कार एवं संस्कार किया।
- रेलवे की नौकरी: आरंभ में इन्होंने रेलवे में नौकरी की थी, परंतु स्वाभिमान के कारण इस्तीफा देकर पूरी तरह साहित्य-सेवा में लग गए।
- प्रमुख काव्य कृतियाँ – द्विवेदी जी ने ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली में कविता लिखने पर ज़ोर दिया। इनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं:
- काव्यमंजूषा (1903)
- कविता कलाप (1909)
- सुमन (1923)
- कान्यकुब्ज अबला विलाप (1907)
- स्वदेशी कुंडल
- प्रमुख निबंध एवं गद्य रचनाएँ (Essays & Prose) – द्विवेदी जी एक उत्कृष्ट निबंधकार थे। इनके निबंध मुख्य रूप से विचारात्मक और आलोचनात्मक हैं:
-
- रसज्ञ रंजन (1920 – अत्यंत महत्वपूर्ण निबंध संग्रह)
- साहित्य सीकर
- साहित्य सन्दर्भ
- अद्भुत आलाप (1924)
- विचार विमर्श
- वनिता विलास
- संपत्तिशास्त्र (1907 – यह हिंदी में अर्थशास्त्र/Economics पर लिखी गई अपने समय की सबसे प्रामाणिक पुस्तक है, जिसे UGC NET में कई बार पूछा गया है)।
- आलोचनात्मक ग्रंथ (Criticism)- हिंदी में वैज्ञानिक आलोचना की शुरुआत करने का श्रेय द्विवेदी जी को ही है:
- कालिदास की निरंकुशता (परीक्षाओं में सर्वाधिक पूछा जाने वाला ग्रंथ)
- हिंदी कालिदास की आलोचना
- नैषध चरित चर्चा
- विक्रमांकदेव चरित चर्चा
- नाट्यशास्त्र
- अनूदित रचनाएँ (Translated Works) – इन्होंने संस्कृत और अंग्रेजी के कई ग्रंथों का हिंदी (खड़ी बोली) में उत्कृष्ट अनुवाद किया:
- संस्कृत से:
- कुमारसंभव सार
- मेघदूत
- रघुवंश
- किरातार्जुनीय
- शिक्षा स्वाधीनता
- अंग्रेजी से:
- बेकन विचार रत्नावली (अंग्रेज निबंधकार फ्रांसिस बेकन के निबंधों का अनुवाद)
- स्वाधीनता (जॉन स्टुअर्ट मिल के ‘ऑन लिबर्टी’ का अनुवाद)
- संस्कृत से:
- सम्मान और उपाधियाँ (Awards & Honours)
- आचार्य: काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा हिंदी साहित्य में उनके युगांतरकारी योगदान के लिए इन्हें ‘आचार्य’ की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया।
- साहित्य वाचस्पति: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा इन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि प्रदान की गई।
- निधन की तिथि: 21 दिसंबर 1938 , रायबरेली, उत्तर प्रदेश।
- परीक्षा-उपयोगी विशेष तथ्य
- खड़ी बोली का मानकीकरण: द्विवेदी जी का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने कविता की भाषा को ब्रजभाषा से मुक्त कर ‘खड़ी बोली’ को गद्य और पद्य दोनों की एकमात्र मानक भाषा बनाया। उन्होंने लेखकों की व्याकरणिक अशुद्धियों को सुधारने का भगीरथ प्रयास किया।
- निराला की ‘जूही की कली’ की वापसी: 1916 में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपनी प्रथम मुक्त-छंद कविता ‘जूही की कली’ सरस्वती में छपने के लिए भेजी थी, जिसे द्विवेदी जी ने “अश्लील” और “छंदहीन” कहकर छापने से मना कर दिया था। (यह प्रश्न TGT/PGT में बहुधा पूछा जाता है)।
- मैथिलीशरण गुप्त के गुरु: राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने साहित्य-सृजन में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को अपना ‘काव्य-गुरु’ माना था।
यतीन्द्र मिश्र
- जन्म तिथि: 12 अप्रैल 1977
- जन्म स्थान: अयोध्या, उत्तर प्रदेश
- शिक्षा: लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. (M.A.)।
- साहित्यिक पहचान: समकालीन हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, कला-चिंतक, संगीत और सिनेमा के अध्येता एवं संपादक।
- फाउंडेशन/ट्रस्ट: अयोध्या में ‘विमला देवी फाउंडेशन’ के न्यासी के रूप में सांस्कृतिक गतिविधियों एवं संगीत-परंपरा का संरक्षण।
- पत्रिका संपादन: ‘सहित’ (सांस्कृतिक त्रैमासिक पत्रिका)।
- प्रमुख काव्य कृतियाँ – यतींद्र मिश्र जी के पाँच प्रमुख कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जो परीक्षाओं में पूछे जाते हैं:
- यदा-कदा (1997) – (प्रथम कविता संग्रह)
- अयोध्या तथा अन्य कविताएँ (2002)
- ड्योढ़ी पर आलाप (2005)
- विभास
- बिना कलिंग विजय के (नवीनतम काव्य संग्रह)
- संगीत, कला और सिनेमा पर केंद्रित ग्रंथ
- लता: सुर-गाथा (2016):
- स्वर कोकिला लता मंगेशकर के जीवन और संगीतमय यात्रा पर रचित प्रसिद्ध एवं पुरस्कार प्राप्त प्रामाणिक पुस्तक।
- गिरिजा (2001): प्रसिद्ध ठुमरी गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत साधना पर आधारित पुस्तक।
- देवप्रिया (2002): प्रसिद्ध नृत्यांगना सोनल मानसिंह के साथ बातचीत पर आधारित ग्रंथ।
- सुर की बिरादरी: उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के जीवन और शहनाई वादन पर केंद्रित पुस्तक।
- अख्तरी: सोज़ और साज़ का अफ़साना: ‘मल्लिका-ए-ग़ज़ल’ बेगम अख्तर के जीवन और गायकी पर केंद्रित।
- हज़ार राहें मुड़ के देखीं: प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक एवं गीतकार गुलज़ार के जीवन पर आधारित प्रामाणिक पुस्तक।
- लता: सुर-गाथा (2016):
- प्रसिद्ध पाठ एवं NCERT संदर्भ (NCERT Reference)
- नौबतख़ाने में इबादत (व्यक्तिचित्र):
- NCERT संदर्भ: यह पाठ कक्षा 10वीं की हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ (NCERT) में संकलित है।
- मूल विषय: इसमें महान शहनाई वादक भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के व्यक्तित्व, उनकी सादगी, संगीत साधना, धार्मिक सद्भाव और काशी (वाराणसी) के प्रति उनके अनन्य प्रेम का सजीव और मार्मिक चित्रांकन किया गया है।
- नौबतख़ाने में इबादत (व्यक्तिचित्र):
- संपादन, अनुवाद एवं अन्य गद्य (Editorial & Translations)
- संपादन कार्य:
- शहरनामा फैजाबाद: फैजाबाद/अयोध्या के सांस्कृतिक-ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में संपादित गजेटियर।
- द्विजदेव ग्रंथावली (2000): रीतिकाल के अंतिम प्रतिनिधि कवि द्विजदेव की रचनाओं का सह-संपादन।
- यार जुलाहे एवं मीलों से दिन: गुलज़ार की कविताओं और गीतों का संपादन।
- अनुवाद कार्य:
- भैरवी: 12वीं शताब्दी की कन्नड़ शैव कवयित्री अक्क महादेवी के ‘वचनों’ का हिंदी में काव्यानुवाद/पुनर्लेखन।
- संपादन कार्य:
- सम्मान और पुरस्कार (Awards & Honours)
- 64वाँ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (2016): पुस्तक ‘लता: सुर-गाथा’ के लिए सिनेमा पर सर्वश्रेष्ठ लेखन हेतु ‘स्वर्ण कमल’।
- भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार (कविता के लिए)
- रज़ा पुरस्कार (Raza Puraskar)
- भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार
- हेमंत स्मृति कविता सम्मान
- ऋतुराज सम्मान
- अंतरराष्ट्रीय वातावरण कविता पुरस्कार (लंदन)
- परीक्षा-उपयोगी विशेष तथ्य
- ‘नौबतख़ाने में इबादत’ की मुख्य बातें:
- ‘नौबतख़ाना’ का अर्थ: प्रवेश द्वार के ऊपर मंगल-ध्वनि बजाने का स्थान।
- बिस्मिल्ला ख़ाँ का बचपन का नाम: कमरुद्दीन (और उनके भाई का नाम शमसुद्दीन)।
- बिस्मिल्ला ख़ाँ के उस्ताद/मामा: सादिक हुसैन तथा अलीबख्श ख़ाँ (जो काशी के विश्वनाथ मंदिर और बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे)।
- सांस्कृतिक समन्वय: यतींद्र मिश्र जी का लेखन मुख्य रूप से भारतीय संस्कृति के गंगा-जमुनी तहज़ीब, शास्त्रीय कलाओं, संगीत और लोक-जीवन के अद्भुत मेल को उजागर करता है।
- ‘नौबतख़ाने में इबादत’ की मुख्य बातें:
भदंत आनंद कौसल्यायन
- जन्म तिथि: 5 जनवरी 1905
- जन्म स्थान: सोहाना गाँव, जिला-अंबाला (पंजाब)
- मूल नाम (बचपन का नाम): हरनाम दास
- बौद्ध धर्म में दीक्षा: श्रीलंका जाकर बौद्ध भिक्षु की दीक्षा ली, जिसके बाद इनका नाम ‘भदंत आनंद कौसल्यायन’ पड़ा।
- व्यक्तित्व एवं विचार: प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु, महान यात्रा-लेखक, अनुवादक, बौद्ध दर्शन के प्रकांड विद्वान और देश-विदेश की यात्रा करने वाले घुमक्कड़ साहित्यकार।
- साहित्यिक योगदान: राहुल सांकृत्यायन और भदंत नागार्जुन के साथ इन्हें हिंदी साहित्य का ‘घुमक्कड़ त्रयी’ (तीन प्रमुख यात्रा-लेखक) माना जाता है।
- राष्ट्रभाषा प्रचार: इन्होंने ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ (वर्धा) के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- यात्रा-वृत्तांत (Travelogues):
- जो न भूल सका
- मेरी तिब्बत यात्रा
- देश की मिट्टी बुलाती है
- रेल के टिकट
- निबंध संग्रह (Essay Collections):
- भिक्षु के पत्र (अत्यंत प्रसिद्ध निबंध संग्रह)
- भूल-चित्र
- बहानेबाज़ी
- यदि बाबा न होते
- सदाचार का ताबीज (ध्यान दें: इसी नाम से हरिशंकर परसाई का भी प्रसिद्ध व्यंग्य है)
- बौद्ध दर्शन एवं चिंतन पर ग्रंथ:
- बौद्ध धर्म: एक बुद्धिवादी अध्ययन
- दर्शन-वेद से मार्क्स तक
- भगवान बुद्ध और उनके अनुचर
- धर्म के नाम पर
- अनुवाद कार्य (Translations):
- इन्होंने पालि भाषा के प्रसिद्ध ग्रंथों का हिंदी में प्रामाणिक अनुवाद किया:
- जातक कथाएँ (6 खंडों में – पालि भाषा से हिंदी अनुवाद)
- धम्मपद
- डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रसिद्ध अंग्रेजी पुस्तक ‘द बुद्ध एंड हिज धम्मा’ (The Buddha and His Dhamma) का हिंदी अनुवाद ‘बुद्ध और उनका धर्म’ नाम से किया।
- इन्होंने पालि भाषा के प्रसिद्ध ग्रंथों का हिंदी में प्रामाणिक अनुवाद किया:
- आत्मकथात्मक ग्रंथ:
- जो कह न सका
- संस्कृति (निबंध):
- NCERT संदर्भ: कक्षा 10वीं की हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ (NCERT) में संकलित।
- विषय-वस्तु: इसमें लेखक ने ‘सभ्यता’ (Civilization) और ‘संस्कृति’ (Culture) के अंतर को बहुत ही सरल और व्यावहारिक उदाहरणों (जैसे- सुई-धागे का आविष्कार, आग की खोज) के माध्यम से स्पष्ट किया है।
- सम्मान और पुरस्कार
- साहित्य वाचस्पति: हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा सर्वोच्च मानद उपाधि से सम्मानित।
- महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार: यात्रा-साहित्य एवं पालि-साहित्य में योगदान हेतु।
- राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा हिंदी भाषा सेवा के लिए विशेष सम्मान।
- निधन की तिथि: 22 जून 1988
- स्थान: नागपुर, महाराष्ट्र
- परीक्षा-उपयोगी विशेष तथ्य
- सभ्यता और संस्कृति में अंतर (NCERT ‘संस्कृति’ पाठ के अनुसार):
- संस्कृति: मनुष्य की वह योग्यता या प्रेरणा जो उससे नया आविष्कार कराती है (उदा. आग या सुई-धागे की खोज करने वाली बुद्धि)।
- सभ्यता: संस्कृति द्वारा खोजे गए साधनों का भौतिक उपयोग (उदा. आग से खाना पकाना या कपड़ों का प्रयोग)।
- घुमक्कड़ परंपरा: राहुल सांकृत्यायन की तरह भदंत आनंद कौसल्यायन ने भी श्रीलंका, तिब्बत, जापान, रूस और यूरोप की व्यापक यात्राएँ कीं और अपने अनुभवों को साहित्यबद्ध किया।
- सभ्यता और संस्कृति में अंतर (NCERT ‘संस्कृति’ पाठ के अनुसार):
शिवपूजन सहाय
- जन्म तिथि: 9 अगस्त 1893
- जन्म स्थान: उन्वास गाँव, जिला-बक्सर (बिहार)
- बचपन का नाम: भोलानाथ (माता-पिता इन्हें ‘भोलानाथ’ कहकर पुकारते थे)।
- उपनाम/उपाधि: ‘हिंदी भाषा के अनगढ़ मानिक’, ‘भाषा के जादूगर’ (आचार्य शिवपूजन सहाय को गद्य की अपनी अनूठी और अलंकृत शैली के कारण ‘भाषा का जादूगर’ कहा जाता है)।
- साहित्यिक युग: द्विवेदी युग एवं छायावाद युग के संधि-स्थल के प्रमुख गद्यकार।
- पत्रिका संपादन: इन्होंने कई प्रसिद्ध साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का कुशल संपादन किया:
- मारवाड़ी सुधार (1921)
- मतवाला (1923, कोलकाता से – निराला जी के साथ)
- माधुरी (1924, लखनऊ)
- गंगा (1931, भागलपुर)
- बालक (1932)
- हिमालय (1946-47)
- साहित्य (बिहार राष्ट्रभाषा परिषद की पत्रिका)
- उपन्यास / आख्यान:
- देहाती दुनिया (1926):
- अत्यंत महत्वपूर्ण: यह हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास/कथा-ग्रंथ माना जाता है (फणीश्वरनाथ रेणु से भी पूर्व का)।
- विशेषता: इसमें ग्रामीण जीवन, लोक-संस्कृति, बोलचाल और बाल-मनोविज्ञान का अद्भुत यथार्थवादी चित्रण है।
- देहाती दुनिया (1926):
- कहानी संग्रह:
- महिला मोद (1925)
- कहानी कला (1927)
- ग्राम सुधार (1928)
- शिवपूजन सहाय की कहानियाँ
- संस्मरण एवं रेखाचित्र (Memoirs & Sketches):
- स्मृतिशेष (1940)
- वे दिन वे लोग (1965) – (साहित्यिक मित्रों और समकालीनों पर आधारित अत्यंत प्रसिद्ध संस्मरण ग्रंथ)।
- मेरा जीवन (आत्मकथात्मक संस्मरण)
- निबंध संग्रह:
- कुछ विचार (1939)
- ग्रंथावली:
- शिवपूजन रचनावली (4 खंडों में प्रकाशित)
- प्रसिद्ध कहानी एवं पाठ
- माता का अंचल:
- NCERT संदर्भ: कक्षा 10वीं की हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘कृतिका भाग-2’ (NCERT) में संकलित।
- मूल विषय: यह इनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ का ही एक अंश है। इसमें ग्रामीण बच्चों के खेल, पिता का स्नेहादर और संकट के समय माँ के अंचल में शरण लेने के वात्सल्य भाव का सुंदर चित्रण है। (इसमें मुख्य पात्र ‘भोलानाथ’ स्वयं लेखक का बचपन है)।
- मुंशी जी / कहानी का प्लॉट: इनकी चर्चित यथार्थवादी कहानियाँ।
- माता का अंचल:
- सम्मान और पुरस्कार
- पद्म भूषण (1960): भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए।
- बिहार राष्ट्रभाषा परिषद: ये बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के संचालकों और संस्थापकों में से एक रहे।
- निधन की तिथि: 14 जनवरी 1963
- स्थान: पटना, बिहार
- परीक्षा-उपयोगी विशेष तथ्य
- ‘भाषा का जादूगर’: परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है कि किस साहित्यकार को ‘भाषा का जादूगर’ कहा जाता है—उत्तर: आचार्य शिवपूजन सहाय। (ध्यान दें: ‘कलम का जादूगर’ रामवृक्ष बेनीपुरी को तथा ‘हॉकी का जादूगर’ मेजर ध्यानचंद को कहा जाता है)।
- प्रथम आंचलिकता: ‘देहाती दुनिया’ (1926) को आचार्य रामचंद्र शुक्ल एवं अन्य आलोचकों ने हिंदी की शुरुआती आंचलिक शैली की रचना माना है।
- निराला से संबंध: कोलकाता में ‘मतवाला’ पत्रिका के संपादन के दौरान सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी के साथ इनकी गहरी मित्रता रही।
कमलेश्वर
- पूरा नाम: कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना
- जन्म तिथि: 6 जनवरी 1932
- जन्म स्थान: मैनपुरी, उत्तर प्रदेश
- साहित्यिक युग: नई कहानी आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक।
- नई कहानी के तीन पुरोधा: मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव।
- पत्रिका संपादन:
- सारिका (इसका संपादन कर इन्होंने ‘समानांतर कहानी आंदोलन’ की शुरुआत की थी)।
- नई कहानियाँ
- दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर (समाचार पत्रों में मुख्य संपादक)।
- अन्य कार्यक्षेत्र: इन्होंने दूरदर्शन के अपर महानिदेशक के रूप में कार्य किया। दूरदर्शन पर उनका कार्यक्रम ‘परिक्रमा’ और धारावाहिक ‘दर्पण’ अत्यधिक लोकप्रिय रहा।
- नई कहानी एवं समानांतर कहानी आंदोलन
- नई कहानी आंदोलन (1956 ई. के लगभग): मोहन राकेश और राजेंद्र यादव के साथ मिलकर नेतृत्व किया।
- समानांतर कहानी आंदोलन (1972 ई.): ‘सारिका’ पत्रिका के माध्यम से आम आदमी के जीवन संघर्ष और यथार्थ को केंद्र में रखकर इस आंदोलन की शुरुआत की।
- प्रमुख उपन्यास
- एक सड़क सत्तावन गलियाँ (1957) – (इनका पहला उपन्यास)
- तीसरा आदमी (1961)
- डाकबंगला (1961)
- समुद्र में खोया हुआ आदमी (1967)
- लौटे हुए मुसाफ़िर (1975)
- काली आँधी (1974) – (राजनीतिक पृष्ठभूमि पर आधारित; इस पर ‘आँधी’ फिल्म भी बनी)
- आगामी अतीत (1976)
- रेगिस्तान (1988)
- कितने पाकिस्तान (2000):
- अत्यंत महत्वपूर्ण: यह भारत-पाकिस्तान विभाजन, सांप्रदायिकता और मानवीय त्रासदियों पर रचित कालजयी उपन्यास है।
- इसमें एक ‘अदालत’ का रूपक रचा गया है जिसमें इतिहास के पात्रों (जैसे बाबर, औरंगजेब, माउंटबेटन आदि) को कटघरे में खड़ा किया जाता है।
- इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार (2003) मिला।
- कहानी संग्रह
- राजा निरबंसिया (1957) – (शीर्षक कहानी ‘राजा निरबंसिया’ UGC NET के पाठ्यक्रम में शामिल है, जिसमें लोककथा और आधुनिक दांपत्य जीवन का समानांतर चित्रण है।)
- कस्बे का आदमी (1958)
- खोई हुई दिशाएँ (1963)
- मांस का दरिया (1966)
- बयान (1973)
- आज़ादी मुबारक (1998)
- जॉर्ज पंचम की नाक (NCERT कक्षा 10वीं में संकलित व्यंग्यात्मक कहानी)
- नाटक एवं एकांकी
- अधूरी आवाज़
- रेत पर लिखे नाम
- हिंदुस्तान हमारा
- आत्मकथा (तीन भागों में):
- जो मैंने जिया (1992)
- यादों का चिराग (1997)
- जलती हुई नदी (1999)
- संस्मरण: ‘अपनी लीक’, ‘हमराही’
- यात्रा-वृत्तांत: ‘आँखों देखा पाकिस्तान’ (2006)
- आलोचना एवं विचार: ‘नई कहानी की भूमिका’ (1966)
- फिल्म एवं पटकथा लेखन – कमलेश्वर जी ने हिंदी सिनेमा और धारावाहिकों के लिए भी ऐतिहासिक काम किया:
- प्रसिद्ध फिल्में (पटकथा/संवाद): ‘आँधी’, ‘मौसम’, ‘रजनीगंधा’, ‘छोटी सी बात’, ‘मिस्टर नटवरलाल’, ‘पति पत्नी और वो’, ‘रंग बिरंगी’।
- प्रसिद्ध टीवी धारावाहिक: ‘चंद्रकांता’, ‘दर्पण’, ‘युग’, ‘बहादुर शाह ज़फ़र’।
- कविता (Poetry)
- कमलेश्वर जी मुख्य रूप से कथाकार, उपन्यासकार, पटकथा लेखक और पत्रकार थे। कविता के क्षेत्र में इनका कोई स्वतंत्र काव्य-संग्रह प्रकाशित नहीं है।
- सम्मान और पुरस्कार
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (2003): उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ के लिए।
- पद्म भूषण (2005): भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में।
- निधन की तिथि: 27 जनवरी 2007
- स्थान: फरीदाबाद (हरियाणा) / नई दिल्ली।
- विशेष तथ्य
- ‘राजा निरबंसिया’ कहानी का शिल्प: इसमें दो कथाएँ साथ-साथ चलती हैं—एक पौराणिक/लोककथा (राजा जगदेव और रानी की) और दूसरी आधुनिक यथार्थवादी कथा (चंदर और उसकी पत्नी चंदा की)।
- NCERT संदर्भ: कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक ‘कृतिका भाग-2’ में इनकी प्रसिद्ध व्यंग्य कहानी ‘जॉर्ज पंचम की नाक’ संकलित है, जो औपनिवेशिक मानसिकता और सरकारी चाटुकारिता पर तीखा प्रहार करती है।
मधु कांकरिया
- जन्म तिथि: 23 मार्च 1957
- जन्म स्थान: कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
- शिक्षा: कोलकाता विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र (M.A.) तथा कंप्यूटर एप्लीकेशन में डिप्लोमा।
- साहित्यिक दृष्टि: सामाजिक सरोकार, महानगरों की अजनबीपन की भावना, स्त्रियों के संघर्ष, युवा पीढ़ी की दिशाहीनता और पूर्वोत्तर भारत एवं समाज के शोषित वर्गों पर केंद्रित सशक्त लेखन।
- भाषा-शैली: विचारप्रधान, संवाद शैली, संवेदनात्मक और चित्रात्मक भाषा।
- प्रमुख उपन्यास
- पत्ताखोर (2001):
- यह इनका प्रथम उपन्यास माना जाता है।
- विषय-वस्तु: पूर्वोत्तर भारत (विशेषकर सिक्किम और पूर्वोत्तर क्षेत्र) के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ वहाँ के श्रमिकों, पत्ता बटोरने वाली स्त्रियों तथा चाय बागानों में काम करने वालों के कठोर जीवन-संघर्ष का यथार्थ चित्रण।
- सलाम आखरी (2002):
- विषय-वस्तु: वैश्यावृत्ति के दलदल (रेड लाइट एरिया) में फँसी महिलाओं की समस्याओं और उनकी नारकीय ज़िंदगी पर आधारित मार्मिक उपन्यास।
- खुले गगन के लाल सितारे (2000/2004):
- विषय-वस्तु: युवा मन की भटकन, नशीली दवाओं की लत, वैश्वीकरण और बदलती जीवन-शैली के बीच युवा पीढ़ी के संकट का चित्रण।
- सूखते चिनार (2012):
- विषय-वस्तु: कश्मीर की सामाजिक-राजनीतिक समस्या, आतंकवाद के दौर में आम इंसान की पीड़ा और वहाँ की स्थिति पर केंद्रित।
- हम यहाँ थे (2018):
- विषय-वस्तु: राजस्थान की संस्कृति, कला, लोकजीवन और वहाँ के थार मरुस्थल की पृष्ठभूमि में लिखा गया उपन्यास।
- पुरस्कार: 31वें बिहारी पुरस्कार से सम्मानित।
- पत्ताखोर (2001):
- कहानी संग्रह
- चील (2000)
- अंतहीन मरुस्थल (2002)
- बीते हुए दिन भी (2004)
- दस प्रतिनिधि कहानियाँ
- युद्ध और बुद्ध
- फ़ाइलों में तैरती ज़िंदगी
- सम्राट का द्रोह
- प्रसिद्ध एवं चर्चित कहानियाँ:
- ‘अंतिम साक्ष्य’
- ‘चिड़िया ऐसे आकाश नहीं नापती’
- ‘रहस्य’
- ‘बुद्ध का मित्र’
- यात्रा-वृत्तांत (Travelogues)
- साना-साना हाथ जोड़ि…
- NCERT संदर्भ: यह यात्रा-वृत्तांत कक्षा 10वीं की हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘कृतिका भाग-2’ (NCERT) में संकलित है।
- विषय-वस्तु: सिक्किम की राजधानी गंतोक (गैंगटॉक) और युमथांग की यात्रा का सजीव एवं संवेदनात्मक वर्णन। इसमें हिमालय का सौंदर्य और वहाँ की महिलाओं/श्रमिकों के कठोर श्रम का सुंदर चित्रण है।
- शीर्षक का अर्थ: “छोटे-छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हूँ।” (यह सिक्किम की एक नेपाली प्रार्थना की पंक्ति है)।
- मुख्य पात्र/गाइड: जितेन नार्गे (जो उन्हें कटाओ, युमथांग और लाचुंग की यात्रा कराता है)।
- सफ़र सुहाना: बुद्ध और युद्ध
- साना-साना हाथ जोड़ि…
- कविता (Poetry)
- ध्यान दें, मधु कांकरिया मुख्य रूप से कथाकार (उपन्यासकार, कहानीकार और यात्रा-वृत्तांत लेखिका) हैं। कविता के क्षेत्र में इनकी कोई स्वतंत्र पुस्तक/संग्रह प्रकाशित नहीं है।
- सम्मान और पुरस्कार
- 31वाँ बिहारी पुरस्कार (2021): उपन्यास ‘हम यहाँ थे’ के लिए (के. के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा प्रदत्त)।
- कथा क्रम सम्मान
- माधवराव सप्रे पुरस्कार
- हेमंत स्मृति पुरस्कार
- मधु कांकरिया जी जीवित हैं और साहित्य सृजन में निरंतर सक्रिय हैं।
- विशेष तथ्य
- NCERT का ‘साना-साना हाथ जोड़ि…’: यह यात्रा-वृत्तांत कक्षा 10वीं की पुस्तक ‘कृतिका भाग-2’ में शामिल है।
- महिला लेखन में स्थान: यह समकालीन हिंदी साहित्य की प्रमुख महिला लेखिकाओं (मृदुला गर्ग, मैत्रेयी पुष्पा, प्रभा खेतान आदि) की श्रृंखला में एक अग्रणी नाम हैं।
शिवप्रसाद मिश्र रुद्र
- पूरा नाम: शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ (उपनाम: काशिकेय)
- जन्म तिथि: 12 मार्च 1911
- जन्म स्थान: काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश
- साहित्यिक ओळख: हिंदी साहित्य में ये काशी की संस्कृति, बोलचाल, बोली (कासिका/भोजपुरी प्रभाव) और बनारसी मिज़ाज के अमर चितेरे कथाकार एवं कवि के रूप में जाने जाते हैं।
- व्यक्तित्व: ये बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे—कवि, उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार, पत्रकार और विद्वान संपादक।
- पत्रकारिता एवं संपादन: इन्होंने ‘आज‘ (दैनिक पत्र), ‘सन्मार्ग‘, ‘संसार‘ और ‘नया समाज’ जैसी पत्रिकाओं का सफल संपादन/सह-संपादन किया।
- प्रमुख उपन्यास
- बहती गंगा (1952):
- यह इनका सबसे प्रसिद्ध और कालजयी उपन्यास/आख्यान है।
- विशेषता: इसे काशी (वाराणसी) के 200 वर्षों (1750 ई. से 1950 ई. तक) के सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक इतिहास की 39 तरंगों (कहानियों/प्रसंगों) में पिरोया गया है।
- इसे “काशी का सांस्कृतिक दस्तावेज़” कहा जाता है।
- सुचित्रा (1960): सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक धरातल पर रचित उपन्यास।
- बाँस की फाँस (1966): सामाजिक यथार्थ पर आधारित उपन्यास।
- बहती गंगा (1952):
- कहानी संग्रह
- ताल-तलैया
- गज़-गामिनी
- बेलबोटी
- प्रसिद्ध कहानियाँ: ‘सानी-पानी’, ‘दरोगा जी’, ‘हंसा तेईस वर्ष का था’।
- काव्य रचनाएँ (Poetry):
- रुद्र-परिणय (प्रबंध काव्य)
- गाथा (मुक्तक काव्य)
- दीपक
- गंगा-तरंग
- नोट: इन्होंने हिंदी के साथ-साथ संस्कृत और अवधी/भोजपुरी मिश्रित ब्रज में भी उत्कृष्ट छंद-रचनाएँ कीं।
- नाटक एवं एकांकी (Drama):
- जालियाँवाला (ऐतिहासिक नाटक)
- तुझको श्यामा ढूँढ रही (गीतिनाट्य)
- त्रिपुरारी
- निबंध एवं शोध:
- काशी की पांडित्य परंपरा (ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन)
- हमारे प्राचीन वाद्य यंत्र
- विद्यापति और उनका साहित्य
- सम्मान और पुरस्कार
- उपाधि: काशी की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा इन्हें ‘काशिकेय’ (काशी का सपूत/प्रतिनिधि) की उपाधि दी गई।
- राज्य पुरस्कार: उत्तर प्रदेश शासन एवं हिंदी संस्थान द्वारा इनकी साहित्यिक सेवाओं और विशेषकर ‘बहती गंगा’ जैसी विशिष्ट कृति के लिए सम्मानित किया गया।
- निधन की तिथि: 16 मई 1970 , वाराणसी (काशी), उत्तर प्रदेश
- विशेष तथ्य
- ‘बहती गंगा’ का शिल्प: UGC NET परीक्षा में बहुधा पूछा जाता है कि ‘बहती गंगा’ उपन्यास है या कहानी संग्रह। आचार्य रामचंद्र शुक्ल परंपरा के आलोचक इसे “कहानीबद्ध उपन्यास” या “आख्यानिक उपन्यास” मानते हैं, जिसकी हर तरंग स्वतंत्र होते हुए भी काशी के इतिहास से जुड़ी है।
- काशी की आंचलिकता: शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ को काशी की आंचलिक भाषा (काशिका), वहाँ के अखाड़ों, घाटों, बोली और वहाँ के जीवंत पात्रों को साहित्य में अमर करने का श्रेय जाता है।
अज्ञेय
- पूरा नाम: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
- जन्म तिथि: 7 मार्च 1911
- जन्म स्थान: कसया (कुशीनगर), उत्तर प्रदेश
- उपनाम/उपाधि: ‘अज्ञेय’ (यह नाम उन्हें जैनेंद्र कुमार और प्रेमचंद ने दिया था जब वे जेल में थे और उनकी रचनाएँ बिना नाम के भेजी जा रही थीं)।
- साहित्यिक युग: प्रयोगवाद (Experimentism) एवं नई कविता के प्रवर्तक।
- क्रांतिकारी जीवन: युवावस्था में स्वतंत्रता आंदोलन (क्रांतिकारी दल) से जुड़े रहे और जेल यात्रा भी की।
- पत्रिका संपादन:
- ‘सैनिक’ (आगरा)
- ‘विशाल भारत’ (कोलकाता)
- ‘प्रतीक’ (1947, इलाहाबाद से – प्रयोगवाद का अग्रदूत पत्र)
- ‘दिनमान’ (प्रसिद्ध समाचार साप्ताहिक)
- ‘नया प्रतीक’ और अंग्रेजी पत्र ‘वाक्’ (VAC)
- अज्ञेय जी को हिंदी साहित्य में ‘तार सप्तक’ परंपरा की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है:
- प्रथम तार सप्तक (1943 ई.): प्रयोगवाद का प्रारंभ। इसमें 7 कवि शामिल थे (अज्ञेय, मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा)।
- दूसरा सप्तक: 1951 ई.
- तीसरा सप्तक: 1959 ई.
- चौथा सप्तक: 1979 ई.
- प्रमुख काव्य कृति
- भग्नदूत (1933) – (प्रथम काव्य संग्रह)
- चिंता (1942)
- इत्यलम् (1946)
- हरी घास पर क्षण भर (1949)
- बावरा अहेरी (1954)
- इंद्रधनु रौंदे हुए ये (1957)
- अरी ओ करुणा प्रभामय (1959)
- आंगन के पार द्वार (1961) – (अत्यंत महत्वपूर्ण)
- पूर्वा (1965)
- सुनहले शैवाल (1966)
- कितनी नावों में कितनी बार (1967) – (ज्ञानपीठ पुरस्कृत)
- क्योंकि मैं उसे जानता हूँ (1970)
- सागर मुद्रा (1972)
- पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (1973)
- महावृक्ष के नीचे (1980)
- नदी की बाँक पर छाया (1981)
- ऐसा कोई घर आपने देखा है (1986)
- कविताएँ
- असाध्य वीणा – (जापानी कथा ‘तकामुरा’ पर आधारित लंबी कविता, ‘आंगन के पार द्वार’ संग्रह में संकलित; इसमें ‘प्रियंवद केशकंबली’ मुख्य पात्र है)।
- कलगी बाजरे की – (नवीन उपमानों के प्रयोग के लिए प्रसिद्ध)।
- यह दीप अकेला – (NCERT कक्षा 12 में संकलित, व्यक्ति और समाज के संबंधों पर आधारित)।
- साँप – (“साँप! तुम सभ्य तो हुए नहीं…”) – आधुनिक सभ्यता पर तीखा व्यंग्य।
- हरी घास पर क्षण भर
- नदी के द्वीप – (व्यक्ति की चेतना और अस्तित्व का प्रतीक)।
- हिरोशिमा – (अणु बम के मानवीय विनाश पर रचित प्रसिद्ध कविता)।
- उपन्यास (Novels):
- शेखर: एक जीवनी – (दो भागों में: भाग-1 ‘उत्थान’ 1941, भाग-2 ‘संघर्ष’ 1944) – मनोविश्लेषणवादी उपन्यास।
- नदी के द्वीप (1951) – व्यक्ति-स्वातंत्र्य और प्रेम संबंध।
- अपने-अपने अजनबी (1961) – अस्तित्ववादी (Existentialist) दर्शन पर आधारित।
- कहानी संग्रह (Story Collections):
- विपथगा (1937)
- परंपरा (1940)
- कोठरी की बात (1945)
- शरणार्थी (1948)
- जयदोल (1951)
- ये तेरे प्रतिरूप (1961)
- अमर वल्लरी
- प्रसिद्ध कहानियाँ: ‘गैंग्रीन’ (उर्फ ‘रोज़’ – NCERT में संकलित), ‘हजामत का साबुन’, ‘शरणदाता’।
- यात्रा वृत्तांत (Travelogues):
- अरे यायावर रहेगा याद (1953) – (स्वदेश यात्रा)
- एक बूंद सहसा उछली (1960) – (विदेश यात्रा)
- निबंध एवं विचार साहित्य:
- त्रिशंकु (1945)
- आत्मनेपद (1960)
- आलवाल (1971)
- लिखी कागद कोरे (1972)
- अद्यतन (1977)
- नाटक (Drama):
- उत्तर प्रियदर्शी (1967) – (गीतिनाट्य, सम्राट अशोक पर आधारित)।
- सम्मान और पुरस्कार
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1964): काव्य संग्रह ‘आंगन के पार द्वार’ के लिए।
- ज्ञानपीठ पुरस्कार (1978): काव्य संग्रह ‘कितनी नावों में कितनी बार’ के लिए।
- गोल्डन रीथ पुरस्कार (Golden Wreath Award): 1983 में स्ट्रुगा अंतरराष्ट्रीय कविता उत्सव (मैसिडोनिया) में अंतरराष्ट्रीय स्तर का सम्मान।
- निधन की तिथि: 4 अप्रैल 1987 , नई दिल्ली
- विशेष तथ्य
- प्रयोगवाद का मोटो: अज्ञेय जी ने ‘दूसरे सप्तक’ की भूमिका में लिखा था— “कवि प्रयोगवादी नहीं हैं, न प्रयोग अपने-आप में इष्ट या साध्य है। ठीक उसी तरह जैसे कविता का कोई दावा नहीं है, वैसे ही प्रयोग का भी कोई दावा नहीं है… कवि राहों के अन्वेषी हैं।”
- अस्तित्ववाद (Existentialism): अज्ञेय जी पर पाश्चात्य दार्शनिकों (जैसे सार्त्र और कामू) के अस्तित्ववाद का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है।
- NCERT संदर्भ:
- कक्षा 12 (अंतरा भाग-2): कविताएँ — ‘यह दीप अकेला’ और ‘मैंने देखा एक बूंद’।
- कक्षा 12 (आरोह/अंतरा): प्रसिद्ध कहानी — ‘रोज़’ (गैंग्रीन) जिसमें मालती नामक महिला के एकरस और नीरस वैवाहिक जीवन का चित्रण है।
