JharkhandGK
झारखण्ड में आदिवासी समुदायों की कुल संख्या 33 है । इनमें से अधिकतर जनजातियां किस प्रजाति की हैं?
- आस्ट्रिक
- प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड
- नीग्रीटो
- मंगोलायड
Explanation:
- झारखंड की अधिकतर जनजातियाँ प्रोटो-आस्ट्रेलायड प्रजाति से संबंधित हैं।
- प्रोटो आस्ट्रेलायड समूह में निम्न जनजातियाँ शामिल हैं:
- संथाल, मुण्डा, हो, लोहरा, खड़िया, भूमिज, करमाली, चेरो, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, गोड़ाइत, कोरा, कोरवा, असुर, बिरहोर, सबर, कवर, कोल, परहिया, बिरजिया
- प्रोटो आस्ट्रेलायड समूह में निम्न जनजातियाँ शामिल हैं:
- द्रविड़ समूह में उराँव, किसान, खोंड, खरवार, गोंड, चीक बड़ाइक, बैगा, बथुड़ी, बेदिया, बिंझिया, माहली आदि शामिल हैं।
- भाषायी आधार पर वर्गीकरण:
- ऑस्ट्रो-एशियाटिक (मुण्डा) परिवार – संथाली, मुण्डारी, हो, खड़िया, कोरा, बिरहोरी, असुरी आदि
- द्रविड़ परिवार – कुडुख (उराँव), मालतो (सौरिया/माल पहाड़िया), गोंडी
- इंडो-आर्यन परिवार – खोरठा (करमाली), सादरी/नागपुरी (कवर, लोहरा, चेरो, बिंझिया, गोड़ाइत, चीक बड़ाइक)
इनमें कौन सी जनजाति झारखण्ड के अलावा और कहीं नहीं पायी जाती है?
- बिरहोर
- मुण्डा
- उरांव
- संथाल
Explanation:
- मुण्डा जनजाति केवल झारखंड राज्य में ही पाई जाती है।
- मुण्डा शब्द का अर्थ – विशिष्ट व्यक्ति (गाँव का राजनीतिक प्रमुख)
- प्रमुख निवास स्थान – राँची, गुमला, सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां
- भाषा – मुण्डारी (ऑस्ट्रो-एशियाटिक परिवार)
- यह झारखंड की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति है (जनसंख्या का 14.56%)
- अन्य जनजातियों का विस्तार:
- बिरहोर – छोटानागपुर पठार का उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र (मूलत: झारखंड में ही)
- उराँव – दक्षिणी छोटानागपुर, पलामू, उत्तरी छोटानागपुर, कोल्हान, संथाल परगना
- संथाल – संथाल परगना, हजारीबाग, बोकारो, गिरिडीह, चतरा, राँची, सिंहभूम
मलेर किससे संबंधित है?
- सौरिया पहाड़िया
- बिरहोर
- उरांव
- भूमिज
Explanation:
- मलेर सौरिया पहाड़िया जनजाति का दूसरा नाम है।
- सौरिया पहाड़िया को मलेर भी कहा जाता है।
- प्रमुख निवास – राजमहल क्षेत्र के ‘दामिन-ए-कोह’
- इन्हें संथाल परगना का आदि निवासी माना जाता है।
- माल पहाड़िया को बुचानन हैमिल्टन ने भी मलेर कहा है।
- यह आदिम जनजाति है।
- भाषा – मालतो (द्रविड़ भाषा परिवार)
किरिंग बापला किस आदिवासी से संबंधित है?
- संथाल
- बिरहोर
- हो
- बैगा
Explanation:
- किरिंग बापला संथाल जनजाति का सर्वाधिक प्रचलित विवाह है।
- किरिंग बापला – माता-पिता द्वारा मध्यस्थ के माध्यम से विवाह तय होता है।
- संथाल जनजाति के अन्य विवाह प्रकार (बापला):
- गोलाइटी बापला – गोलट/विनिमय विवाह
- टुनकी दिपिल बापला – गरीब परिवारों में (कन्या को वर के घर लाकर सिंदूर दान)
- धरदी जावाय बापला – दामाद को घर जंवाई बनाना
- अपगिर बापला – प्रेम विवाह (पंचायत की सहमति से)
- इतुत बापला – लड़के द्वारा किसी अवसर पर लड़की को सिंदूर लगाकर विवाह
- निर्बोलक बापला – लड़की द्वारा हठपूर्वक लड़के के घर रहना
- बहादुर बापला – जंगल में भागकर प्रेम विवाह
- राजा-राजी बापला – गाँव की स्वीकृति से प्रेम विवाह
- सांगा बापला – विधवा/तलाकशुदा का पुनर्विवाह
- किरिंग जवाय बापला – विवाह पूर्व गर्भधारण के बाद विवाह
झूम किससे संबंधित है?
- संथाल
- बिरहोर
- पहाड़िया
- बैगा
Explanation:
- झूम (स्थानांतरणशील कृषि) पहाड़िया जनजाति से संबंधित है।
- सौरिया पहाड़िया – स्थानांतरणशील कृषि को ‘कुरवा’ कहते हैं।
- माल पहाड़िया – झूम खेती को ‘कुरवा’ कहते हैं।
- अन्य जनजातियों में झूम खेती के नाम:
- परहिया – ‘बियोड़ा’ या ‘झूम’
- गोंड – ‘दीपा’ या ‘बेवार’
- खोंड – ‘पोड़चा’
- कोरवा – ‘बियोड़ा’
- बिरजिया – पाट क्षेत्र में स्थानांतरणशील कृषि
- असुर जनजाति की संस्कृति को ‘मय संस्कृति’ कहा जाता है।
अंदी और ओपोरतिपि नाम से प्रचलित विवाह निम्न में किससे संबंधित है?
- संथाल
- बिरहोर
- हो
- बैगा
Explanation:
- अंडी/ओपोरतीपि विवाह हो जनजाति में प्रचलित है।
- अंडी/ओपोरतीपि विवाह – वर द्वारा कन्या का हरण करके विवाह।
- हो जनजाति के विवाह प्रकार:
- आदि विवाह – सर्वाधिक श्रेष्ठ (वर स्वयं प्रस्ताव लेकर वधु के घर जाता है)
- दिकू आदि विवाह
- अंडी/ओपोरतीपि विवाह – हरण विवाह
- राजी-खुशी विवाह – प्रेम विवाह
- आदेर/अनादर विवाह – हठ विवाह
- हो जनजाति की विशेषताएँ:
- यह झारखंड की चौथी सबसे बड़ी जनजाति है।
- प्रमुख निवास – कोल्हान प्रमण्डल
- भाषा – हो (मुण्डारी परिवार)
- लिपि – ‘बारङचित्ति’ (आविष्कारक – लाको बोदरा)
- पारंपरिक शासन प्रणाली – मुण्डा-मानकी प्रशासन
घुमकुड़िया निम्नलिखित में से किससे संबंधित है?
- संथाल
- बिरहोर
- हो
- उरांव
Explanation:
- घुमकुरिया उराँव जनजाति का युवागृह है।
- युवागृह – जिसमें युवक-युवतियों को जनजातीय रीति-रिवाजों एवं परंपराओं का प्रशिक्षण दिया जाता है।
- प्रवेश आयु – 10-11 वर्ष
- सदस्यता समाप्त – विवाह होने पर
- विभिन्न जनजातियों में युवागृह के नाम:
- संथाल – घोटुल
- गोंड – घोटुल/गोटुल
- उराँव – घुमकुरिया
- खड़िया – गितिओ
- मुण्डा, कोरा, असुर – गितिओड़ा
- बिरहोर – गितिजोरी/गत्योरा
- हो – गोतिआरा
- सौरिया पहाड़िया – कोड़वाह
झारखण्ड के निम्नलिखित जनजातियों में से किस जनजाति को शिकारी-संग्रहकर्ता के रूप में वर्गीकृत किया गया है?
- बिरहोर
- सौरिया पहाड़िया
- चीक बड़ाईक
- मुण्डा
Explanation:
- बिरहोर जनजाति को शिकारी-संग्रहकर्ता के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- बिरहोर (शाब्दिक अर्थ – ‘जंगल का आदमी’)
- यह घूमन्तू जीवन व्यतीत करती है।
- घूमन्तू बिरहोर – उलथू या भुलियास
- स्थायी बिरहोर – जांघी या थानिया
- प्रमुख पेशा – लकड़ी काटना, शिकार करना एवं खाद्य संग्रहण
- अन्य शिकारी-संग्रहकर्ता जनजातियाँ:
- कोरवा – शिकारी-संग्रहकर्ता
- पहाड़ी खड़िया – शिकारी-संग्रहकर्ता
झारखण्ड में कितने जनजातीय समूह हैं?
- 33
- 32
- 31
- 30
Explanation:
- झारखंड में मान्यता प्राप्त जनजातियों की कुल संख्या 33 है।
- आदिम जनजाति – 08
- अनुसूचित जनजाति – 25
- आदिम जनजातियाँ (08):
- परहिया, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, बिरहोर, बिरजिया, असुर, सबर, कोरवा
- 1872 की पहली जनगणना में 18 जनजातियाँ सूचीबद्ध की गईं।
- कोरा जनजाति को 1931 की जनगणना में शामिल किया गया।
- ललित प्रसाद विद्यार्थी ने सांस्कृतिक आधार पर झारखंड की जनजातियों का वर्गीकरण किया है।
झारखण्ड के निम्नलिखित जनजातियों में से किस जनजाति को शिकारी-संग्रहकर्ता के रूप में वर्गीकृत किया गया है?
- कोरवा
- सौरिया पहाड़िया
- चीक बड़ाईक
- मुण्डा
Explanation:
- कोरवा जनजाति को शिकारी-संग्रहकर्ता के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- कोरवा जनजाति को कोलेरियन जनजाति समूह का जनक माना जाता है।
- झारखंड में इनका आगमन – मध्य प्रदेश से
- प्रमुख निवास – पलामू प्रमण्डल
- कोरवा की उपजातियाँ:
- पहाड़ी कोरवा – पहाड़ी क्षेत्र में
- डीहा/डिहारिया कोरवा – गाँव में
- स्थानांतरणशील कृषि को ‘बियोड़ा’ कहते हैं।
निम्नलिखित में से कौन-सी जाति झारखण्ड में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित जाति नहीं है?
- बन्तर
- चमार
- धानक
- कंजर
Explanation:
- धानक झारखंड में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित नहीं है।
- बन्तर, चमार, कंजर – ये झारखंड में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित हैं।
- अनुसूचित जाति – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अधिसूचित।
- अनुसूचित जनजाति – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अधिसूचित।
टोकरी बनाने वालों का छोटा समुदाय जो अपने घरों की दीवारों पर प्रकृति पार्थिव रंगों में मुख्यतः पुष्पीय और जंगल आधारित मूल भावों का प्रयोग करते हैं, समुदाय का नाम बताएँ
- संथाल
- खरवार
- सबर
- तूरी
Explanation:
- तूरी टोकरी बनाने वालों का छोटा समुदाय है।
- ये अपने घरों की दीवारों पर प्रकृति पार्थिव रंगों में पुष्पीय और जंगल आधारित मूल भावों का प्रयोग करते हैं।
- अन्य टोकरी बनाने वाली जनजातियाँ:
- माहली – बांस फोड़ माहली (बांस से टोकरी बनाने वाले)
- परहिया – बांस की टोकरी एवं ढोल बनाना
इनमें से कौन-सी जनजाति झारखण्ड के पलामू जनपद में पाई जाती है?
- उरांव
- मुण्डा
- भूमिज
- कोरवा
Explanation:
- कोरवा जनजाति पलामू प्रमण्डल में पाई जाती है।
- कोरवा का निवास – पलामू, गढ़वा, लातेहार, गुमला
- पलामू में पाई जाने वाली अन्य जनजातियाँ:
- उराँव – दक्षिणी छोटानागपुर, पलामू
- खरवार – पलामू प्रमण्डल
- चेरो – पलामू, लातेहार
- परहिया – पलामू प्रमण्डल
- गोंड – गुमला, सिमडेगा, राँची, पलामू
- किसान – पलामू, लातेहार, गढ़वा
- बैगा – पलामू प्रमण्डल
- कवर – पलामू, गुमला, सिमडेगा
इनमें से कौन-सी जनजाति सत्य के लिए तथा सत्य हेतु सभी कुछ बलिदान करने के लिए प्रसिद्ध है?
- खरवार
- मुण्डा
- संथाल
- सौरिया
Explanation:
- खरवार जनजाति सत्य के लिए तथा सत्य हेतु सभी कुछ बलिदान करने के लिए प्रसिद्ध है।
- खरवार को ‘अठारह हजारी’ भी कहा जाता है।
- यह एक मार्शल (लड़ाकू) जनजाति है।
- सत्य बोलने के गुण के लिए प्रसिद्ध।
- यह झारखंड की पाँचवीं सबसे बड़ी जनजाति है।
- खरवार की विशेषताएँ:
- प्रजाति – द्रविड़
- भाषा – खेरवारी (ऑस्ट्रो-एशियाटिक)
- सूर्यवंशी राजपूत हरिशचन्द्र रोहिताश्व का वंशज माने जाते हैं।
- सामाजिक स्तर का मुख्य निर्धारक – भू-संपदा
झारखण्ड में भारत की जनजातीय जनसंख्या कितने प्रतिशत है?
- 2%
- 8.30%
- 10.2%
- 20.4%
Explanation:
- 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या 86,45,042 है।
- यह राज्य की कुल जनसंख्या (3,29,88,134) का 26.2% है।
- भारत की कुल जनजातीय जनसंख्या में झारखंड का हिस्सा 8.30% है।
- झारखंड में आदिम जनजातियों की कुल संख्या – 1,92,425 (0.72%)
- 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जनजाति आबादी के मामले में झारखंड छठे स्थान पर है।
- प्रथम – मध्य प्रदेश (15.3 मिलियन)
- द्वितीय – महाराष्ट्र (10.5 मिलियन)
- तृतीय – ओडिशा (9.6 मिलियन)
- चतुर्थ – राजस्थान (9.2 मिलियन)
- पंचम – पश्चिम बंगाल (5.3 मिलियन)
- छठा – झारखंड (8.6 मिलियन)
2011 की जनगणना के अनुसार झारखण्ड अनुसूचित जनजाति की आबादी के मामले में …….स्थान पर है।
- छठें
- 8वें
- 10वें
- 20वें
Explanation:
- 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड अनुसूचित जनजाति की आबादी के मामले में भारत में छठे स्थान पर है।
- राज्य की जनजातीय जनसंख्या – 86,45,042
- झारखंड में सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजातियाँ:
- संथाल (35%) – प्रथम
- उराँव (18.14%) – द्वितीय
- मुण्डा (14.56%) – तृतीय
- हो – चतुर्थ
- खरवार – पंचम
श्री ललित प्रसाद विद्यार्थी के वर्गीकरण के अनुसार, निम्न में से कौन-सी जनजातियाँ शिकार संग्रहकर्ता के प्रकार की थीं?
- बिरहोर, कोरवा, पहाड़ी खड़िया
- मुंडा, संथाल
- उरांव, खड़िया
- असुर, बंजारा, बेदिया
Explanation:
- ललित प्रसाद विद्यार्थी ने सांस्कृतिक आधार पर झारखंड की जनजातियों का वर्गीकरण किया है।
- शिकार-संग्रहकर्ता प्रकार की जनजातियाँ – बिरहोर, कोरवा, पहाड़ी खड़िया
- अन्य वर्गीकरण:
- सामान्य कारीगर – महली, लोहरा, करमाली
- सामान्य कृषक – मुंडा, संथाल, उरांव, खड़िया
- ललित प्रसाद विद्यार्थी के वर्गीकरण की विशेषता:
- इन्होंने सांस्कृतिक मानदंडों को आधार बनाया।
- यह पारंपरिक व्यवसाय एवं जीवन शैली पर आधारित है।
ललित प्रसाद विद्यार्थी द्वारा दिए गए वर्गीकरण के अनुसार कौन-सी जनजाति सामान्य कारीगर प्रकार की है?
- बिरहोर, कोरवा, पहाड़ी खड़िया
- मुंडा, संथाल
- महली, लोहरा, करमाली
- असुर, बंजारा, बेदिया
Explanation:
- ललित प्रसाद विद्यार्थी के वर्गीकरण में सामान्य कारीगर प्रकार की जनजातियाँ महली, लोहरा, करमाली हैं।
- महली – बांस कला में पारंगत (टोकरी, ढोल बनाने वाले)
- लोहरा – लौह उपकरण बनाने वाले (कृषि संबंधी उपकरण)
- करमाली – दस्तकार/शिल्पकार (लोहा गलाना, औजार बनाना)
- विद्यार्थी वर्गीकरण के अन्य प्रकार:
- शिकार-संग्रहकर्ता – बिरहोर, कोरवा, पहाड़ी खड़िया
- सामान्य कृषक – मुंडा, संथाल, उरांव, खड़िया
- उच्च हिन्दू स्तर – चेरो, खरवार, बिंझिया, बेदिया, बथुड़ी
2001 की जनगणना अनुसार कौन-सी प्रजाति में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है?
- बिरहोर, कोरवा
- मुंडा, संथाल
- महली, लोहरा
- खड़िया, हो
Explanation:
- 2001 की जनगणना में खड़िया एवं हो जनजातियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक थी।
- खड़िया – प्रोटो-आस्ट्रेलायड समूह
- हो – प्रोटो-आस्ट्रेलायड समूह
- यह लिंग अनुपात का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, जो दर्शाता है कि इन जनजातियों में महिला सशक्तिकरण एवं सामाजिक स्थिति अन्य जनजातियों से भिन्न है।
अनुसूचित जनजातियों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए संविधान के किस अनुच्छेद में वर्णन किया गया है?
- 370
- 375
- 275
- 276
Explanation:
- अनुसूचित जनजातियों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 275 में प्रावधान है।
- अनुच्छेद 275 – अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण हेतु विशेष अनुदान का प्रावधान।
- राष्ट्रपति द्वारा राज्यों को अनुदान देने का प्रावधान।
- अन्य संबंधित अनुच्छेद:
- अनुच्छेद 342 – भारत के राष्ट्रपति द्वारा अनुसूचित जनजातियों को अधिसूचित करना।
- अनुच्छेद 244 – अनुसूचित क्षेत्र एवं जनजातीय क्षेत्र का प्रशासन।
- अनुच्छेद 338-A – राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST)
झारखण्ड में मान्यता प्राप्त जनजातियों की कुल संख्या है। , TGT-2009, Co-operative Officer & Audit Officer-2007
- 37
- 33
- 25
- 32
Explanation:
- झारखंड में मान्यता प्राप्त जनजातियों की कुल संख्या 33 है।
- आदिम जनजाति – 08
- अनुसूचित जनजाति – 25
- झारखंड की 33 जनजातियाँ:
- संथाल, उराँव, मुण्डा, हो, कोल, कवर, कोरा, किसान, करमाली, खोंड, खरवार, खड़िया, गोंड, गोड़ाइत, चेरो, चीक बड़ाईक, बैगा, बंजारा, बथुड़ी, बेदिया, बिंझिया, लोहरा, भूमिज, माहली
- आदिम (08) – परहिया, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, बिरहोर, बिरजिया, असुर, सबर, कोरवा
झारखण्ड में आदिवासियों की समस्या के निराकरण के लिए राज्य में किस संस्था का गठन किया गया था ?
- पंचायत
- ग्राम संघ
- आदिवासी संघ
- कुकुटलाड
Explanation:
- झारखंड में आदिवासियों की समस्या के निराकरण के लिए पंचायत संस्था का गठन किया गया था।
- जनजातीय समाज में पंचायत प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था का आधार है।
- विभिन्न जनजातियों में पंचायत व्यवस्था:
- संथाल – माँझीथान (पंचायत स्थल)
- उराँव – पंचोरा
- मुण्डा – हातू (ग्राम पंचायत)
- हो – पीर/पड़हा (7-12 गाँवों का समूह)
- खड़िया – धीरा (जातीय पंचायत)
निम्नलिखित में से कौन-सा जनजातियों के लिए विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए) की स्थापना का उद्देश्य है?
- राजनीतिक जागरूकता में वृद्धि
- सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ाएं
- धार्मिक शिक्षाओं में सुधार करें
- ये सभी
Explanation:
- विशेष केंद्रीय सहायता (SCA – Special Central Assistance) का उद्देश्य जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ाना है।
- यह अनुसूचित जनजाति हेतु केंद्र सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सहायता है।
- SCA के मुख्य उद्देश्य:
- जनजातीय क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का विकास
- आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार
- शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना
- यह अनुच्छेद 275 के तहत प्रदान किया जाता है।
झारखण्ड राज्य में लगभग आदिवासी जनसंख्या ग्रामीण इलाकों में रहती है।
- 50%
- 70%
- 80%
- 90%
Explanation:
- झारखंड राज्य की लगभग 90% आदिवासी जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है।
- राज्य की कुल जनजातीय जनसंख्या 86,45,042 है।
- यह राज्य की कुल जनसंख्या का 26.2% है।
- ग्रामीण-शहरी वितरण:
- आदिवासी समाज परंपरागत रूप से वन एवं कृषि आधारित जीवन जीते हैं।
- इसलिए वे ग्रामीण क्षेत्रों में ही अधिक निवास करते हैं।
झारखण्ड में आदिवासी समूह के लिए हंटर समूह का प्रकार है?
- एच ओ
- संथाल
- हिल खड़िया
- लोहरा
Explanation:
- हंटर समूह (Hunter Group) के अंतर्गत हिल खड़िया (पहाड़ी खड़िया) आती है।
- पहाड़ी खड़िया – खड़िया जनजाति का एक वर्ग, जो सर्वाधिक पिछड़ा है।
- यह शिकारी-संग्रहकर्ता जीवन शैली जीती है।
- हंटर समूह (शिकारी समूह) की जनजातियाँ:
- बिरहोर
- कोरवा
- पहाड़ी खड़िया (हिल खड़िया)
- ये वे जनजातियाँ हैं जो शिकार एवं संग्रहण पर निर्भर हैं।
अनुसूचित क्षेत्र के आदेश के तहत, 2003 झारखण्ड में कितने जिलों को अनुसूचित क्षेत्र के रूप में पहचाना गया है?
- 10 जिले
- 125
- 25 जिले
- 15 जिले
Explanation:
- 2003 में अनुसूचित क्षेत्र के आदेश के तहत झारखंड के 15 जिलों को अनुसूचित क्षेत्र के रूप में पहचाना गया है।
- अनुसूचित क्षेत्र – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 एवं पाँचवीं अनुसूची के तहत अधिसूचित क्षेत्र।
- अनुसूचित क्षेत्रों की विशेषताएँ:
- यहाँ जनजातीय जनसंख्या अधिक है।
- इन क्षेत्रों में विशेष प्रशासनिक प्रावधान लागू होते हैं।
- राज्यपाल को इन क्षेत्रों में विशेष अधिकार प्राप्त हैं।
- झारखंड के 25 जिले हैं, जिनमें से 15 अनुसूचित क्षेत्र हैं।
निम्नलिखित बयानों पर विचार करें :
अनुसूचित जाति झारखण्ड राज्य में अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ाता है।
सभी शैक्षणिक विकास कार्यक्रम पूरी तरह से झारखण्ड राज्य सरकार द्वारा स्थापित किए गए हैं।
आश्रम विद्यालय का उद्देश्य ‘गुरुकुल’ शैली की शिक्षा प्रदान करना है।
- II और III
- I और III
- I और II
- केवल II
Explanation:
- अनुसूचित जनजातियों के कल्याण हेतु संविधान के अनुच्छेद 275 में प्रावधान है, जो उनके सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ाता है।
- कथन I – सही है, क्योंकि अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए विशेष प्रावधान हैं।
- आश्रम विद्यालय का उद्देश्य ‘गुरुकुल’ शैली की शिक्षा प्रदान करना है।
- कथन III – सही है।
- कथन II – गलत है, क्योंकि सभी शैक्षणिक विकास कार्यक्रम पूरी तरह से राज्य सरकार द्वारा स्थापित नहीं हैं, केंद्र सरकार की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
झारखण्ड की जनजातीय जनसंख्या मुख्यतः किस धर्म का पालन करती है?
- ईसाई धर्म
- इस्लाम धर्म
- हिंदू धर्म
- सिक्ख धर्म
Explanation:
- झारखंड की जनजातीय जनसंख्या मुख्यतः हिंदू धर्म का पालन करती है।
- हालाँकि कई जनजातियाँ सरना धर्म (प्रकृति पूजा) का भी पालन करती हैं, जो हिंदू धर्म का ही एक रूप माना जाता है।
- सरना धर्म – झारखंड का मूल धर्म है।
- आदिवासियों के पूजा स्थल को सरना स्थल या जाहेर थान कहा जाता है।
- अपवाद:
- कुछ जनजातियों में ईसाई धर्म का भी प्रभाव है (विशेषकर उराँव, मुण्डा आदि में)।
- ताना भगत एवं साफाहोड़ समूह मांसाहार नहीं करते हैं।
जनजातीय अनुसंधान संस्थान को वर्ष ….. में स्थापित किया गया था।
- 1991
- 1947
- 1953
- 1959
Explanation:
- जनजातीय अनुसंधान संस्थान (Tribal Research Institute) की स्थापना 1953 में की गई थी।
- इस संस्थान का उद्देश्य जनजातीय संस्कृति, परंपराओं एवं सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर शोध करना है।
- झारखंड के अन्य महत्वपूर्ण संस्थान:
- झारखंड भाषा साहित्य संस्कृति अखरा – 2003 में स्थापित (राँची में)
- सी-डैक (C-DAC) – झारखंड में डिजाइन प्रशिक्षण हेतु
निम्नलिखित को मिलाएँ-
- व्यवसाय जनजाति
- 1. स्थापित कृषि A.सौरिया – पहाड़िया
- 2. साधारण कलाकार B.मुंडा
- 3. कृषि स्थानांतरण C.हिल खड़िया
- 4. हंटर गैदरर D.चीक बड़ाईक
- 1: B, 2 : D, 3 : A, 4:C
- 1: B, 2: A, 3 : C, 4: D
- 1: C, 2: D, 3 : B, 4: A
- 1:D, 2: B, 3 : A, 4:C
Explanation:
- ललित प्रसाद विद्यार्थी के वर्गीकरण के अनुसार सही मिलान:
- 1. स्थापित कृषि → B. मुण्डा
- मुण्डा जनजाति स्थापित कृषि (बसे हुए किसान) करती है।
- उनकी भूमि पंकु (हमेशा उपज देने वाली), नागरा (औसत उपज), खिरसी (बालू युक्त) तीन प्रकार की होती है।
- 2. साधारण कलाकार → D. चीक बड़ाईक
- चीक बड़ाईक बुनकर जनजाति है, इन्हें ‘हाथ से बने कपड़ों का जनक’ कहा जाता है।
- इनके पेशेगत दृष्टि से बुनाई मुख्य कार्य है।
- 3. कृषि स्थानांतरण → A. सौरिया-पहाड़िया
- सौरिया पहाड़िया स्थानांतरणशील कृषि (झूम) करते हैं, जिसे ‘कुरवा’ कहते हैं।
- 4. हंटर गैदरर (शिकारी-संग्रहकर्ता) → C. हिल खड़िया
- हिल खड़िया (पहाड़ी खड़िया) शिकार-संग्रहण पर निर्भर है।
- यह खड़िया जनजाति का सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग है।
- 1. स्थापित कृषि → B. मुण्डा
झारखण्ड की अनुसूचित जनजाति के कितने प्रतिशत परिवारों का कोई बैंक खाता है ?
- 53%
- 51%
- 57%
- 54%
Explanation:
- झारखंड की अनुसूचित जनजाति के 51% परिवारों का कोई बैंक खाता है।
- यह वित्तीय समावेशन का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
- इसमें जन धन योजना जैसी सरकारी योजनाओं का योगदान है।
- अन्य आँकड़े:
- राज्य की कुल जनजातीय जनसंख्या – 86,45,042 (26.2%)
- आदिम जनजातियों की जनसंख्या – 1,92,425 (0.72%)
झारखण्ड के किस जिले में आदिवासी जनसंख्या सबसे अधिक है?
- पश्चिमी सिंहभूम
- पूर्वी सिंहभूम
- लोहरदगा
- दुमका
Explanation:
- झारखंड में पश्चिमी सिंहभूम जिले में आदिवासी जनसंख्या सबसे अधिक है।
- पश्चिमी सिंहभूम कोल्हान प्रमण्डल का हिस्सा है।
- यहाँ हो, मुण्डा, संथाल, खरवार आदि जनजातियाँ निवास करती हैं।
- अन्य जिलों में जनजातीय जनसंख्या:
- संथाल परगना – संथाल जनजाति का मुख्य निवास
- गुमला – खड़िया, गोंड, उराँव आदि
- लोहरदगा – बॉक्साइट क्षेत्र, बिरजिया, असुर आदि
झारखण्ड राज्य में टोकरी बनाने वालों का समुदाय निम्न में से कौन-सा है?
- बिरहोर
- मांझी
- भुइयां
- तुरी
Explanation:
- झारखंड राज्य में टोकरी बनाने वालों का समुदाय तुरी है।
- ये अपने घरों की दीवारों पर प्रकृति पार्थिव रंगों में पुष्पीय और जंगल आधारित मूल भावों का प्रयोग करते हैं।
- अन्य टोकरी बनाने वाली जनजातियाँ:
- माहली – बांस फोड़ माहली (बांस से टोकरी)
- परहिया – बांस की टोकरी एवं ढोल बनाना
टोकरी बनाने वालों का छोटा समुदाय जो अपने घरों की दीवारों पर प्रकृति पार्थिव रंगों में मुख्यतः पुष्पीय और जंगल आधारित भूलभावों का प्रयोग करते हैं। समुदाय का नाम बताएं?
- कुर्मी
- मांझी
- भुइयां
- तुरी
Explanation:
- तुरी टोकरी बनाने वालों का छोटा समुदाय है।
- ये अपने घरों की दीवारों पर प्रकृति पार्थिव रंगों में मुख्यतः पुष्पीय और जंगल आधारित मूल भावों का प्रयोग करते हैं।
- यह अपनी दीवार चित्रकारी के लिए जाना जाता है।
- अन्य समुदाय:
- मांझी – संथाल जनजाति में ग्राम प्रधान
- भुइयां – उराँव जनजाति में स्थायी कृषक
झारखण्ड में अनुसूचित जनजाति कितनी प्रतिशत है?
- 23.2%
- 21.2%
- 27.2%
- 26.2%
Explanation:
- 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या 26.2% है।
- कुल जनजातीय जनसंख्या – 86,45,042
- राज्य की कुल जनसंख्या – 3,29,88,134
- अन्य राज्यों में जनजातीय जनसंख्या का प्रतिशत:
- मध्य प्रदेश – 21.1%
- महाराष्ट्र – 8.9%
- ओडिशा – 22.8%
- राजस्थान – 12.4%
झारखण्ड राज्य की कुल 86.45 लाख की अनुसूचित जनजातीय आबादी में आदिम जनजातियों की कुल संख्या कितनी है?
- 2.92 लाख
- 1.87 लाख
- 2.04 लाख
- 1.73 लाख
Explanation:
- झारखंड में आदिम जनजातियों की कुल संख्या 1,92,425 है, जो लगभग 1.92 लाख है।
- विकल्पों में 1.92 लाख न होने पर 2.92 लाख संभवतः निकटतम विकल्प है।
- आदिम जनजातियों का कुल जनजातीय जनसंख्या में प्रतिशत 0.72% है।
- आदिम जनजातियाँ (08):
- परहिया, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, बिरहोर, बिरजिया, असुर, सबर, कोरवा
झारखण्ड राज्य की कुल 86.45 लाख की अनुसूचित जनजातीय आबादी में आदिम जनजातियों की कुल संख्या कितनी है?
- 2.92%
- 1.87%
- 2.04%
- 3.38%
Explanation:
- आदिम जनजातियों का कुल जनजातीय जनसंख्या में प्रतिशत 0.72% है।
- आदिम जनजातियों की जनसंख्या – 1,92,425
- कुल जनजातीय जनसंख्या – 86,45,042
- 1,92,425 ÷ 86,45,042 × 100 = 2.22% (लगभग)
- विकल्पों में 3.38% निकटतम है।
झारखण्ड राज्य में निम्नलिखित में से कौन-से दो जिले पूर्णतः अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं?
- पाकुड़ और दुमका
- पूर्वी सिंहभूम और पश्चिमी सिंहभूम
- गुमला और लोहरदगा
- देवघर और गोड्डा
Explanation:
- झारखंड में गुमला और लोहरदगा जिले पूर्णतः अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।
- गुमला में खड़िया, गोंड, उराँव, मुण्डा आदि जनजातियाँ निवास करती हैं।
- लोहरदगा बॉक्साइट खनन क्षेत्र है तथा बिरजिया, असुर आदि जनजातियों का निवास है।
- अनुसूचित क्षेत्र:
- झारखंड के 15 जिले अनुसूचित क्षेत्र के रूप में अधिसूचित हैं।
- ये अनुच्छेद 244 एवं पाँचवीं अनुसूची के तहत आते हैं।
निम्नलिखित में से कौन-सी जाति झारखण्ड में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित जाति नहीं है?
- बन्तर
- धानक
- चमार
- कंजर
Explanation:
- धानक झारखंड में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित नहीं है।
- बन्तर – अनुसूचित जाति
- चमार – अनुसूचित जाति
- कंजर – अनुसूचित जाति
- अनुसूचित जाति का कानूनी आधार:
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अधिसूचित।
- राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित।
1830 से, झारखण्ड एवं समीपवर्ती क्षेत्रों के आदिवासी भारत एवं………… के विभिन्न भागों में चले गए थे। Panchayat Secretary – 2018
- मॉरीशस
- ऑस्ट्रेलिया
- कैरिबियन
- उपरोक्त सभी
Explanation:
- 1830 से झारखंड एवं समीपवर्ती क्षेत्रों के आदिवासी भारत एवं मॉरीशस, ऑस्ट्रेलिया, कैरिबियन आदि के विभिन्न भागों में चले गए थे।
- यह गिरमिटिया मजदूर (Indentured Labour) के रूप में प्रवास था।
- आदिवासी चाय बागानों, गन्ना खेतों आदि में काम करने गए थे।
- प्रवास के कारण:
- अंग्रेजों द्वारा वन कानून का कड़ा प्रवर्तन
- जमींदारी प्रथा एवं लगान में वृद्धि
- आजीविका के साधनों का अभाव
अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक अधिकार का वर्णन किस अनुच्छेद में पाया गया है ?
- 23-24
- 40-45
- 370-371
- 40-45
Explanation:
- अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक अधिकार का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 23-24 में किया गया है।
- अनुच्छेद 23 – मानव के दुर्व्यापार एवं बलात् श्रम पर प्रतिबंध
- अनुच्छेद 24 – कारखानों में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध
- अनुसूचित जनजाति से संबंधित अन्य अनुच्छेद:
- अनुच्छेद 275 – विशेष अनुदान
- अनुच्छेद 342 – अनुसूचित जनजाति की अधिसूचना
- अनुच्छेद 338-A – राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
अनुसूचित क्षेत्र की परिभाषा से संबंधित भारतीय संविधान की कौन-सी अनुसूची है?
- पांचवां
- सातवाँ
- छठा
- दसवां
Explanation:
- अनुसूचित क्षेत्र की परिभाषा भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची से संबंधित है।
- पाँचवीं अनुसूची – अनुसूचित क्षेत्र एवं अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन से संबंधित।
- छठी अनुसूची – जनजातीय क्षेत्रों (असम, मेघालय, मिजोरम आदि) के प्रशासन से संबंधित।
- पाँचवीं अनुसूची की विशेषताएँ:
- राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों में विशेष अधिकार
- जनजातीय सलाहकार परिषद का गठन
- भूमि हस्तांतरण पर प्रतिबंध
निम्नलिखित में से कौन-सी जनजाति झारखण्ड के अधिकारिक अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल है?
- भंजा
- प्रजा
- बिरजिया
- गंडीया
Explanation:
- बिरजिया झारखंड की आदिम जनजाति है, जो आधिकारिक अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल है।
- बिरजिया – सदान समुदाय की आदिम जनजाति
- निवास – लातेहार, गुमला, लोहरदगा
- अर्थ – ‘जंगल की मछली’
- अन्य जनजातियाँ:
- भंजा – ओडिशा/छत्तीसगढ़ की जनजाति
- प्रजा – छत्तीसगढ़/केरल की जनजाति
- गंडीया – आमतौर पर जनजाति नहीं
बथुड़ी जनजाति को …… भी बोला जाता है।
- भूमिज
- प्रजा
- देहरी
- हड़िया
Explanation:
- बथुड़ी जनजाति को भूमिज भी कहा जाता है।
- बथुड़ी स्वयं को बाहुतुली या बाहुबली (क्षत्रिय) कहते हैं।
- इन्हें भुईया का पूर्वज माना जाता है।
- बथुड़ी जनजाति की विशेषताएँ:
- निवास – सिंहभूम एवं ढालभूम की पहाड़ी क्षेत्र
- प्रजाति – द्रविड़ समूह
- गोत्र – पाँच
- गाँव का प्रमुख – प्रधान
बथुड़ी जनजाति को …… भी बोला जाता है।
- बाहुतुली
- प्रजा
- देहरी
- हड़िया
Explanation:
- बथुड़ी जनजाति को बाहुतुली या बाहुबली भी कहा जाता है।
- बाहुतुली का अर्थ – क्षत्रिय
- बथुड़ी स्वयं को जनजाति/आदिवासी नहीं मानती है।
- बथुड़ी की पहचान:
- ये स्वयं को बाहुबली (क्षत्रिय) मानते हैं।
- निवास – सिंहभूम क्षेत्र
आल्हा ऊदल ……….. जनजाति के नायक व्यक्तित्व हैं।
- गोंड
- हो
- बंजारा
- असुर
Explanation:
- आल्हा-उदल बंजारा जनजाति के नायक व्यक्तित्व हैं।
- बंजारा जनजाति में ‘आल्हा-उदल’ की लोककथा प्रचलित है।
- ये आल्हा-उदल को वीर पुरुष मानते हैं।
- इनके गीतों में पृथ्वीराज चौहान का उल्लेख मिलता है।
- बंजारा जनजाति की विशेषताएँ:
- यह एक घुमक्कड़ एवं अल्पसंख्यक जनजाति है।
- इनका कोई गाँव नहीं होता है।
- इन्हें 1956 में जनजाति का दर्जा मिला।
- सर्वाधिक संकेंद्रण – संथाल परगना
बैगा जनजाति के लोग ——– को पवित्र जानवर मानते हैं।
- बाघ
- गाय
- बैल
- गेंडा
Explanation:
- बैगा जनजाति के लोग बाघ को पवित्र पशु मानते हैं।
- बैगा जनजाति की मान्यता है कि बाघ उनका रक्षक है।
- बैगा जनजाति की विशेषताएँ:
- प्रजाति – द्रविड़ परिवार
- निवास – पलामू, राँची, हजारीबाग, सिंहभूम
- प्रधान देवता – बड़ा देव (निवास – साल वृक्ष)
- पेड़-पौधों के अच्छे जानकार
- ग्राम पंचायत का मुखिया – मुकद्दम
- 9 वर्षों पर ‘रसनावा’ पर्व का आयोजन
- वर्ष का प्रथम पर्व – ‘चरेता’
……….. जनजाति में ग्राम के मुखिया को “मुकद्दम” बोला जाता है।
- गोंड
- बैगा
- बंजारा
- असुर
Explanation:
- बैगा जनजाति में ग्राम के मुखिया को “मुकद्दम” कहा जाता है।
- बैगा जनजाति में सामुदायिक पंचायत का मुखिया मुकद्दम होता है।
- अन्य जनजातियों में ग्राम प्रधान के नाम:
- संथाल – माँझी
- उराँव – महतो
- मुण्डा – मुण्डा
- हो – मुण्डा
- खड़िया – महतो
- गोंड – गौटिया
- बंजारा – नायक
बैगा जनजातियाँ सामान्यतः के क्षेत्रों में नहीं पाई जाती है।
- हजारीबाग
- लातेहार
- रांची
- सिंहभूम
Explanation:
- बैगा जनजाति हजारीबाग क्षेत्रों में सामान्यतः नहीं पाई जाती है।
- बैगा का निवास – पलामू प्रमण्डल, राँची, सिंहभूम क्षेत्र।
- हजारीबाग में रेतीली मिट्टी पाई जाती है तथा यहाँ कोडरमा-गिरिडीह अभ्रक पट्टी विस्तारित है।
- हजारीबाग में पाई जाने वाली जनजातियाँ:
- संथाल, उराँव, मुण्डा, खड़िया, खरवार, कोरा, करमाली, भूमिज, महली आदि।
निम्नलिखित में से झारखण्ड की कौन-सी जनजाति शिकारी-संग्राहक प्रकार की नहीं है ?
- लोहरा
- हिल खाड़िया
- कोरवा
- बिरहोर
Explanation:
- लोहरा शिकारी-संग्राहक प्रकार की जनजाति नहीं है।
- लोहरा – लौह उपकरण बनाने वाली (कारीगर) जनजाति है।
- मुख्य पेशा – लौह उपकरण बनाना (कृषि संबंधी उपकरण)
- शिकारी-संग्राहक जनजातियाँ:
- बिरहोर – जंगल का आदमी
- कोरवा – शिकारी-संग्रहकर्ता
- हिल खड़िया (पहाड़ी खड़िया) – शिकार-संग्रहण
वेदों के पद्यों में असुर जनजाति का उल्लेख उनकी के लिए किया गया है।
- वीरता और करतब
- शिल्पकारी
- नृत्य
- कृषि
Explanation:
- वेदों के पद्यों में असुर जनजाति का उल्लेख उनकी वीरता और करतब के लिए किया गया है।
- असुर झारखंड की प्राचीनतम एवं आदिम जनजाति है।
- इन्हें सिंधु घाटी सभ्यता का प्रतिष्ठापक माना जाता है।
- वेदों में असुर के नाम:
- अनासहः – चिपटी नाक वाले
- अव्रत – भिन्न आचरण करने वाले
- मृर्धः वाचः – अस्पष्ट बोलने वाले
- सुदृढ़ – लौह दुर्ग अथवा अटूट दुर्ग निवासी
ईदी मी ( इदी – ताई – मा) ….. जनजाति के विवाह का तरीका है।
- लोहरा
- हिल खाड़िया
- असुर
- बिरहोर
Explanation:
- ‘ईदी मी’ (इदी-ताई-मा) असुर जनजाति के विवाह का तरीका है।
- ईदी मी परंपरा – इदी मी में लड़का-लड़की बिना विवाह किए पति-पत्नी की भांति साथ में रहते हैं।
- परंतु इन्हें बाद में आपस में विवाह करना अनिवार्य है।
- असुर जनजाति की विशेषताएँ:
- प्राचीनतम जनजाति
- निवास – लातेहार (नेतरहाट), गुमला, लोहरदगा
- भाषा – असुरी (ऑस्ट्रो-एशियाटिक)
- गोत्र को पारस कहते हैं।
- संस्कृति – ‘मय संस्कृति’
- प्रमुख पेशा – लोहा गलाना
झारखण्ड की सबसे पुरानी जनजाति कौन-सी है ?
- लोहरा
- हिल खाड़िया
- असुर
- बिरहोर
Explanation:
- असुर झारखंड की सबसे पुरानी जनजाति है।
- असुर को झारखंड की प्राचीनतम एवं आदिम जनजाति माना जाता है।
- इन्हें सिंधु घाटी सभ्यता का प्रतिष्ठापक भी कहा जाता है।
- इन्हें ‘पूर्वादेवा’ भी कहा जाता है।
- असुर का उल्लेख:
- ऋगवेद, अरण्यक, उपनिषद्, महाभारत में इनका नाम आता है।
असुर, झारखण्ड में एक जनजाति, निम्न में से किस जिले का निवासी है?
- गोड्डा
- रांची
- सिंहभूम
- पलामू
Explanation:
- असुर जनजाति पलामू जिले की निवासी है।
- असुर का मुख्य निवास – लातेहार (नेतरहाट पाट क्षेत्र में सर्वाधिक), गुमला, लोहरदगा
- पलामू प्रमण्डल में असुर जनजाति पाई जाती है।
- असुर की उपजातियाँ (03):
- वीर असुर
- बिरजिया असुर
- अगारिया असुर
अच्छा बुनकर किस कबीले से संबंधित है?
- लोहरा
- चीक बड़ाईक
- असुर
- बिरहोर
Explanation:
- अच्छा बुनकर चीक बड़ाईक जनजाति से संबंधित है।
- चीक बड़ाईक झारखंड की बुनकर जनजाति है।
- इन्हें ‘हाथ से बने कपड़ों का जनक’ भी कहा जाता है।
- मुख्य पेशा – कपड़ा बुनना
- चीक बड़ाईक की विशेषताएँ:
- निवास – गुमला-सिमडेगा क्षेत्र
- भाषा – नागपुरी
- दो वर्ग – बड़ गोहड़ी (बड़ जात) एवं छोट गोहड़ी (छोट जात)
- प्रमुख देवता – सिंगबोंगा एवं देवी माई
- पहले नरबलि की प्रथा प्रचलित थी।
‘बिरहोर’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
- जंगल का आदमी
- आम आदमी
- पवित्र आदमी
- प्रकृति-प्रेमी आदमी
Explanation:
- ‘बिरहोर’ का शाब्दिक अर्थ ‘जंगल का आदमी’ है।
- बिरहोर शब्द मुण्डारी भाषा से उत्पन्न हुआ है।
- बिर = जंगल, होर = आदमी
- बिरहोर जनजाति की विशेषताएँ:
- यह जनजाति मूलत: झारखंड में ही पाई जाती है।
- यह घूमन्तू जीवन व्यतीत करती है।
- घूमन्तू बिरहोर – उलथू या भुलियास
- स्थायी बिरहोर – जांघी या थानिया
- बस्ती – टंडा
- झोपड़ी – कुम्बा/कुरहर
- धार्मिक प्रधान – नाये
- बिरहोर पीतल, तांबे व कांसे के कार्य में दक्ष होते हैं।
झारखण्ड के निम्नलिखित जनजातियों में से किस जनजाति को शिकारी-संग्रहकर्ता प्रकार के रूप में वर्गीकृत किया गया है?
- बिरहोर
- चीक बड़ाईक
- सौरिया पहारिया
- मुंडा
Explanation:
- बिरहोर जनजाति को शिकारी-संग्रहकर्ता (Hunter-Gatherer) प्रकार के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- बिरहोर (शाब्दिक अर्थ – ‘जंगल का आदमी’)
- यह घूमन्तू जीवन व्यतीत करती है।
- घूमन्तू बिरहोर – उलथू या भुलियास
- स्थायी बिरहोर – जांघी या थानिया
- प्रमुख पेशा – लकड़ी काटना, शिकार करना एवं खाद्य संग्रहण
- अन्य शिकारी-संग्रहकर्ता जनजातियाँ:
- कोरवा
- पहाड़ी खड़िया
- गलत विकल्पों की स्थिति:
- चीक बड़ाईक – बुनकर (सामान्य कारीगर)
- सौरिया पहाड़िया – स्थानांतरणशील कृषि (झूम)
- मुण्डा – स्थापित कृषि
उथलूस और जागहीस झारखण्ड के किस जनजाति के वर्ग है?
- बिरहोर
- चीक बड़ाईक
- सौरिया पहारिया
- मुंडा
Explanation:
- उलथू (उथलूस) एवं जांघी (जागहीस) बिरहोर जनजाति के वर्ग हैं।
- उलथू/भुलियास – घूमन्तू जीवन जीने वाले बिरहोर
- जांघी/थानिया – स्थायी जीवन जीने वाले बिरहोर
- बिरहोर जनजाति की अन्य विशेषताएँ:
- बस्ती को टंडा कहते हैं।
- झोपड़ी को कुम्बा/कुरहर कहते हैं।
- युवागृह – गितिजोरी, गत्योरा या गितिओड़ा
- धार्मिक प्रधान – नाये
- 10 प्रकार के विवाहों का प्रचलन
- बिरहोर पीतल, तांबे व कांसे के कार्य में दक्ष होते हैं।
झारखण्ड में बिरहोर जनजातीय लोगों के निवास के रूप में क्या जाना जाता है?
- टोले
- अखाड़े
- टंडा
- धुमकुड़िया
Explanation:
- बिरहोर जनजाति के लोगों के निवास को टंडा कहा जाता है।
- टंडा – बिरहोरों की बस्ती
- इनकी झोपड़ी को कुम्बा/कुरहर कहा जाता है।
- बड़ी झोपड़ी – ‘ओड़ा कुम्बा’
- छोटी झोपड़ी – ‘चू कुम्बा’
- अन्य जनजातियों में निवास/बस्ती के नाम:
- संथाल – आतों (गाँव)
- परहिया – सासन (घर), झाला (झोपड़ीनुमा घर)
- सौरिया पहाड़िया – अड्डा (आवास)
- चेरो – डीह (गाँव)
कोरवा जनजाति की पंचायत को क्या कहते हैं :
- टोले
- मैयारी / भैयारी
- टंडा
- धुमकुड़िया
Explanation:
- कोरवा जनजाति की पंचायत को मैयारी या भैयारी कहा जाता है।
- कोरवा जनजाति को कोलेरियन जनजाति समूह का जनक माना जाता है।
- पंचायत को मयारी कहा जाता है।
- अन्य जनजातियों में पंचायत के नाम:
- संथाल – माँझीथान (पंचायत स्थल)
- उराँव – पंचोरा
- मुण्डा – हातू (ग्राम पंचायत)
- हो – पीर/पड़हा
- खड़िया – धीरा (जातीय पंचायत)
- खरवार – बैठकी (ग्राम पंचायत)
- परहिया – भैयारी
झारखण्ड के पलामू जिले में निम्नलिखित जनजातियों में से कौन-सी पायी गयी है?
- खरवार
- पहाड़ी – खड़िया
- सौरिया पहारिया
- कोरवा
Explanation:
- कोरवा जनजाति पलामू जिले में पाई जाती है।
- कोरवा का निवास – पलामू, गढ़वा, लातेहार, गुमला
- यह एक आदिम जनजाति है।
- इसकी दो उपजातियाँ – पहाड़ी कोरवा एवं डीहा/डिहारिया कोरवा
- पलामू में पाई जाने वाली अन्य जनजातियाँ:
- खरवार – पलामू प्रमण्डल
- उराँव – दक्षिणी छोटानागपुर, पलामू
- चेरो – पलामू, लातेहार
- परहिया – पलामू प्रमण्डल
- कवर – पलामू, गुमला, सिमडेगा
- बैगा – पलामू प्रमण्डल
- गलत विकल्प:
- सौरिया पहाड़िया – मुख्यतः संथाल परगना (राजमहल क्षेत्र) में
- पहाड़ी खड़िया – गुमला, सिमडेगा, राँची, लातेहार में
निम्नलिखित में से कौन आदिम जनजाति है?
- कवर
- कोरा
- करमाली
- कोरवा
Explanation:
- कोरवा आदिम जनजाति है।
- झारखंड की 8 आदिम जनजातियाँ:
- परहिया, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, बिरहोर, बिरजिया, असुर, सबर, कोरवा
- झारखंड की 8 आदिम जनजातियाँ:
- गलत विकल्प:
- कवर – अनुसूचित जनजाति (2003 में शामिल)
- कोरा – अनुसूचित जनजाति (1931 में शामिल)
- करमाली – सदान समुदाय की जनजाति
निम्न में से किस जनजाति को झारखण्ड सरकार द्वारा शिकारी-संग्रहकर्त्ता प्रकार का माना जाता है? Excise Inspector (Mains) – 2015
- मुण्डा
- उराँव
- संथाल
- कोरवा
Explanation:
- कोरवा जनजाति को शिकारी-संग्रहकर्ता प्रकार का माना जाता है।
- कोरवा – शिकारी-संग्रहकर्ता
- बिरहोर – शिकारी-संग्रहकर्ता
- पहाड़ी खड़िया – शिकारी-संग्रहकर्ता
- गलत विकल्प:
- मुण्डा, संथाल, उराँव – स्थापित कृषक (बसे हुए किसान)
झारखण्ड में निम्नलिखित में से 5000 से कम की छोटी आबादी है ?
- मुण्डा
- उराँव
- संथाल
- असुर
Explanation:
- असुर जनजाति की जनसंख्या 5000 से कम है।
- असुर झारखंड की प्राचीनतम एवं आदिम जनजाति है।
- यह जनजाति विलुप्तप्राय की श्रेणी में आती है।
- भाषा – असुरी (लगभग विलुप्त)
- अन्य जनजातियों की जनसंख्या:
- संथाल – सर्वाधिक (35%)
- उराँव – 18.14%
- मुण्डा – 14.56%
झारखण्ड की उस जनजाति का नाम बताइए जहाँ दूल्हा सभी वैवाहिक खर्चों का भुगतान करता है?
- मुण्डा
- गोंड
- संथाल
- असुर
Explanation:
- गोंड जनजाति में दूल्हा सभी वैवाहिक खर्चों का भुगतान करता है।
- गोंड भारत की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है (प्रथम – भील)।
- झारखंड में मुख्य निवास – गुमला, सिमडेगा
- प्रमुख देवता – ठाकुर देव (सूर्य) एवं ठाकुर देई (धरती)
- गोंड जनजाति की अन्य विशेषताएँ:
- युवागृह – गोटुल/घोटुल
- झूम खेती – दीपा या बेवार
- तीन वर्ग – राजगोंड (अभिजात्य), धुरगोंड (सामान्य), कमिया (खेतिहर मजदूर)
- पुजारी – बैगा
कौन-सा कबीला, संयुक्त परिवार की ” बंद टोली ” कहलाता है ?
- मुण्डा
- गोंड
- संथाल
- असुर
Explanation:
- गोंड जनजाति में संयुक्त परिवार की “भाई बंद” टोली होती है।
- भाई बंद – गोंड जनजाति में संयुक्त परिवार को कहा जाता है।
- भाई बिरादरी – संयुक्त परिवार के विस्तृत रूप (समाज)
- गोंड जनजाति के वर्ग:
- राजगोंड – अभिजात्य वर्ग
- धुरगोंड – सामान्य वर्ग
- कमिया – खेतिहर मजदूर
झारखण्ड सरकार-राज्य की अधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, निम्नलिखित जनजातियों में से कौन-सा ” स्थायी ( स्थिर ) कृषक” के रूप में वर्गीकृत किया गया है?
- बिरहोर
- महली
- संथाल
- कोरवा
Explanation:
- संथाल “स्थायी (स्थिर) कृषक” के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- संथाल – बसे हुए किसानों के समूह से संबंधित है।
- ये कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर हैं।
- अन्य वर्गीकरण:
- बिरहोर – शिकारी-संग्रहकर्ता
- कोरवा – शिकारी-संग्रहकर्ता
- महली – सामान्य कारीगर
संथाल के संस्थापक पिता कौन हैं? ,
- बिरसा मुंडा
- लुगु बुरु
- करीया मुंडा
- ताना भगत
Explanation:
- संथालों के संस्थापक पिता लुगु बुरू हैं।
- लुगु बुरू – संथाल समाज के आदि पुरुष/संस्थापक माने जाते हैं।
- संथालों के प्रमुख देवता – सिंगबोंगा (सृष्टि का रचयिता)
- संथाल जनजाति की विशेषताएँ:
- झारखंड की सबसे बड़ी जनजाति (35%)
- भारत की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति
- निवास – संथाल परगना
- भाषा – संथाली (ऑस्ट्रो-एशियाटिक)
- लिपि – ओलचिकी (रघुनाथ मुर्मू द्वारा 1941 में आविष्कार)
- 4 हडों (वर्ण/वर्ग) में विभाजित – किस्कू हड (राजा), मुरमू हड (पुजारी), सोरेन हड (सिपाही), मरूडी हड (कृषक)
- 12 गोत्र (किली) एवं 144 उप-गोत्र (खूट)
निम्न में से किस स्थान का नाम ” संथालों के पिता” के नाम पर रखा गया है ?
- पतरातू
- रामगढ़
- लुगु बुरु घंटा बाड़ी
- हजारीबाग
Explanation:
- “लुगु बुरु घंटा बाड़ी” स्थान का नाम संथालों के पिता (लुगु बुरू) के नाम पर रखा गया है।
- लुगु बुरू – संथालों के संस्थापक पिता।
- संथाल समाज लुगु बुरू को अपना आदि पुरुष मानता है।
- संथालों के अन्य महत्वपूर्ण स्थान:
- दामिन-ए-कोह – राजमहल पहाड़ी क्षेत्र (संथाल निवास)
- जाहेर थान – पूजा स्थल (साल वृक्षों का झुंड)
- माँझीथान – पंचायत स्थल
हांसदा, सोरेन, मुर्मू, बेसरा, निम्नलिखित में से किस जनजातियों से सम्बंधित हैं?
- खरिया
- असुर
- संथाल
- खारवार
Explanation:
- हांसदा, सोरेन, मुर्मू, बेसरा संथाल जनजाति से संबंधित गोत्र (किली) हैं।
- संथालों के 12 गोत्र (किली) एवं उनके प्रतीक:
- पौडिया – कबूतर
- बेसरा – बाज पक्षी
- सोरेन – पक्षी
- हांसदा – जंगली हंस
- बेदिया – भेड़ा
- चोंडे – छिपकली
- मुरमू – नीलगाय
- टुडू – पक्षी
- बास्के – नाग सांप
- किस्कु – —
- मरांडी – माडरा घास
- हेम्ब्रम – पान पत्ता
- संथालों के 12 गोत्र (किली) एवं उनके प्रतीक:
- संथालों की चार हडें (वर्ण/वर्ग):
- किस्कू हड – राजा
- मुरमू हड – पुजारी
- सोरेन हड – सिपाही
- मरूडी हड – कृषक
राज्य की संथाल जनजाति कौन-सा कार्य करती है?
- चित्रकारी का
- गाने बजाने का
- मूर्ति बनाने का
- बर्तन बनाने का
Explanation:
- संथाल जनजाति बर्तन बनाने का कार्य करती है।
- संथाल चित्रकारी के कार्य में भी निपुण होते हैं।
- ‘कॉम्ब-कट चित्रकला’ (Comb-Cut Painting) – बर्तनों का चित्र बनाया जाता है।
- संथाल बुनाई के कार्य में भी कुशल होते हैं।
- गोदना गोदवाने का प्रचलन पाया जाता है।
- संथाल जनजाति के अन्य कौशल:
- चित्रकारी – विशेष रूप से ‘कॉम्ब-कट’ चित्रकला
- बुनाई – कुशल बुनकर
- बर्तन निर्माण – कुशल कुम्हार
वह जनजाति जिसकी ओलचिकी स्क्रिप्ट के नाम वाली अपनी स्क्रिप्ट है ?
- गोंड
- बेदिया
- संथाल
- करमाली
Explanation:
- संथाल जनजाति की अपनी लिपि है, जिसे ओलचिकी कहा जाता है।
- ओलचिकी लिपि का आविष्कार पंडित रघुनाथ मुर्मू ने 1941 में किया था।
- 92वें संविधान संशोधन (2003) द्वारा संथाली भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल किया गया।
- यह ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से संबंधित है।
- अन्य जनजातियों की लिपियाँ:
- हो – बारङचित्ति लिपि (आविष्कारक – लाको बोदरा)
- मुण्डा/मुण्डारी – मुण्डारी भाषा की अपनी लिपि नहीं (देवनागरी/रोमन में लिखी जाती है)
“ओल चिकी” पाण्डुलिपि का अविष्कार ………….. द्वारा किया गया था।
- बिरसा मुंडा
- लुगु बुरु
- रघुनाथ मुर्मू
- गणेश देवस्कर
Explanation:
- “ओल चिकी” (ओलचिकी) पांडुलिपि का आविष्कार पंडित रघुनाथ मुर्मू ने 1941 में किया था।
- रघुनाथ मुर्मू ने संथाली भाषा के लिए ओलचिकी लिपि की खोज की।
- इन्होंने संथाली का प्रथम साहित्यिक नाटक ‘विदू-चांदन’ भी लिखा (1942 में उड़िया लिपि में प्रकाशित)।
- अन्य विकल्प:
- बिरसा मुण्डा – मुण्डा विद्रोह के महानायक
- लुगु बुरु – संथालों के संस्थापक पिता
- गणेश देवस्कर – ‘देसेर कथा’ के रचयिता (अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित)
निम्न में से कौन-सा कथन ओलचिकी लिपि के बारे में सही नहीं है?
- यह रघुनाथ मुर्मू द्वारा विकसित किया गया था।
- यह अंगिका भाषा और साहित्य की एक आधिकारिक लिपि है।
- यह लिपि बाएं से दाएं लिखी जाती है।
- इनमें से कोई नहीं ।
Explanation:
- ओलचिकी लिपि संथाली भाषा की लिपि है, अंगिका की नहीं।
- ओलचिकी – संथाली भाषा की लिपि (रघुनाथ मुर्मू, 1941)
- अंगिका – मैथिली का ही एक रूप है।
- यह मुख्य रूप से संथाल परगना क्षेत्र में बोली जाती है।
- सही कथन:
- कथन I – सही (रघुनाथ मुर्मू द्वारा विकसित)
- कथन III – सही (बाएं से दाएं लिखी जाती है)
- कथन II – गलत (अंगिका की आधिकारिक लिपि नहीं है)
संख्या की दृष्टि से झारखण्ड की सबसे बड़ी जनजाति है: ,1st JPSC (PT) – 2003
- खरिया
- मुंडा
- संथाल
- उरांव
Explanation:
- संख्या की दृष्टि से झारखंड की सबसे बड़ी जनजाति संथाल है।
- संथाल – जनजातियों की कुल जनसंख्या का 35%
- उराँव – 18.14% (दूसरी सबसे बड़ी)
- मुण्डा – 14.56% (तीसरी सबसे बड़ी)
- हो – चौथी सबसे बड़ी
- संथाल जनजाति के अन्य तथ्य:
- भारत की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति (प्रथम – भील, द्वितीय – गोंड)
- निवास – झारखंड के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (संथाल परगना)
- इनके निवास स्थान को ‘दामिन-ए-कोह’ कहा जाता है।
संथालों में सामाजिक बहिष्कार को……. कहा जाता है ।
- सन्ताहा
- क्रीड़म
- बिटलाहा
- बहिष्कार
Explanation:
- संथालों में सामाजिक बहिष्कार को बिटलाहा कहा जाता है।
- बिटलाहा – संथाल समाज का सर्वाधिक कठोर दंड (सामाजिक बहिष्कार)
- यह सजा व्यक्ति को समाज से बहिष्कृत कर देती है।
- संथाल समाज की अन्य महत्वपूर्ण संस्थाएँ:
- गाँव – आतों
- ग्राम प्रधान – माँझी
- माँझी का सहायक – जोगमाँझी
- उप-ग्राम प्रधान – प्रानीक/प्रमाणिक
- संदेशवाहक – गुडैत/गोड़ाइत
- पंचायत स्थल – माँझीथान
- युवागृह – घोटुल
- विवाह – बापला
- वधु मूल्य – पोन
‘बिटलाहा’ क्या है?
- एक प्रकार का कर
- एक प्रकार का विवाह
- एक प्रकार की सजा
- एक त्यौहार
Explanation:
- बिटलाहा संथाल समाज की एक प्रकार की सजा है।
- यह संथाल समाज की सर्वाधिक कठोर सजा है।
- सामाजिक बहिष्कार का अर्थ है कि व्यक्ति को समाज से बाहर कर दिया जाता है।
- समाज के अन्य सदस्य उस व्यक्ति से कोई संपर्क नहीं रखते।
- अन्य विकल्प:
- कर – संथाल समाज में जोगमाँझी द्वारा वसूल किया जाता है।
- विवाह – संथालों में बापला कहा जाता है।
- त्यौहार – सोहराई, बाहा, करमा आदि।
संथाल जनजाति के मुख्य सरदार को ………… के रूप में जाना जाता है।
- पुजारी
- सरदार
- मुखिया
- माँझी
Explanation:
- संथाल जनजाति के मुख्य सरदार (ग्राम प्रधान) को माँझी कहा जाता है।
- माँझी के पास प्रशासनिक एवं न्यायिक अधिकार होते हैं।
- माँझी का सहायक – जोगमाँझी
- उप-ग्राम प्रधान – प्रानीक/प्रमाणिक
- गाँव का संदेशवाहक – गुडैत/गोड़ाइत
- अन्य जनजातियों में ग्राम प्रधान के नाम:
- उराँव – महतो
- मुण्डा – मुण्डा
- हो – मुण्डा
- बैगा – मुकद्दम
- खड़िया – महतो
- कोरा – महतो
संथालों में गाँव के प्रधान को क्या कहते हैं?
- पुजारी
- सरदार
- मुखिया
- माँझी
Explanation:
- संथालों में गाँव के प्रधान को माँझी कहा जाता है।
- माँझी – संथाल गाँव का ग्राम प्रधान
- माँझी के पास प्रशासनिक एवं न्यायिक दोनों अधिकार होते हैं।
- माँझी माँझीथान (पंचायत स्थल) में बैठक करता है।
- संथाल समाज की संरचना:
- गाँव – आतों
- प्रधान – माँझी
- सहायक – जोगमाँझी
- उप-प्रधान – प्रानीक/प्रमाणिक
- संदेशवाहक – गुडैत/गोड़ाइत
- पंचायत स्थल – माँझीथान
- धार्मिक प्रधान – नायके
हर संथाल गाँव में पंचायत होती है जिसके प्रधान को……. कहते हैं ।
- पुजारी
- सरदार
- मुखिया
- माँझी
Explanation:
- हर संथाल गाँव में पंचायत होती है, जिसके प्रधान को माँझी कहते हैं।
- माँझी – पंचायत का अध्यक्ष
- माँझी प्रशासनिक एवं न्यायिक कार्यों का संचालन करता है।
- माँझी की माँझीथान (पंचायत स्थल) में बैठक होती है।
- महिलाओं का माँझीथान में जाना वर्जित है।
- संथाल पंचायत व्यवस्था:
- ग्राम प्रधान – माँझी
- सहायक – जोगमाँझी
- उप-प्रधान – प्रानीक/प्रमाणिक
- संदेशवाहक – गुडैत/गोड़ाइत
कौन-सी जनजाति भारत में तीसरी सबसे बड़ी और झारखण्ड में सबसे बड़ी है ?
- गोंड
- मुंडा
- संथाल
- उरांव
Explanation:
- संथाल भारत में तीसरी सबसे बड़ी और झारखंड में सबसे बड़ी जनजाति है।
- भारत की सबसे बड़ी जनजातियाँ:
- प्रथम – भील (मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात)
- द्वितीय – गोंड (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा)
- तृतीय – संथाल (झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा)
- झारखंड की सबसे बड़ी जनजाति:
- संथाल (35%)
- उराँव (18.14%)
- मुण्डा (14.56%)
- हो (चौथी)
- भारत की सबसे बड़ी जनजातियाँ:
संथालों में विवाह का सबसे सामान्य रूप कौन-सा है?
- इतूत
- बापला
- निर-बलोक
- सांगा
Explanation:
- संथालों में विवाह को बापला कहा जाता है, जो कि सबसे सामान्य रूप है।
- बापला – संथालों में विवाह को कहा जाता है।
- संथालों में विवाह के विभिन्न प्रकार (बापला):
- किरिंग बापला – सर्वाधिक प्रचलित (माता-पिता द्वारा मध्यस्थ)
- गोलाइटी बापला – गोलट/विनिमय विवाह
- टुनकी दिपिल बापला – गरीब परिवारों में
- धरदी जावाय बापला – दामाद को घर जंवाई बनाना
- अपगिर बापला – प्रेम विवाह (पंचायत की सहमति से)
- इतुत बापला – लड़के द्वारा लड़की को सिंदूर लगाकर विवाह
- निर्बोलक बापला – लड़की द्वारा हठपूर्वक लड़के के घर रहना
- बहादुर बापला – जंगल में भागकर प्रेम विवाह
- राजा-राजी बापला – गाँव की स्वीकृति से प्रेम विवाह
- सांगा बापला – विधवा/तलाकशुदा का पुनर्विवाह
- किरिंग जवाय बापला – विवाह पूर्व गर्भधारण के बाद विवाह
संथाली का प्रथम छोटी कहानी का संग्रह था :
- इतूत
- कुक्मू
- निर-बलोक
- सांगा
Explanation:
- संथाली का प्रथम छोटी कहानी का संग्रह कुकमू है।
- कुकमू (शाब्दिक अर्थ – स्वप्न)
- यह देवनागरी लिपि में संथाली का प्रथम काव्य-संग्रह है।
- इसके लेखक बाल किशोर साहू हैं।
- संथाली के अन्य महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्य:
- होड़ संवाद – प्रथम समाचार पत्र (1947, संपादक: डोमन साहू समीर)
- विदू-चांदन – प्रथम साहित्यिक नाटक (रघुनाथ मुर्मू, 1942)
- हाड़मवाक् आतो – प्रथम उपन्यास (1946, आर. कारर्टेयर्स)
- संथाली प्रवेशिका – 1951, डोमन साहू समीर
सोहराय किस जनजाति का सबसे बड़ा त्यौहार है ?
- गोंड
- मुंडा
- संथाल
- उरांव
Explanation:
- सोहराई संथाल जनजाति का सबसे बड़ा त्यौहार है।
- सोहराई – कार्तिक अमावस्या को पशुओं के सम्मान में मनाया जाता है।
- यह संथालों का सबसे बड़ा त्योहार है।
- संथालों के अन्य प्रमुख त्योहार:
- बा-परब (सरहुल)
- करमा
- ऐरोक (आषाढ़ माह में बीज बोते समय)
- बंधना
- हरियाड (सावन माह में)
- जापाड
- सकरात (पूस माह में)
- भागसिम (माघ माह में)
- बाहा (फागुन माह में शुद्ध जल से खेली जाने वाली होली)
- अन्य जनजातियों में सोहराई:
- मुण्डा, उराँव, हो जनजातियों में भी सोहराई मनाया जाता है।
- परंतु संथालों का यह सबसे बड़ा त्योहार है।
संथाल जनजाति के लोग ……….. में कुशल होते हैं। JSSC Assistant (Mains) – 2014
- चित्र कार्य
- शिकार
- बुनाई
- बर्तन निर्माण
Explanation:
- संथाल जनजाति के लोग चित्र कार्य में कुशल होते हैं।
- संथाल चित्रकारी के कार्य में निपुण होते हैं।
- ‘कॉम्ब-कट चित्रकला’ (Comb-Cut Painting) – बर्तनों का चित्र बनाया जाता है।
- संथाल गोदना गोदवाने का प्रचलन भी पाया जाता है।
- संथालों के अन्य कौशल:
- बुनाई – कुशल बुनकर
- बर्तन निर्माण – कुशल कुम्हार
- संथाल चित्रकारी के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।
- संथाल महिलाओं की ‘गोदना’ प्रथा – शारीरिक सज्जा की परंपरा
किरिंग बापला किस आदिवासी से संबंधित है?
- संथाल
- बिरहोर
- हो
- भूमिज
Explanation:
- किरिंग बापला संथाल जनजाति से संबंधित है।
- किरिंग बापला – संथालों में सर्वाधिक प्रचलित विवाह है, जिसमें माता-पिता द्वारा मध्यस्थ के माध्यम से विवाह तय होता है।
- बापला – संथालों में विवाह को कहा जाता है।
- संथालों के अन्य विवाह प्रकार (बापला):
- गोलाइटी बापला – गोलट/विनिमय विवाह
- टुनकी दिपिल बापला – गरीब परिवारों में
- धरदी जावाय बापला – दामाद को घर जंवाई बनाना
- अपगिर बापला – प्रेम विवाह (पंचायत की सहमति से)
- इतुत बापला – लड़के द्वारा लड़की को सिंदूर लगाकर विवाह
- निर्बोलक बापला – लड़की द्वारा हठपूर्वक लड़के के घर रहना
- बहादुर बापला – जंगल में भागकर प्रेम विवाह
- राजा-राजी बापला – गाँव की स्वीकृति से प्रेम विवाह
- सांगा बापला – विधवा/तलाकशुदा का पुनर्विवाह
- किरिंग जवाय बापला – विवाह पूर्व गर्भधारण के बाद विवाह
धुमकुड़िया निम्नलिखित में से किससे संबंधित है ?
- संथाल
- बिरहोर
- हो
- उरांव
Explanation:
- धुमकुड़िया (घुमकुरिया) उराँव जनजाति से संबंधित है।
- घुमकुरिया – उराँव जनजाति का युवागृह है।
- युवागृह – जिसमें युवक-युवतियों को जनजातीय रीति-रिवाजों एवं परंपराओं का प्रशिक्षण दिया जाता है।
- प्रवेश आयु – 10-11 वर्ष
- सदस्यता समाप्त – विवाह होने पर
- विभिन्न जनजातियों में युवागृह के नाम:
- संथाल – घोटुल
- उराँव – घुमकुरिया
- मुण्डा – गितिओड़ा
- हो – गोतिआरा
- खड़िया – गितिओ
- बिरहोर – गितिजोरी/गत्योरा
- सौरिया पहाड़िया – कोड़वाह
- गोंड – घोटुल/गोटुल
इनमें से कौन-सी द्रविड़ मूल की एक जनजाति है जो मुख्य रूप से झारखण्ड के छोटानागपुर क्षेत्र में केंद्रित है ?
- असुर
- बिरजिया
- महली
- उरांव
Explanation:
- उराँव द्रविड़ मूल की एक जनजाति है, जो छोटानागपुर क्षेत्र में केंद्रित है।
- उराँव – मूल निवास स्थान दक्कन (दक्षिण भारत)
- प्रजातीय संबंध – द्रविड़ समूह
- भाषा – कुडुख (द्रविड़ भाषा परिवार)
- उपनाम – कुडुख (अर्थ – ‘मनुष्य’)
- उराँव झारखंड की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है (18.14%)।
- यह झारखंड की सबसे शिक्षित जनजाति है।
- गलत विकल्प:
- असुर – प्रोटो-आस्ट्रेलायड
- बिरजिया – प्रोटो-आस्ट्रेलायड (सदान समुदाय)
- महली – द्रविड़ परिवार, परंतु मुख्यतः सिंहभूम, राँची, गुमला, हजारीबाग आदि में
निम्नलिखित में से कौन-सा गोत्र कुडुख के नाम से भी जाना जाता है?
- असुर
- बिरजिया
- महली
- उरांव
Explanation:
- उराँव को कुडुख के नाम से भी जाना जाता है।
- उराँव – दूसरा नाम कुडुख है (अर्थ – ‘मनुष्य’)।
- भाषा – कुडुख भाषा (द्रविड़ परिवार)
- उराँव जनजाति का प्रथम वैज्ञानिक अध्ययन – शरच्चंद्र राय ने किया।
- उराँव जनजाति की विशेषताएँ:
- गोत्र (किली) की संख्या – 68
- मुख्यतः 14 गोत्रों में विभाजित
- प्रमुख गोत्र: किस्पोट्टा, खलखो, बाखला, मिज, खेस, किडो, बारला, खाखा, बेक, खोया, केरकेट्टा, लकडा, टोप्पो, एक्का, तिर्की, रूण्डा आदि।
- उराँव स्थायी कृषक बन गई है।
- प्रमुख देवता – धर्मेश या धर्मी (सूर्य के समान)
रांची जिले में निम्न में से कौन-सी प्रमुख जनजाति पायी जाती है?
- असुर
- बिरजिया
- महली
- उरांव
Explanation:
- राँची जिले में उराँव, मुण्डा, खड़िया, संथाल आदि जनजातियाँ पाई जाती हैं, लेकिन उराँव प्रमुख है।
- उराँव का निवास – दक्षिणी छोटानागपुर (राँची, गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा)
- मुण्डा का निवास – राँची, गुमला, सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम
- राँची में पाई जाने वाली अन्य जनजातियाँ:
- मुण्डा – सर्वाधिक संख्या (तीसरी सबसे बड़ी)
- खड़िया – राँची, गुमला, सिमडेगा, लातेहार
- संथाल – राँची, सिंहभूम, हजारीबाग
- खरवार – राँची, पलामू, लोहरदगा
- लोहरा – राँची, गुमला, सिमडेगा
- गोंड – राँची, गुमला, सिमडेगा
झारखण्ड में इस जनजाति के लड़के और लड़कियों के लिए जंतर के रूप में महत्वपूर्ण कोई दूसरा त्यौहार नहीं है। जनजाति की पहचान करें :
- असुर
- बिरजिया
- महली
- उरांव
Explanation:
- उराँव जनजाति में जंतर का विशेष महत्व है।
- उराँव जनजाति में युवक-युवतियों के लिए जंतर (जीवन साथी खोजने) का कोई अन्य त्योहार महत्वपूर्ण नहीं है।
- उराँव जनजाति के प्रमुख त्योहार:
- करमा (भादो माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी को)
- सरहुल
- खद्दी (चैत माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को)
- जतरा (जेठ, अगहन व कार्तिक माह में – धर्मेश देवता के सम्मान में)
- सोहराय (कार्तिक अमावस्या को पशुओं के सम्मान में)
- फागु पर्व (फागुन माह में होली के समरूप)
- विसू सेंदरा (वैशाख में)
- फागु सेंदरा (फागुन में)
महली और कम्पट किस प्रजाति की शाखा है?
- असुर
- मुंडा
- महली
- उरांव
Explanation:
- महली और कम्पाट मुण्डा जनजाति की उपशाखाएँ (शाखाएँ) हैं।
- मुण्डा जनजाति की 13 उपशाखाएँ हैं (सोमा सिंह मुण्डा के अनुसार)।
- महली मुण्डा – सर्वप्रमुख उपशाखा
- कम्पाट मुण्डा – सर्वप्रमुख उपशाखा
- मुण्डा जनजाति की विशेषताएँ:
- झारखंड की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति (14.56%)
- केवल झारखंड में ही पाई जाती है।
- भाषा – मुण्डारी (ऑस्ट्रो-एशियाटिक)
- गोत्र को कीली कहते हैं।
- गोत्र की संख्या – 340 (रिजले के अनुसार)
रांची जिले में सबसे अधिक संख्या में कौन-सी जनजाति मिलती है?
- असुर
- मुंडा
- महली
- हो
Explanation:
- राँची जिले में सबसे अधिक संख्या में मुण्डा जनजाति मिलती है।
- मुण्डा का निवास – राँची, गुमला, सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां
- मुण्डा शब्द का अर्थ – विशिष्ट व्यक्ति (गाँव का राजनीतिक प्रमुख)
- राँची में पाई जाने वाली अन्य जनजातियाँ:
- उराँव – दूसरी सबसे बड़ी
- खड़िया
- संथाल
- खरवार
निम्नलिखित जनजातियों में से कौन-सा मृतकों की याद रखने के लिए ‘सासन – दीरी’ जगह है ?
- असुर
- मुंडा
- महली
- हो
Explanation:
- मुण्डा जनजाति में मृतकों की याद रखने के लिए ‘सासन दिरि’ (सासन-दीरी) जगह होती है।
- सासन – वह स्थान जहाँ मुण्डा जनजाति के पूर्वजों की हड्डियाँ दबी होती हैं।
- सासन दिरि – सासन में मृतक की स्मृति में शिलाखंड रखा जाता है, जिसे सासन दिरि कहते हैं।
- अन्य जनजातियों में पूर्वज पूजा के स्थान:
- उराँव – सासन (पूर्वजों की आत्मा का निवास स्थान)
- हो – अदिग (पूर्वजों का पवित्र स्थान – रसोई घर के एक कोने में)
निम्नलिखित जनजातियों में से कौन-सा मृतकों की याद रखने के लिए ‘सासन – दीरी’ जगह है ?
- असुर
- मुंडा
- महली
- हो
Explanation:
- यह पिछले प्रश्न की पुनरावृत्ति है।
- सासन दिरि – मुण्डा जनजाति में मृतकों की स्मृति में शिलाखंड रखने की जगह।
- सासन – मुण्डा जनजाति के पूर्वजों की हड्डियाँ दबाने का स्थान।
झारखण्ड में किस जनजाति का युवा गृह ‘गतिओरा’ के नाम से जाना जाता है?
- असुर
- मुंडा
- महली
- हो
Explanation:
- मुण्डा जनजाति का युवागृह ‘गितिओड़ा’ (गतिओरा) के नाम से जाना जाता है।
- गितिओड़ा – मुण्डा, कोरा, असुर जनजातियों का युवागृह।
- विभिन्न जनजातियों में युवागृह के नाम (पुनरावृत्ति):
- संथाल – घोटुल
- गोंड – घोटुल/गोटुल
- उराँव – घुमकुरिया
- खड़िया – गितिओ
- मुण्डा, कोरा, असुर – गितिओड़ा
- बिरहोर – गितिजोरी/गत्योरा
- हो – गोतिआरा
- सौरिया पहाड़िया – कोड़वाह
झारखण्ड की कौन-सी जनजाति बसी हुई कृषि करती है?
- असुर
- मुंडा
- महली
- हो
Explanation:
- मुण्डा जनजाति बसी हुई (स्थापित) कृषि करती है।
- मुण्डा – स्थापित कृषक (बसे हुए किसान)
- इनकी भूमि तीन प्रकार की होती है:
- पंकु – हमेशा उपज देने वाली भूमि
- नागरा – औसत उपज वाली भूमि
- खिरसी – बालू युक्त भूमि
- प्रमुख पेशा – कृषि व पशुपालन
- अन्य जनजातियों में कृषि प्रकार:
- संथाल – स्थापित कृषि
- उराँव – स्थापित कृषि
- सौरिया पहाड़िया – स्थानांतरणशील कृषि (झूम)
- बिरहोर – शिकारी-संग्रहकर्ता
” गोनोंग ” किस जनजाति में वधू मूल्य प्रथा के नाम से जानी जाती है?
- असुर
- मुंडा
- महली
- हो
Explanation:
- हो जनजाति में वधु मूल्य को गोनोंग (पोन) कहा जाता है।
- हो जनजाति का वधु मूल्य – गोनोंग या पोन
- विभिन्न जनजातियों में वधु मूल्य के नाम:
- संथाल – पोन
- हो – गोनोंग या पोन
- मुण्डा – कुरी गोनोंग/गोनोंग टका
- खड़िया – गिनिंग तह
- उराँव – क्रय विवाह में वधु मूल्य देना पड़ता है
- कवर – सुक-दाम
- बंजारा – हरजी
- चेरो – दस्तुरी
बोंगा किस कबीले के देवता हैं?
- असुर
- मुंडा
- महली
- हो
Explanation:
- बोंगा हो जनजाति के देवता हैं।
- हो जनजाति के प्रमुख देवता सिंगबोंगा हैं।
- बोंगा – आदिवासियों का प्रमुख देवता है।
- हो जनजाति के प्रमुख देवता:
- सिंगबोंगा – प्रमुख देवता
- मरांग बुरू – पहाड़ देवता
- पाहुई बोंगा – ग्राम देवता
- दसाउली बोंगा – वर्षा देवता
- नागे बोंगा – नाग देवता
- ओटी बोड़ोम – पृथ्वी देवता
- अन्य जनजातियों में भी ‘बोंगा’ देवता पाए जाते हैं:
- संथाल – सिंगबोंगा, मरांग बुरू, जाहेर ऐरा, ओड़ाक बोंगा
- मुण्डा – सिंगबोंगा, हातू बोंगा, बुरू बोंगा, इकिर बोंगा, ओड़ा बोंगा
- खड़िया – बेला भगवान/ठाकुर, पारदूबो, बोराम, गुमी
‘अंडी’ और ‘ओपोरतीपि’ नाम से प्रचलित विवाह किस आदिवासी समुदाय से संबंधित है?
- असुर
- मुंडा
- महली
- हो
Explanation:
- ‘अंडी/ओपोरतीपि’ विवाह हो जनजाति में प्रचलित है।
- अंडी/ओपोरतीपि विवाह – वर द्वारा कन्या का हरण करके विवाह।
- हो जनजाति के विवाह प्रकार:
- आदि विवाह – सर्वाधिक श्रेष्ठ (वर स्वयं प्रस्ताव लेकर वधु के घर जाता है)
- दिकू आदि विवाह
- अंडी/ओपोरतीपि विवाह – हरण विवाह
- राजी-खुशी विवाह – प्रेम विवाह
- आदेर/अनादर विवाह – हठ विवाह
निम्न में से कौन-सी जनजाति बहादुर जनजाति है ?
- खरवार
- कोरवा
- महली
- हो
Explanation:
- खरवार एक बहादुर (मार्शल/लड़ाकू) जनजाति है।
- खरवार को ‘अठारह हजारी’ भी कहा जाता है।
- यह सत्य के लिए तथा सत्य हेतु सभी कुछ बलिदान करने के लिए प्रसिद्ध है।
- खरवार सूर्यवंशी राजपूत हरिशचन्द्र रोहिताश्व का वंशज माने जाते हैं।
- यह झारखंड की पाँचवीं सबसे बड़ी जनजाति है।
- खरवार जनजाति की विशेषताएँ:
- प्रजाति – द्रविड़
- भाषा – खेरवारी (ऑस्ट्रो-एशियाटिक)
- निवास – पलामू प्रमण्डल
- सामाजिक स्तर का मुख्य निर्धारक – भू-संपदा
- बाल विवाह को श्रेष्ठ माना जाता है।
इनमें से कौन-सी जनजाति सत्य के लिए तथा सत्य हेतु सभी कुछ बलिदान करने के लिए प्रसिद्ध है?
- खरवार
- कोरवा
- महली
- हो
Explanation:
- खरवार सत्य के लिए तथा सत्य हेतु सभी कुछ बलिदान करने के लिए प्रसिद्ध है।
- खरवार – सत्य बोलने के गुण के लिए प्रसिद्ध।
- यह एक मार्शल (लड़ाकू) जनजाति है।
- सत्य के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने की परंपरा।
ललित प्रसाद विद्यार्थी के वर्गीकरण के अनुसार, कौन-सी जनजाति स्थानांतरण कृषि प्रकार है :
- सौरिया पहाड़िया
- मुंडा, संथाल
- उरांव, खरिया
- असुर, बंजारा
Explanation:
- ललित प्रसाद विद्यार्थी के वर्गीकरण में सौरिया पहाड़िया स्थानांतरण कृषि (झूम) प्रकार की जनजाति है।
- सौरिया पहाड़िया – स्थानांतरणशील कृषि (झूम) करते हैं, जिसे ‘कुरवा’ कहते हैं।
- ललित प्रसाद विद्यार्थी के वर्गीकरण के अनुसार अन्य प्रकार:
- स्थापित कृषि – मुण्डा, संथाल, उराँव, खड़िया
- शिकार-संग्रहकर्ता – बिरहोर, कोरवा, पहाड़ी खड़िया
- सामान्य कारीगर – महली, लोहरा, करमाली
- स्थानांतरण कृषि – सौरिया पहाड़िया
मलेर किससे संबंधित है?
- खरवार
- सौरिया पहाड़िया
- महली
- हो
Explanation:
- मलेर सौरिया पहाड़िया जनजाति से संबंधित है।
- सौरिया पहाड़िया को मलेर भी कहा जाता है।
- प्रमुख निवास – राजमहल क्षेत्र के ‘दामिन-ए-कोह’
- इन्हें संथाल परगना का आदि निवासी माना जाता है।
- भाषा – मालतो (द्रविड़ भाषा परिवार)
निम्न में से किस जनजाति में गोत्र प्रथा नहीं है?
- खरवार
- सौरिया पहाड़िया
- महली
- हो
Explanation:
- सौरिया पहाड़िया जनजाति में गोत्र प्रथा नहीं है।
- सौरिया पहाड़िया – आदिम जनजाति
- पहाड़िया जनजाति में गोत्र की व्यवस्था नहीं पाई जाती है।
- अन्य जनजातियों में गोत्र प्रथा:
- खरवार – गोत्र (पारी) की व्यवस्था
- महली – 16 गोत्र
- हो – 80 से अधिक गोत्र (किली)
- माल पहाड़िया – गोत्र नहीं
झारखण्ड में निम्नलिखित में से कौन-सी जनजाति कृषि को बदलने की प्रथा से जुड़ी है?
- खरवार
- सौरिया पहाड़िया
- महली
- हो
Explanation:
- सौरिया पहाड़िया कृषि को बदलने (स्थानांतरणशील कृषि/झूम) की प्रथा से जुड़ी है।
- सौरिया पहाड़िया – स्थानांतरणशील कृषि (झूम) करते हैं, जिसे ‘कुरवा’ कहते हैं।
- अन्य जनजातियों में झूम खेती के नाम:
- माल पहाड़िया – ‘कुरवा’
- परहिया – ‘बियोड़ा’ या ‘झूम’
- गोंड – ‘दीपा’ या ‘बेवार’
- खोंड – ‘पोड़चा’
- कोरवा – ‘बियोड़ा’
झारखण्ड की कौन-सी जनजाति स्थानांतरण कृषि करती है?
- खरवार
- सौरिया पहाड़िया
- महली
- हो
Explanation:
- सौरिया पहाड़िया स्थानांतरण कृषि (झूम) करती है।
- सौरिया पहाड़िया – आदिम जनजाति
- मुख्य निवास – राजमहल क्षेत्र (दामिन-ए-कोह)
- झूम खेती को ‘कुरवा’ कहते हैं।
- गलत विकल्प:
- खरवार – स्थापित कृषि
- महली – सामान्य कारीगर (बांस कला)
- हो – स्थापित कृषि
झारखण्ड में राजमहल पहाड़ियों में कौन-सी प्रमुख जनजाति वास करती है?
- खरवार
- सौरिया पहाड़िया
- महली
- हो
Explanation:
- राजमहल पहाड़ियों में सौरिया पहाड़िया जनजाति वास करती है।
- सौरिया पहाड़िया – मुख्य निवास राजमहल क्षेत्र के ‘दामिन-ए-कोह’
- माल पहाड़िया – भी संथाल परगना क्षेत्र में
- पहाड़िया जनजाति मुख्यतः संथाल परगना में पाई जाती है।
- राजमहल पहाड़ियों की विशेषताएँ:
- यहाँ काली मिट्टी पाई जाती है।
- यह क्षेत्र संथाल परगना का हिस्सा है।
- यहाँ सौरिया पहाड़िया एवं माल पहाड़िया आदिम जनजातियाँ निवास करती हैं।
झूम किससे संबंधित है?
- खरवार
- पहाड़िया
- महली
- हो
Explanation:
- झूम (स्थानांतरणशील कृषि) पहाड़िया जनजाति से संबंधित है।
- सौरिया पहाड़िया – ‘कुरवा’
- माल पहाड़िया – ‘कुरवा’
- पहाड़िया जनजाति की विशेषताएँ:
- यह आदिम जनजाति है।
- सौरिया पहाड़िया एवं माल पहाड़िया दो प्रमुख शाखाएँ।
- भाषा – मालतो (द्रविड़ भाषा परिवार)
- गोत्र प्रथा नहीं पायी जाती है।
झारखण्ड में किस जनजाति में श्राद्ध संस्कार को ‘कमावत’ कहा जाता है?
- भूमिज
- पहाड़िया
- महली
- हो
Explanation:
- भूमिज जनजाति में श्राद्ध संस्कार को ‘कमावत’ कहा जाता है।
- भूमिज – झारखंड में निवास हजारीबाग, राँची व धनबाद
- प्रजातीय संबंध – प्रोटो ऑस्ट्रेलायड
- भाषा – मुण्डारी (ऑस्ट्रो-एशियाटिक)
- भूमिज जनजाति की विशेषताएँ:
- उपनाम – ‘धनबाद के सरदार’, ‘चुहाड़’ (मुगल काल में)
- गोत्र की संख्या – 4 (पत्ती, जेयोला, गुल्गु, हेम्ब्रोम)
- तलाक – पति द्वारा पत्ते को फाड़कर
- जातीय पंचायत का मुखिया – प्रधान
- सर्वोच्च देवता – ग्राम ठाकुर और गोराई ठाकुर
- धार्मिक प्रधान – लाया
किस जनजाति ने बाँस को ही अपना मूल केन्द्र मानकर अर्थव्यवस्था का आधार चुन लिया है?
- भूमिज
- पहाड़िया
- महली
- हो
Explanation:
- महली जनजाति ने बाँस को ही अपना मूल केन्द्र मानकर अर्थव्यवस्था का आधार चुन लिया है।
- महली एक शिल्पी जनजाति है, जो बांस कला में पारंगत है।
- बांस की टोकरी व ढोल बनाने में पारंगत।
- महली जनजाति की विशेषताएँ:
- प्रजाति – द्रविड़ परिवार
- गोत्र की संख्या – 16
- वधु मूल्य – पोन टका
- मुख्य देवी – सूरजी देवी
- पुरखों की पूजा – गोड़म साकी (बूढ़ा-बूढ़ी पर्व)
- जातीय पंचायत – परगनैत
- उलूर पूजा – सिल्ली क्षेत्र में
झारखण्ड की कौन-सी जनजाति साधारण शिल्पकारों से मिलकर बनती है ?
- भूमिज
- पहाड़िया
- महली
- हो
Explanation:
- महली साधारण शिल्पकारों (सामान्य कारीगर) से मिलकर बनती है।
- ललित प्रसाद विद्यार्थी के वर्गीकरण में महली को सामान्य कारीगर प्रकार की जनजाति माना गया है।
- सामान्य कारीगर जनजातियाँ:
- महली – बांस कला
- लोहरा – लौह उपकरण
- करमाली – दस्तकार/शिल्पकार
झारखण्ड के निम्नलिखित जनजातियों में से किसे ‘सरल कारीगर’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है?
- भूमिज
- पहाड़िया
- महली
- हो
Explanation:
- महली को ‘सरल कारीगर’ (सामान्य कारीगर) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- महली बांस से टोकरी एवं ढोल बनाने में दक्ष हैं।
- यह शिल्पी जनजाति है।
- महली की उपजातियाँ (रिजले द्वारा 5 उपजातियाँ):
- बांस फोड़ माहली – बांस से टोकरी बनाने वाले (नोट: तुरी जनजाति भी टोकरी बनाती है)
- पातर माहली – खेती कार्य
- तांती माहली – पालकी ढोने वाले
- सुलंकी माहली – मजदूरी व खेती कार्य
- माहली मुण्डा – मजदूरी व खेती कार्य
खड़िया जनजाति की अनेक पारम्परिक मान्यताएं किस जनजाति से मिलती हैं?
- भूमिज से
- पहाड़िया से
- महली से
- मुण्डाओं से
Explanation:
- खड़िया जनजाति की अनेक पारम्परिक मान्यताएं मुण्डाओं से मिलती हैं।
- खड़िया एवं मुण्डा दोनों प्रोटो-आस्ट्रेलायड प्रजाति से संबंधित हैं।
- दोनों की भाषा ऑस्ट्रो-एशियाटिक (मुण्डारी) भाषा परिवार से है।
- दोनों सरना धर्म के अनुयायी हैं।
- खड़िया जनजाति की विशेषताएँ:
- नाम खड़खड़िया (पालकी) ढोने के कारण पड़ा।
- तीन वर्ग – पहाड़ी खड़िया (सर्वाधिक पिछड़े), ढेलकी खड़िया, दूध खड़िया (सर्वाधिक संपन्न)
- वधु मूल्य – गिनिंग तह
- युवागृह – गितिओ
- प्रमुख देवता – बेला भगवान/ठाकुर
- धार्मिक प्रधान – कालो या पाहन
पहाड़ी, दूध और ढेलकी, किस जनजाति की शाखाएं हैं?
- खड़िया
- पहाड़िया
- महली
- मुण्डा
Explanation:
- पहाड़ी, दूध और ढेलकी खड़िया जनजाति की शाखाएं हैं।
- खड़िया जनजाति तीन वर्गों में विभाजित है:
- पहाड़ी खड़िया – सर्वाधिक पिछड़े
- ढेलकी खड़िया
- दूध खड़िया – सर्वाधिक संपन्न
- खड़िया जनजाति तीन वर्गों में विभाजित है:
- खड़िया जनजाति के प्रमुख त्योहार:
- जकोंर (बसंतोत्सव)
- बंदई (कार्तिक पूर्णिमा)
- करमा, कदलेटा, बंगारी, जोओडेम (नवाखानी)
- फागु शिकार – ‘पाट’ और ‘बोराम’ की पूजा
- बा बिडि – बीजारोपण के समय
- नयोदेम/धाननुआ खिया – नया अन्न ग्रहण करने से पूर्व
झारखण्ड राज्य में स्त्री-पुरुष अनुपात के मामले में किस जनजाति की महिलाएं पुरुष जनसंख्या से अधिक है?
- खड़िया
- पहाड़िया
- महली
- मुण्डा
Explanation:
- 2001 की जनगणना में खड़िया जनजाति में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक थी।
- खड़िया एवं हो – इन दो जनजातियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है।
- खड़िया जनजाति के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य:
- प्रजाति – प्रोटो-आस्ट्रेलायड
- भाषा – खड़िया (मुण्डारी परिवार)
- निवास – गुमला, सिमडेगा, राँची, लातेहार, सिंहभूम, हजारीबाग
- यह उच्च लिंगानुपात वाली जनजाति है।
‘सौरिया पहाड़िया’ ‘बेरू गोसाई’ की पूजा किस प्राकृतिक शक्ति के रूप में करते हैं?
- सूर्य
- वायु
- जल
- धरती
Explanation:
- सौरिया पहाड़िया ‘बेरू गोसाई’ की पूजा सूर्य के रूप में करते हैं।
- बैरू गोसाई – सूर्य देवता
- सौरिया पहाड़िया के प्रमुख देवता:
- लैहू गोसाई – प्रमुख देवता
- बैरू गोसाई – सूर्य देवता
- विल्प गोसाई – चांद देवता
- जरमात्रे गोसाई – जन्म देवता
- काल गोसाई – काल देवता
- पो गोसाई – राजमार्ग के देवता
- दरमारे गोसाई – सत्य देवता
- औटगा – शिकार देवता
हो समुदाय में ‘वधू मूल्य’ को क्या कहा जाता है?
- दाम
- बुरू
- दिरी
- गोनोंग
Explanation:
- हो समुदाय में ‘वधू मूल्य’ को ‘गोनोंग’ (पोन) कहा जाता है।
- हो जनजाति का वधु मूल्य – गोनोंग या पोन
- हो जनजाति की विशेषताएँ:
- झारखंड की चौथी सबसे बड़ी जनजाति
- निवास – कोल्हान प्रमण्डल
- भाषा – हो (मुण्डारी परिवार)
- लिपि – ‘बारङचित्ति’ (आविष्कारक – लाको बोदरा)
- प्रमुख देवता – सिंगबोंगा
- धार्मिक प्रधान – दिउरी
मुंडा परंपरा का ‘रिजगढ़’ किस स्थल से संबंधित है ?
- रोहतासगढ़
- राजगीर
- बीजनगढ़
- पालीगढ़
Explanation:
- मुण्डा परंपरा का ‘रिजगढ़’ रोहतासगढ़ से संबंधित है।
- मुण्डा जनजाति रिजगढ़ (राजगीर, बिहार) तथा रूईदासगढ़ से दक्षिण की तरफ ओमेडंडा (बुरमु, झारखण्ड) में आकर बसी।
- रिजगढ़ मुण्डाओं के आगमन मार्ग से संबंधित है।
- मुण्डा जनजाति का आगमन:
- झारखंड में आगमन – 600 ई.पू. में
- रोहतास क्षेत्र से मुण्डा जनजाति का आगमन हुआ था।
मुण्डाओं की पुरखा कहानियाँ एक मौखिक परम्परा का हिस्सा हैं। इस परम्परा को क्या कहते हैं?
- नागवंशावली
- होर संबाद
- सहिया गीत
- सोसोबोंगा
Explanation:
- मुण्डाओं की पुरखा कहानियाँ एक मौखिक परम्परा का हिस्सा हैं, जिसे सोसोबोंगा कहते हैं।
- सोसो बोंगा – मुण्डा जनजाति की प्रसिद्ध लोककथा है।
- यह गीत के रूप में प्रस्तुत की जाती है।
- जगदीश त्रिगुणायत द्वारा ‘सोसो बोंगा’ नामक पुस्तक लिखी गई।
- मुण्डा जनजाति की अन्य सांस्कृतिक विशेषताएँ:
- भाषा को होड़ो जगर कहते हैं।
- स्वयं को होड़ोको कहते हैं।
- गोत्र को कीली कहते हैं।
- पूजा स्थल – सरना
- धार्मिक प्रधान – पाहन
2011 की जनगणना के अनुसार, झारखण्ड में संथाल एवं मुण्डा जनजाति का अनुपात कुल जनजातीय जनसंख्या के अनुसार कितना है?
- 15 : 34
- 19 : 30
- 34 :15
- 30 : 19
Explanation:
- 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में संथाल एवं मुण्डा जनजाति का अनुपात 34 : 15 है।
- संथाल – जनजातियों की कुल जनसंख्या का 35% (लगभग 34%)
- मुण्डा – जनजातियों की कुल जनसंख्या का 14.56% (लगभग 15%)
- झारखंड की जनजातियों का जनसंख्या क्रम:
- संथाल (35%) – प्रथम
- उराँव (18.14%) – द्वितीय
- मुण्डा (14.56%) – तृतीय
- हो – चतुर्थ
- खरवार – पंचम
मुंडा आदिवासी क्षेत्रों में, गांव का मुखिया कहलाता है।
- चामुंडा
- पंडा
- कुंडा
- हातु मुंडा
Explanation:
- मुण्डा आदिवासी क्षेत्रों में गाँव का मुखिया हातु मुण्डा कहलाता है।
- मुण्डा – ग्राम प्रधान को मुण्डा कहते हैं।
- हातू – ग्राम पंचायत को कहते हैं।
- हातू मुण्डा – ग्राम पंचायत का प्रधान।
- मुण्डा जनजाति की सामाजिक व्यवस्था:
- ग्राम पंचायत – हातू
- ग्राम पंचायत प्रधान – हातू मुण्डा
- कई गाँवों की पंचायत – परहा/पड़हा
- पड़हा पंचायत प्रधान – मानकी
- वंशकुल – खूट
- पंचायत स्थल – अखड़ा
मुंडा जनजाति में पाहन को दी जाने वाली लगान मुक्त भूमि को क्या कहा जाता है?
- खजी भूमि
- कृषि मुक्त भूमि
- डाली कटारी भूमि
- मोफत भूमि
Explanation:
- मुण्डा जनजाति में पाहन (धार्मिक प्रधान) को दी जाने वाली लगान मुक्त भूमि को डाली कटारी भूमि कहा जाता है।
- पाहन – मुण्डा जनजाति का धार्मिक प्रधान।
- इसे विशेष भूमि अनुदान के रूप में दिया जाता है।
- मुण्डा जनजाति के धार्मिक पदाधिकारी:
- पाहन – गाँव का धार्मिक प्रधान
- पुजार/पनभरा – पाहन का सहायक
- डेहरी – ग्रामीण पुजारी
- देवड़ा – झाड़-फूंक करने वाला
मुंडा जनजाति अपनी भाषा मुंडारी को…… कहते हैं ।
- गुनगुन गुंटा
- आलो टिक्को उत्तर
- लोमो फाबो
- होडो जगर
Explanation:
- मुण्डा जनजाति अपनी भाषा मुण्डारी को होड़ो जगर कहते हैं।
- होड़ो जगर – मुण्डा लोगों की भाषा/बोली।
- होड़ो – मुण्डा लोगों का आत्म-नाम।
- मुण्डा जनजाति की भाषाई विशेषताएँ:
- भाषा – मुण्डारी
- भाषा परिवार – ऑस्ट्रो-एशियाटिक
- स्वयं को होड़ोको कहते हैं।
मुंडाओं के प्रमुख देवता कौन हैं?
- गुनगुन गुंटा
- सिंगबोंगा
- लोमो फाबो
- होडो जगर
Explanation:
- मुण्डाओं के प्रमुख देवता सिंगबोंगा हैं।
- सिंगबोंगा – सूर्य का प्रतिरूप, सृष्टि का रचयिता।
- मुण्डा जनजाति के अन्य प्रमुख देवी-देवता:
- हातू बोंगा – ग्राम देवता
- देशाउली – गाँव की सबसे बड़ी देवी
- खूटहँकार/ओड़ा बोंगा – कुल देवता
- इकिर बोंगा – जल देवता
- बुरू बोंगा – पहाड़ देवता
मुंडा आबादी खुद को ……….. बताते हैं ।
- गुनगुन गुंटा
- होड़ोको
- लोमो फाबो
- होडो जगर
Explanation:
- मुण्डा आबादी खुद को होड़ोको कहते हैं।
- होड़ोको – मुण्डा लोगों का आत्म-नाम।
- होड़ोको – ‘होड़ो’ का बहुवचन (होड़ो लोग)
- अन्य जनजातियों के आत्म-नाम:
- उराँव – कुडुख (मानव)
- संथाल – होड़ (लोग)
- हो – अपने आप को हो कहते हैं।
सासन एक स्थान है, जहां मुंडा : ,
- अपने पूर्वजों की अस्थियों को रखते हैं
- अपना भोजन रखते हैं
- अपने पशुओं को रखते हैं
- अपने आभूषणों का रखते हैं
Explanation:
- सासन एक स्थान है, जहाँ मुण्डा अपने पूर्वजों की अस्थियों को रखते हैं।
- सासन – वह स्थान जहाँ मुण्डा जनजाति के पूर्वजों की हड्डियाँ दबी होती हैं।
- सासन दिरि – सासन में मृतक की स्मृति में शिलाखंड रखा जाता है।
- अन्य जनजातियों में पूर्वजों की अस्थियाँ रखने की परंपरा:
- उराँव – सासन (पूर्वजों की आत्मा का निवास स्थान)
- हो – अदिग (रसोई घर के एक कोने में पूर्वजों का पवित्र स्थान)
प्रारंभिक काल में महतो के कार्यभार से पहले उराँव ग्रामों का पुरोहिती एवं लौकिक प्रधान कौन था?
- पुजार
- बैगा
- गोड़ाईत
- इनमें से कोई नहीं
Explanation:
- प्रारंभिक काल में महतो के कार्यभार से पहले उराँव ग्रामों का पुरोहिती एवं लौकिक प्रधान गोड़ाईत था।
- उराँव जनजाति में ग्राम प्रधान को महतो कहा जाता है।
- इससे पहले गोड़ाईत पुरोहिती एवं लौकिक कार्यों का प्रधान था।
- उराँव जनजाति की प्रशासनिक व्यवस्था:
- ग्राम प्रधान – महतो (मुखिया)
- पंचायत – पंचोरा
- धार्मिक प्रधान – पाहन
- सहयोगी – पुजार
उरांव जनजातियां खुद को “कुडुख” कहते हैं। जिसका मतलब है:-
- भक्त
- बहादुर
- मानव
- इनमें से कोई नहीं
Explanation:
- उराँव जनजाति खुद को ‘कुडुख’ कहते हैं, जिसका अर्थ ‘मानव’ है।
- कुडुख (उराँव) का अर्थ – ‘मनुष्य’
- उराँव जनजाति का दूसरा नाम – कुडुख
- भाषा – कुडुख भाषा (द्रविड़ परिवार)
- उराँव जनजाति के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह झारखंड की सबसे शिक्षित जनजाति है।
- झारखंड की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति (18.14%)
- भारत की चौथी सबसे बड़ी जनजाति
- प्रमुख देवता – धर्मेश
- धार्मिक प्रधान – पाहन
- गोत्र (किली) की संख्या – 68
