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झारखंड के विश्व प्रसिद्ध ‘छऊ नृत्य’ (Chhau Dance) की ‘सरायकेला शैली’ के संदर्भ में कौन-सा कथन सत्य है?
- यह नृत्य शैली पूरी तरह से मुखौटा (Mask) पहनकर की जाती है तथा इसमें अभिव्यक्ति का मुख्य माध्यम अंग-संचालन और भाव-भंगिमाएँ हैं
- इस नृत्य में किसी भी प्रकार के मुखौटे का प्रयोग पूरी तरह से वर्जित है
- यह नृत्य केवल महिलाओं द्वारा रात के समय बंद कमरों में किया जाता है
- इसमें संवाद (Dialogues) बोलना सबसे अनिवार्य अंग माना जाता है
Explanation:
- सरायकेला छऊ नृत्य अपनी विशिष्ट मुखौटा शैली (Mask Art) और कथानक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है ।
- इसमें नर्तक चेहरे पर मुखौटा पहनकर बिना बोले केवल अपने अंग-संचालन (Body Movements) और लयबद्ध शारीरिक मुद्राओं द्वारा कथा प्रस्तुत करते हैं ।
झारखंड की प्रसिद्ध ‘सोहराय’ और ‘कोहबर’ चित्रकला शैलियों के संदर्भ में कौन-सा विकल्प सही सुमेलित है?
- कोहबर – नवविवाहित जोड़ों के घर/कमरे की दीवारों पर बनाई जाने वाली मांगलिक कला | सोहराय – फसल कटाई एवं सोहराय पर्व पर पशुधन के प्रति सम्मान दर्शाने वाली कला
- कोहबर – केवल कपड़ों पर की जाने वाली एम्ब्रॉयडरी | सोहराय – धातु की मूर्तियाँ बनाने की कला
- कोहबर – केवल पुरुषों द्वारा की जाने वाली लकड़ी की नक्काशी | सोहराय – मिट्टी के बर्तनों की चित्रकारी
- कोहबर – केवल कागज़ पर जलरंगों से बनाई जाने वाली पेंटिंग | सोहराय – केवल पत्थरों को तराशने की कला
Explanation:
- कोहबर कला मुख्य रूप से विवाह के अवसर पर कोहबर घर (वर-वधू के कमरे) की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती है ।
- सोहराय कला दिवाली/सोहराय पर्व के अवसर पर फसल कटाई के दौरान मवेशियों और प्रकृति के सम्मान में महिलाओं द्वारा दीवारों पर चित्रित की जाती है ।
झारखंड के पारंपरिक लोक संगीत और वाद्य यंत्रों के संदर्भ में किस वाद्य यंत्र को ‘झारखंडी वायलिन’ (Jharkhandi Violin) कहा जाता है?
- बनम / केन्द्रा (Kendra)
- मांदर (Mandar)
- धमसा (Dhamsa)
- बांसुरी (Bansuri)
Explanation:
- केन्द्रा (या बनम) झारखंड का एक अत्यंत प्राचीन तंतु वाद्य (String Instrument) है जिसे नारियल के खोल, लकड़ी और सूखे कद्दू से बनाया जाता है ।
- इसे घोड़े के बाल से बनी कमानी (Bow) से बजाया जाता है, जिसके कारण इसे ‘झारखंड का वायलिन’ भी कहा जाता है ।
झारखंड की प्राचीन एवं विलुप्तप्राय ‘डोकरा कला’ (Dokra Art) का संबंध निम्नलिखित में से किस हस्तशिल्प तकनीक से है?
- लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग (Lost-Wax Casting) – ढलवाँ धातु कला
- काष्ठ नक्काशी (Wood Carving)
- हाथ की बुनाई (Handloom Weaving)
- मृत्तिका शिल्प (Terracotta Pottery)
Explanation:
- डोकरा कला मल्हार और झरा समुदायों द्वारा अपनाई जाने वाली अत्यंत प्राचीन लॉस्ट-वैक्स ढलाई तकनीक (Lost-Wax Metal Casting) पर आधारित हस्तशिल्प है ।
- इसमें पीतल, कांसा और मोम के साँचों का उपयोग करके मूर्तियों और आभूषणों का निर्माण किया जाता है ।
झारखंड की ‘जादोपटिया’ (Jadopatia) चित्रकला शैली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए तथा सत्य कूट का चयन कीजिए:
1.यह मुख्य रूप से संथाल जनजाति में प्रचलित चित्रकारी की एक पारंपरिक शैली है ।
2.इसमें ‘जादो’ (चित्रकार) द्वारा कागज़ या कपड़े के पट्टों (Scrolls) पर पौराणिक कथाओं और जीवन दर्शन के चित्र बनाए जाते हैं ।
3.इस चित्रकला में केवल रासायनिक और सिंथेटिक रंगों का ही प्रयोग किया जाता है ।
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3 सभी
Explanation:
- कथन 1 और 2 सत्य हैं; जादोपटिया संथालों की स्क्रॉल पेंटिंग (Scroll Painting) है जिसे ‘जादो’ चित्रकार बनाते हैं ।
- कथन 3 असत्य है क्योंकि इसमें केवल प्राकृतिक रंगों (जैसे पत्तों, मिट्टी, छाल और सेम के रस) का ही उपयोग किया जाता है ।
झारखंड की जनजातीय महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले पारंपरिक परिधानों के संदर्भ में ‘पांची’ (Panchi) और ‘पारहन’ (Parhan) क्या हैं?
- ‘पांची’ शरीर के ऊपरी हिस्से में और ‘पारहन’ निचले हिस्से में लपेटा जाने वाला पारंपरिक सूती वस्त्र
- ‘पांची’ चांदी का गले का हार है और ‘पारहन’ कान की बाली है
- ‘पांची’ विवाह का मुख्य मंडप है और ‘पारहन’ दुल्हन का मुकुट है
- ‘पांची’ पैरों में पहना जाने वाला कड़ा है और ‘पारहन’ कमरबंद है
Explanation:
- संथाल और अन्य जनजातीय समुदायों में महिलाओं का पारंपरिक पहनावा सूती धागों से बुना होता है ।
- कमर से नीचे पहने जाने वाले वस्त्र को पारहन तथा ऊपरी भाग पर धारण किए जाने वाले वस्त्र को पांची कहा जाता है ।
झारखंड के प्रमुख पारंपरिक सुषि वाद्य (Wind Instruments) के संदर्भ में ‘सिंगा’ (Singa) का निर्माण मुख्य रूप से किस वस्तु से किया जाता है?
- भैंस या बैल के प्राकृतिक सींग से
- खोखले बाँस के टुकड़े से
- सूखे कद्दू (तुंबा) से
- तांबे की धातु की नली से
Explanation:
- सिंगा झारखंड का एक प्रमुख सुषि वाद्य (हवा से बजने वाला यंत्र) है ।
- यह भैंस या बैल के सींग के नुकीले हिस्से को काटकर और उसमें छेद करके बनाया जाता है, जिसका प्रयोग शिकार तथा उत्सवों के समय किया जाता है ।
झारखंड के प्रसिद्ध लोक नृत्यों के संदर्भ में ‘पाइका’ (Paika) नृत्य की मुख्य विशेषता क्या है?
- यह हाथ में तलवार और ढाल लेकर छऊ या सैनिक पोषाक में किया जाने वाला एक ओजस्वी युद्ध नृत्य (Martial Dance) है
- यह केवल महिलाओं द्वारा फसल बोते समय शांत गति से किया जाने वाला नृत्य है
- यह केवल वर्षा ऋतु में बैठकर गाए जाने वाला नृत्य है
- यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों में पुजारियों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है
Explanation:
- पाइका नृत्य झारखंड का एक प्रसिद्ध मार्शल/वीर रस से परिपूर्ण नृत्य है ।
- इसमें नर्तक सैनिक पोशाक (कलगी लगी पगड़ी, ढाल और तलवार) धारण कर ओजस्वी और सामरिक शैलियों का प्रदर्शन करते हैं ।
झारखंड की ‘पैतकर चित्रकला’ (Paitkar Painting) के संदर्भ में कौन-सा कथन सही है?
- इसे भारत की सबसे प्राचीन स्क्रॉल चित्रकलाओं में से एक माना जाता है, जिसका मुख्य केंद्र पूर्वी सिंहभूम का ‘आमादुबी’ गाँव है
- यह केवल कांच की शीशियों पर की जाने वाली आधुनिक कला है
- यह केवल पलामू किले की दीवारों पर उकेरी गई नक्काशी है
- यह शैली केवल मुगलों द्वारा झारखंड में लाई गई थी
Explanation:
- पैतकर चित्रकला पूर्वी सिंहभूम के धालभूमगढ़ स्थित ‘आमादुबी गाँव’ (पैतकर गाँव) में पाई जाती है ।
- यह गरुड़ पुराण एवं गंतव्य जीवन की गाथाओं को दर्शाने वाली भारत की प्राचीनतम स्क्रॉल चित्रकला शैलियों में से एक है ।
झारखंड की ‘पाईन बोईस’ और ‘पैटर्न बुनाई’ कला से संबंधित ‘पंजी’ या ‘कथा’ परिधान तैयार करने वाले किस पारंपरिक बुनकर समुदाय को ‘कपड़ा बुनने वाला वर्ग’ माना जाता है?
- चिक-बड़ाइक (Chik Baraik)
- असुर (Asur)
- बिरजिया (Birjia)
- सबर (Sabar)
Explanation:
- चिक-बड़ाइक जनजाति को झारखंड का पारंपरिक ‘बुनकर समुदाय’ (Weaver Class) माना जाता है ।
- ये मुख्य रूप से हाथ से सूती कपडे, धोती, साड़ी और पांची-पारहन आदि वस्त्र बुनने का काम करते हैं ।
