- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘भारत-दुर्दशा‘ (1880 ई.) हिंदी साहित्य और आधुनिक हिंदी नाटक के इतिहास में एक युगान्तकारी कृति है। यह हिंदी का पहला मौलिक राजनीतिक नाटक (नाट्य रासक) माना जाता है। इसमें देश की तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दयनीय स्थिति का सजीव व व्यंग्यात्मक चित्रण किया गया है।
- उपयोगी तथ्य
- रचनाकार: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक)
- प्रकाशन वर्ष: 1880 ई.
- विधा: नाटक (नाट्य रूपक का एक भेद — नाट्य रासक / लास्यरूपक)
- अंकों की संख्या: 6 अंक
- मुख्य विषय-वस्तु: अंग्रेजी शासन का आर्थिक और मानसिक शोषण, भारत की दुर्दशा के आंतरिक/बाह्य कारण, आलस्य, अंधविश्वास, आपसी फूट और भारतवासियों में चेतना जगाने का प्रयास।
- विशेषता: यह प्रतीकात्मक (Allegorical) नाटक है, जहाँ मानवीय दुर्गुणों, प्रवृत्तियों और परिस्थितियों को सजीव पात्रों के रूप में चित्रित किया गया है।
- मुख्य पात्र (Main Characters)
- अमूर्त/प्रतीकात्मक पात्र (Allegorical Characters)
- भारत: देश का प्रतिनिधि पात्र; जो अत्यंत विवश, लाचार और दुखी अवस्था में दिखाया गया है।
- भारत-दुर्देव: नाटक का मुख्य खलनायक (Antagonist); जो विदेशी शासन (अंग्रेजी राज) और भारत की आंतरिक बुराइयों के गठजोड़ का प्रतीक है।
- भारत-भाग्य: भारत की नियति/भविष्य का प्रतीक; जो भारत को जगाने का प्रयास करता है, लेकिन भारत को पुनर्जीवित न कर पाने की निराशा में अंत में आत्महत्या कर लेता है।
- सत्यानाश (सत्यानाश फ़ौजदार): भारत-दुर्देव का सेनापति; जो धर्म, जाति-भेद, बाल-विवाह, छुआछूत और अविद्या के माध्यम से देश को नष्ट करता है।
- ### दुर्देव के सहायक / नकारात्मक प्रतीक
- आलस्य: भारतवासियों को निष्क्रिय बनाने वाला।
- मदिरा (शराब): समाज को चेतनाहीन करने वाली।
- अंधकार: अज्ञानता का प्रतीक।
- रोग, मोह, निर्लज्जता, आशा: अन्य प्रतीकात्मक पात्र।
- ‘भारत-सभा’ के बुद्धिजीवी पात्र (5वें अंक के पात्र)
- सभापति: बैठक की अध्यक्षता करने वाला।
- बंगाली, महाराष्ट्री, अख़बारवाला, कवि: जागरूक नागरिक और बुद्धिजीवी जो देश को बचाने के उपाय सोचने एकत्र होते हैं।
छः अंकों का संक्षिप्त विवरण
- 1. प्रथम अंक: स्थान: वीथी (रास्ता).
- एक ‘योगी’ आता है और लावनी शैली में “रोवहु सब मिलिकै आवहु भारत भाई। हा हा! भारत-दुर्दशा न देखी जाई॥” गाकर भारत के अतीत के गौरव और वर्तमान पतन का वर्णन करता है।
- 2. द्वितीय अंक: स्थान: श्मशान.
- ‘भारत’ फटे कपड़ों में मरणासन्न अवस्था में आता है। वह अपनी लाचारी पर रोता है। ‘निर्लज्जता’ और ‘आशा’ उसे किसी तरह संभाले रखती हैं।
- 3. तृतीय अंक: स्थान: मैदान.
- ‘भारत-दुर्देव’ का प्रवेश। वह अपनी शक्ति का बखान करता है और भारत को पूरी तरह नष्ट करने के लिए रोग, मदिरा, आलस्य, और सत्यानाश जैसे सहयोगियों को काम पर लगाता है।
- 4. चतुर्थ अंक: स्थान: कमरा.
- रोग, आलस्य, मदिरा और अंधकार मिलकर भारतवासियों की मति भ्रष्ट करने और उन्हें निकम्मा बनाने की योजना बनाते हैं।
- 5. पंचम अंक: स्थान: किताबखाना.
- सात बुद्धिजीवियों (बंगाली, महाराष्ट्री, कवि आदि) की एक ‘कमिटी’ या सभा बैठती है। वे अंग्रेजी कानूनों और भारत-दुर्देव से बचने के उपाय खोजते हैं, पर तभी ‘डिस्क्यूनिटी’ (फूट) और ‘पुलिस’ आकर सभा को भंग कर देती हैं।
- 6. षष्ठ अंक: स्थान: गंभीर वन.
- ‘भारत-भाग्य’ अचेत पड़े ‘भारत’ को उठाने और जगाने का भरसक प्रयास करता है। जब भारत नहीं उठता, तो निराश होकर ‘भारत-भाग्य’ अपनी छाती में कटार घोंपकर आत्महत्या कर लेता है। (त्रासद अंत)
- प्रमुख उद्धरण/काव्य-पंक्तियाँ:
- “रोवहु सब मिलिकै आवहु भारत भाई। हा हा! भारत-दुर्दशा न देखी जाई॥” — योगी (प्रथमांक)
- “अँगरेजी राज सुख साज सजे सब भारी। पै धन बिदेस चलि जात इहै अति ख्वारी॥” — भारत-दुर्दशा
- “मुझको तुम सब भूल गए, पर मैंने तुमको नहीं भूला।” — भारत-दुर्देव
- आर्थिक शोषण का सिद्धांत: दादाभाई नौरोजी के ‘धन निष्कासन सिद्धांत’ (Drain of Wealth Theory) का प्रभाव इस नाटक में स्पष्ट दिखता है।
- नाटक का अंत: यह नाटक एक दुखांत (Tragedy) नाटक है, क्योंकि अंत में ‘भारत-भाग्य’ आत्महत्या कर लेता है।
- भाषा: काव्य-भाग में ब्रजभाषा तथा संवादों/गद्य में प्रारंभिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।
