ध्रुवस्वामिनी – जयशंकर प्रसाद JSSC Graduate Level Exams Paper -2 Hindi Notes
जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘ध्रुवस्वामिनी‘ (1933 ई.) आधुनिक हिंदी नाट्य साहित्य का एक ऐतिहासिक और विचारोत्तेजक नाटक है। इसमें गुप्त काल की पृष्ठभूमि में नारी-मुक्ति, अनमेल विवाह, पुनर्विवाह और राजनीतिक सत्ता के अधिकार जैसे गंभीर प्रश्नों को उठाया गया है।
उपयोगी तथ्य
रचनाकार: जयशंकर प्रसाद (छायावाद के प्रमुख स्तंभ)
प्रकाशन वर्ष: 1933 ई. (यह जयशंकर प्रसाद का अंतिम नाटक है)
विधा: ऐतिहासिक एवं समस्या नाटक
अंकों की संख्या: 3 अंक
मुख्य विषय-वस्तु: नारी-मुक्ति (स्त्री स्वातंत्र्य), अनमेल विवाह, तलाक/मोक्ष की समस्या, पुनर्विवाह, क्लीव/कायर राजा का शासन और राष्ट्रीय स्वाभिमान।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: गुप्त वंश (चौथी शताब्दी) — सम्राट समुद्रगुप्त के बाद उनके दो बेटों रामगुप्त और चंद्रगुप्त तथा ध्रुवस्वामिनी के बीच का ऐतिहासिक घटनाक्रम।
मुख्य पात्र
पुरुष पात्र
चंद्रगुप्त: समुद्रगुप्त का छोटा पुत्र; वीर, स्वाभिमानी, न्यायप्रिय और ध्रुवस्वामिनी का वास्तविक प्रेमी व न्यायपूर्ण उत्तराधिकारी।
रामगुप्त: समुद्रगुप्त का बड़ा पुत्र; कायर, विलासी, शराबी, क्लीव (पुंसत्वहीन) और छल से गद्दी हथियाने वाला शासक।
शकाधिपति (शकराज): गुप्त साम्राज्य का शत्रु; जो शांति-संधि के बदले ध्रुवस्वामिनी और सामंत-कुमारियों की मांग रखता है।
शिखरस्वामी: रामगुप्त का अवसरवादी, कुटिल और कूटनीतिज्ञ अमात्य (मंत्री)।
खिंगिल: शकराज का दूत।
मिहिरदेव: कोमा के पिता; नीतिशास्त्र के ज्ञाता और ज्योतिषी।
पुरोहित: धर्मशास्त्र का ज्ञाता; जो न्याय का पक्ष लेता है और रामगुप्त द्वारा ध्रुवस्वामिनी के परित्याग को अधर्म बताकर उनके विवाह-विच्छेद (तलाक) को शास्त्रसम्मत ठहराता है।
स्त्री पात्र
ध्रुवस्वामिनी: नाटक की नायिका; गुप्त साम्राज्य की महादेवी, स्वाभिमानी, साहसी और अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने वाली स्त्री।
कोमा: शकराज की प्रेयसी और मिहिरदेव की पुत्री; प्रेम, निष्ठा और करुणा की प्रतीक।
मंदाकिनी: रामगुप्त और चंद्रगुप्त की बहन; जो राजनीतिक षड्यंत्रों का विरोध करती है और नारी-मुक्ति का पक्ष लेती है।
अंकों का संक्षिप्त विवरण
1. प्रथम अंक: स्थान: शक-शिविर के पास गुप्तों का सैनिक शिविर.
समुद्रगुप्त के बाद कुटिल मंत्री शिखरस्वामी की चाल से कायर रामगुप्त राजा बन जाता है और चंद्रगुप्त की वाग्दत्ता (भावी पत्नी) ध्रुवस्वामिनी से जबरन विवाह कर लेता है। जब शकराज गुप्त साम्राज्य को घेर लेता है, तो रामगुप्त अपनी जान बचाने के लिए अपनी पत्नी ध्रुवस्वामिनी को शकराज के शिविर में भेजने को तैयार हो जाता है। ध्रुवस्वामिनी आत्मसम्मान की रक्षा के लिए चंद्रगुप्त से सहायता मांगती है।
2. द्वितीय अंक: स्थान: शकराज का दुर्ग.
चंद्रगुप्त स्वयं ध्रुवस्वामिनी के छद्म वेश (स्त्री वेश) में ध्रुवस्वामिनी के साथ शकराज के शिविर में पहुँचता है। चंद्रगुप्त और शकराज के बीच द्वंद्व युद्ध होता है, जिसमें शकराज मारा जाता है और गुप्त सेना दुर्ग पर अधिकार कर लेती है।
3. तृतीय अंक: स्थान: शक-दुर्ग का भीतरी भाग.
विवाद का निपटारा होता है। धर्मशास्त्र का ज्ञाता ‘पुरोहित’ घोषणा करता है कि कायर, क्लीव और अपनी पत्नी को शत्रु को सौंपने वाले रामगुप्त का ध्रुवस्वामिनी पर कोई अधिकार नहीं रहा। पुरोहित विवाह-विच्छेद (मोक्ष) को न्यायसंगत ठहराता है। रामगुप्त पीछे से चंद्रगुप्त पर हमला करने की कोशिश करता है, पर एक सामंत कुमार द्वारा रामगुप्त मारा जाता है। प्रजा और सामंत चंद्रगुप्त को सम्राट और ध्रुवस्वामिनी को महादेवी स्वीकार करते हैं
प्रमुख उद्धरण/सूक्तियाँ:
“पुरुषों ने स्त्रियों को अपनी पशु-संपत्ति समझकर उन पर अत्याचार करने का अभ्यास कर लिया है, वह मेरी बात नहीं चल सकता।” — ध्रुवस्वामिनी
“विधान की इन सूखी हड्डियों को चबाने से कोई रस नहीं मिलता।” — मंदाकिनी
“जो स्त्री को अपनी जायदाद समझकर किसी दूसरे के हाथ बेचता है, वह पति कहलाने का अधिकारी नहीं।” — पुरोहित
“यस, नो, ऑल राइट!” — (पाश्चात्य प्रभाव दर्शाने के लिए शिखरस्वामी द्वारा प्रयुक्त संवाद)
प्रसाद के नाटकों में विशेषता: जयशंकर प्रसाद के अन्य नाटकों (जैसे ‘स्कंदगुप्त’, ‘चंद्रगुप्त’) के अंत दुखांत या प्रसादांत (मिश्रित) होते हैं, लेकिन ‘ध्रुवस्वामिनी’ पूर्णतः सुखांत (Happy Ending) नाटक है।
प्रमुख समस्याएँ:
नारियों का वस्तु की तरह क्रय-विक्रय व विनिमय का विरोध।
अनमेल विवाह और विवाह-विच्छेद (मोक्ष/तलाक) का अधिकार।
अयोग्य शासक का पतन और योग्य शासक का राज्यारोहण।
प्रसिद्ध गीत:“यह कसौटी है धीरज की, सह लो, सह लो…” (मंदाकिनी का गीत) और “अस्त ही हो जाएगा, तो क्या?…” (कोमा का विचार)।
ध्रुवस्वामिनी – जयशंकर प्रसाद JSSC Graduate Level Exams Paper -2 Hindi Notes