विद्युत तारों के बाहरी आवरण में रबर या प्लास्टिक का प्रयोग किया जाता है।
याद रखें: 👉 चालक → कम प्रतिरोध → धारा आसानी से प्रवाहित 👉 प्रतिरोधक → धारा का विरोध → धारा का प्रवाह नियंत्रित करने के लिए 👉 विद्युतरोधी → बहुत अधिक प्रतिरोध → धारा का प्रवाह नगण्य
श्रेणीक्रम संयोजन (Series Combination)
सभी प्रतिरोधों में समान धारा (Current) प्रवाहित होती है।
तुल्य प्रतिरोध:
R = R₁ + R₂ + R₃ + …
Series में तुल्य प्रतिरोध हमेशा सबसे बड़े प्रतिरोध से भी अधिक होता है।
यदि n समान प्रतिरोध R को Series में जोड़ा जाए:
Rₑq = nR
किसी एक प्रतिरोध के खराब होने पर पूरा परिपथ टूट जाता है।
समानांतर संयोजन (Parallel Combination)
सभी प्रतिरोधों के सिरों पर समान विभवांतर (Voltage) होता है।
तुल्य प्रतिरोध:
1/R = 1/R₁ + 1/R₂ + 1/R₃ + …
Parallel में तुल्य प्रतिरोध हमेशा सबसे छोटे प्रतिरोध से भी कम होता है।
दो प्रतिरोधों के लिए:
R = (R₁ × R₂) / (R₁ + R₂)
यदि n समान प्रतिरोध R को Parallel में जोड़ा जाए:
Rₑq = R/n
Parallel संयोजन में एक शाखा खराब होने पर अन्य शाखाएँ सामान्यतः कार्य करती रहती हैं।
Series → Current समान
Parallel → Voltage समान
Series → Resistance जुड़ते हैं
Parallel → Conductance जुड़ती है
समान दो प्रतिरोध R को Series में → 2R
समान दो प्रतिरोध R को Parallel में → R/2
घरेलू विद्युत उपकरणों को सामान्यतः Parallel में जोड़ा जाता है, ताकि प्रत्येक उपकरण को समान वोल्टेज मिले।
अवतल दर्पण | Concave Mirror
ध्रुव और वक्रता केंद्र के बीच की दूरी वक्रता त्रिज्या (\(R = 50\text{ cm}\)) है, जिससे फोकस दूरी \(f = \frac{R}{2} = 25\text{ cm}\) होगी।
अवतल दर्पण में जब आवर्धन \(m = -1\) होता है, तो इसका अर्थ है कि वस्तु को वक्रता केंद्र (\(C\)) पर रखा गया है। इस स्थिति में प्रतिबिंब भी वक्रता केंद्र पर ही बनता है, और बिंब दूरी तथा प्रतिबिंब दूरी दोनों दर्पण के सामने होने के कारण \(-\mathbf{50\text{ cm}}\) होती हैं।
अवतल दर्पण की परावर्तक सतह अंदर की ओर मुड़ी हुई होती है।
यह प्रकाश की समानांतर किरणों को एक बिंदु पर अभिसरित करता है, इसलिए इसे अभिसारी दर्पण (Converging Mirror) कहते हैं।
अवतल दर्पण का फोकस (F) दर्पण के सामने स्थित होता है।
फोकस दूरी (f) = वक्रता त्रिज्या (R) / 2
अर्थात R = 2f।
दर्पण के ध्रुव (P) और वक्रता केंद्र (C) के बीच की दूरी = R।
मुख्य अक्ष के समानांतर आने वाली किरण परावर्तन के बाद फोकस से होकर गुजरती है।
फोकस से होकर आने वाली किरण परावर्तन के बाद मुख्य अक्ष के समानांतर हो जाती है।
जब वस्तु C से बाहर हो → प्रतिबिंब C और F के बीच, वास्तविक, उल्टा और छोटा बनता है।
जब वस्तु C पर हो → प्रतिबिंब C पर, वास्तविक, उल्टा और समान आकार का बनता है।
जब वस्तु C और F के बीच हो → प्रतिबिंब C से बाहर, वास्तविक, उल्टा और बड़ा बनता है।
जब वस्तु F और P के बीच हो → प्रतिबिंब आभासी, सीधा और बड़ा बनता है।
अवतल दर्पण का उपयोग दंत चिकित्सक के दर्पण, टॉर्च, सर्चलाइट और वाहन की हेडलाइट में किया जाता है।
दर्पण सूत्र: 1/f = 1/v + 1/u।
आवर्धन: m = −v/u।
अम्ल | Acid | Acids
अम्ल (Acids) वे पदार्थ होते हैं जो जलीय विलयन में हाइड्रोजन आयन (\(\text{H}^+\)) या हाइड्रोनियम आयन (\(\text{H}_3\text{O}^+\)) मुक्त करते हैं। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (\(\text{HCl}\)) एक प्रबल अम्ल है। इसके विपरीत, सोडियम हाइड्रॉक्साइड (\(\text{NaOH}\)), अमोनियम हाइड्रॉक्साइड (\(\text{NH}_4\text{OH}\)) और कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड (\(\text{Ca(OH)}_2\)) क्षारक (Bases) हैं जो जलीय विलयन में \(\text{OH}^-\) आयन देते हैं।
अम्ल (Acid) वे पदार्थ हैं जो जलीय विलयन में H⁺ आयन प्रदान करते हैं।
अम्ल का pH मान 7 से कम होता है।
अम्ल का स्वाद सामान्यतः खट्टा होता है।
अम्ल नीले लिटमस पत्र को लाल कर देता है।
अम्ल क्षार (Base) के साथ अभिक्रिया करके लवण और जल बनाता है। इसे उदासीनीकरण अभिक्रिया कहते हैं।
अम्ल + धातु → लवण + हाइड्रोजन गैस।
अम्ल + धातु कार्बोनेट → लवण + जल + कार्बन डाइऑक्साइड।
अम्लों के जलीय विलयन विद्युत का चालन करते हैं।
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) — आमाशय में पाया जाता है।
सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) — बैटरी में उपयोग होता है।
नाइट्रिक अम्ल (HNO₃) — उर्वरक और विस्फोटक बनाने में उपयोग होता है।
एसिटिक अम्ल (CH₃COOH) — सिरके में पाया जाता है।
साइट्रिक अम्ल — नींबू और संतरे जैसे खट्टे फलों में पाया जाता है।
लैक्टिक अम्ल — दही और दूध में पाया जाता है।
टार्टरिक अम्ल — इमली और अंगूर में पाया जाता है।
फॉर्मिक अम्ल (HCOOH) — चींटी के डंक में पाया जाता है।
अम्लों की तीव्रता मुख्यतः उनके आयनन की मात्रा पर निर्भर करती है।
प्रबल अम्ल जल में लगभग पूर्णतः आयनित होते हैं, जैसे HCl और HNO₃।
पीतल | Brass
जल (\(\text{H}_2\text{O}\)) एक यौगिक है जो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के निश्चित अनुपात में रासायनिक संयोजन (अभिक्रिया) द्वारा बनता है।
पीतल (मिश्रधातु), वायु (गैसों का मिश्रण) और मृदाभौतिक मिश्रण हैं, जिनके निर्माण में कोई नई रासायनिक अभिक्रिया नहीं होती।
पीतल (Brass) एक मिश्रधातु (Alloy) है।
पीतल मुख्यतः ताँबा (Copper) + जस्ता (Zinc) से बनता है।
पीतल में सामान्यतः ताँबा अधिक और जस्ता कम मात्रा में होता है।
पीतल का रंग पीला/सुनहरा होता है।
यह तन्य (Ductile) और अपेक्षाकृत आसानी से ढाला जा सकने वाला पदार्थ है।
पीतल का उपयोग बर्तन, नल, सजावटी वस्तुएँ, संगीत वाद्ययंत्र और विद्युत उपकरणों के पुर्जों में किया जाता है।
पीतल ताँबे से अधिक कठोर होता है।
पीतल = Cu + Zn → यह तथ्य SSC CGL में महत्वपूर्ण है।
कांसा (Bronze) = Cu + Sn (टिन) — पीतल से भ्रमित न करें।
निलंबन | Suspension
निलंबन (Suspension) एक विषमांगी मिश्रण है जिसमें विलेय पदार्थ के कण घुलते नहीं हैं, बल्कि पूरे माध्यम में निलंबित रहते हैं। कणों का आकार बड़ा (> 100 nm) होने के कारण, मिश्रण को कुछ समय शांत छोड़ने पर वे गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे बैठ जाते हैं (अवक्षेपण)।
निलंबन (Suspension) एक विषमांगी मिश्रण (Heterogeneous Mixture) है।
इसमें किसी ठोस पदार्थ के अघुलनशील कण द्रव में फैले रहते हैं।
निलंबन के कणों का आकार सामान्यतः 1000 nm से अधिक होता है।
इसके कण नंगी आँखों से दिखाई दे सकते हैं।
निलंबन के कण कुछ समय बाद नीचे बैठ जाते हैं (अवसादन)।
निलंबन को छानने (Filtration) की विधि से अलग किया जा सकता है।
निलंबन प्रकाश की किरण को प्रकीर्णित कर सकता है।
निलंबन सामान्यतः अपारदर्शी (Opaque) दिखाई देता है।
निलंबन के कणों को अल्ट्राफिल्ट्रेशन जैसी साधारण विधियों से अलग किया जा सकता है।
उदाहरण: कीचड़युक्त जल, चॉक पाउडर + जल, रेत + जल।
निलंबन के कण → बड़े और अघुलनशील होते हैं।
निलंबन ≠ विलयन: विलयन में विलेय के कण बहुत छोटे होते हैं और नीचे नहीं बैठते।
न्यूरॉन | neuron
न्यूरॉन (तंत्रिका कोशिका) के मुख्य भाग:
– डेंड्राइट (Dendrite): सूचनाएं प्राप्त करते हैं।
– साइटोन / कोशिका-काय (Cell Body): संकेतों को संसाधित करता है।
– एक्सॉन / तंत्रिकाक्ष (Axon): यह एक लंबा बेलनाकार रेशा होता है जो विद्युत आवेगों/संकेतों को कोशिका-काय से दूर अन्य न्यूरॉन्स या अंगों तक ले जाता है।
न्यूरॉन (Neuron) तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है।
न्यूरॉन के मुख्य भाग:
कोशिका काय / साइटॉन (Cell Body / Cyton)
डेंड्राइट (Dendrite)
ऐक्सॉन (Axon)
कोशिका काय (Cyton): इसमें केंद्रक (Nucleus) और कोशिकाद्रव्य पाया जाता है।
डेंड्राइट: ये छोटे, शाखित प्रवर्ध होते हैं जो तंत्रिका आवेग को ग्रहण करते हैं।
ऐक्सॉन: यह लंबा प्रवर्ध है जो तंत्रिका आवेग को कोशिका काय से दूर ले जाता है।
माइलिन शीथ (Myelin Sheath): ऐक्सॉन के चारों ओर पाई जाने वाली सुरक्षात्मक परत है।
श्वान कोशिकाएँ (Schwann Cells): परिधीय तंत्रिका तंत्र में माइलिन शीथ बनाने में सहायता करती हैं।
रैन्वियर की गांठें (Nodes of Ranvier): माइलिन शीथ के बीच के छोटे अंतराल हैं।
तंत्रिका आवेग सामान्यतः डेंड्राइट → कोशिका काय → ऐक्सॉन की दिशा में जाता है।
दो न्यूरॉनों के बीच का संपर्क स्थान सिनेप्स (Synapse) कहलाता है।
बीजाणु | spores
मॉस (ब्रायोफाइटा) और फ़र्न (टेरिडोफाइटा) ऐसे पौधे हैं जिनमें फूल या बीज नहीं होते। ये पौधे जनन के लिए बीजाणुओं (Spores) का उत्पादन करते हैं। जबकि चना, बैंगन और गुलाब आवृतबीजी (Angiosperm) पौधे हैं जो बीजों के माध्यम से प्रजनन करते हैं।
बीजाणुओं के माध्यम से प्रजनन (Spore Formation) – बीजाणु द्वारा प्रजनन एक प्रकार का अलैंगिक प्रजनन (Asexual Reproduction) है।
इसमें नए जीव का निर्माण बीजाणुओं (Spores) से होता है।
बीजाणु सामान्यतः बीजाणुधानी (Spore Sac / Sporangium) में बनते हैं।
बीजाणु बहुत छोटे और हल्के होते हैं, इसलिए इन्हें हवा द्वारा आसानी से फैलाया जा सकता है।
अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर बीजाणु अंकुरित होकर नया जीव बनाते हैं।
बीजाणु बनाने वाले जीवों में फफूंद (Fungi) प्रमुख हैं।
राइजोपस (Rhizopus) में बीजाणुओं द्वारा प्रजनन होता है।
राइजोपस में बीजाणु बीजाणुधानी (Sporangium) के अंदर बनते हैं।
बीजाणु का निर्माण तेजी से और बड़ी संख्या में हो सकता है।
यह प्रजनन विधि विशेष रूप से अनुकूल परिस्थितियों में तेजी से फैलने में सहायक होती है।
उदाहरण: राइजोपस (ब्रेड मोल्ड), म्यूकर (Mucor) और कुछ अन्य कवक।
त्वरण | acceleration
वेग-समय (\(v-t\)) ग्राफ की प्रवणता (Slope) त्वरण (\(a\)) को दर्शाती है। यदि प्रवणता सीधी रेखा न होकर बदलती (वक्र) रहती है, तो इसका मतलब है कि प्रति इकाई समय में वेग परिवर्तन समान नहीं है, अर्थात त्वरण असमान (Non-uniform acceleration) है।
v–t ग्राफ में Y-अक्ष पर वेग (Velocity) और X-अक्ष पर समय (Time) होता है।
v–t ग्राफ की ढाल (Slope) = त्वरण (Acceleration)।
ढाल = 0 → वस्तु का वेग स्थिर है।
धनात्मक ढाल → धनात्मक त्वरण।
ऋणात्मक ढाल → मंदन/ऋणात्मक त्वरण।
v–t ग्राफ और समय-अक्ष के बीच का क्षेत्रफल = विस्थापन (Displacement)।
आयताकार क्षेत्रफल → समान वेग से तय किया गया विस्थापन।
त्रिभुजाकार क्षेत्रफल → परिवर्ती वेग से विस्थापन निकालने में उपयोगी।
यदि ग्राफ समय-अक्ष के ऊपर है → वेग धनात्मक।
यदि ग्राफ समय-अक्ष के नीचे है → वेग ऋणात्मक।
v–t ग्राफ समय-अक्ष को काटता है → उस क्षण वेग = 0।
वेग–समय ग्राफ की ढाल का SI मात्रक = m/s²।
वेग–समय ग्राफ के नीचे क्षेत्रफल का SI मात्रक = m।
समान त्वरण वाली गति में v–t ग्राफ सीधी रेखा होता है।
असमान त्वरण में v–t ग्राफ वक्र (Curve) हो सकता है।
विशेष तथ्य: v–t ग्राफ की ढाल से त्वरण, जबकि ग्राफ के नीचे क्षेत्रफल से विस्थापन ज्ञात होता है।
प्रकाश संश्लेषण | Photosynthesis
प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की रासायनिक प्रक्रिया:
\(6\text{CO}_2 + 6\text{H}_2\text{O} \xrightarrow[\text{क्लोरोफिल}]{\text{सूर्य प्रकाश}} \text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 + 6\text{O}_2\)
इस प्रक्रिया के लिए मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड, जल, सूर्य का प्रकाश और पर्णहरित (क्लोरोफिल) आवश्यक होते हैं।
प्रकाश संश्लेषण वह प्रक्रिया है जिसमें हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में CO₂ और जल से भोजन (ग्लूकोज) बनाते हैं।
प्रकाश संश्लेषण मुख्यतः पत्तियों के क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast) में होता है।
प्रकाश संश्लेषण के लिए मुख्य वर्णक क्लोरोफिल (Chlorophyll) है।
क्लोरोफिल मुख्यतः क्लोरोप्लास्ट की ग्राना (Grana) में पाया जाता है।
प्रकाश संश्लेषण में वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) ग्रहण की जाती है।
जल का अवशोषण पौधों की जड़ों द्वारा होता है।
प्रकाश संश्लेषण के दौरान ऑक्सीजन (O₂) उप-उत्पाद के रूप में निकलती है।
पौधों में गैसों का आदान-प्रदान मुख्यतः रंध्र (Stomata) द्वारा होता है।
प्रकाश संश्लेषण का मुख्य उत्पाद ग्लूकोज (Glucose) है, जिसे पौधा आगे स्टार्च (Starch) के रूप में संचित कर सकता है।
प्रकाश अभिक्रिया (Light Reaction) मुख्यतः ग्राना में होती है।
अंधकार अभिक्रिया (Dark Reaction/Calvin Cycle) मुख्यतः स्ट्रोमा (Stroma) में होती है।
प्रकाश अभिक्रिया में ATP और NADPH का निर्माण होता है।
कैल्विन चक्र में CO₂ का स्थिरीकरण (Carbon Fixation) होता है।
प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक प्रमुख कारक: प्रकाश, CO₂, जल और क्लोरोफिल।
प्रकाश की तीव्रता बढ़ाने पर एक सीमा तक प्रकाश संश्लेषण की दर बढ़ती है।
CO₂ की उपलब्धता बढ़ने पर एक सीमा तक प्रकाश संश्लेषण की दर बढ़ती है।
तापमान प्रकाश संश्लेषण की दर को प्रभावित करता है।
प्रकाश संश्लेषण में निकलने वाली ऑक्सीजन का स्रोत मुख्यतः जल (H₂O) है।
प्रकाश संश्लेषण पृथ्वी पर भोजन और ऑक्सीजन का प्रमुख प्राकृतिक स्रोत है।
C₃ पौधों में CO₂ स्थिरीकरण का पहला स्थायी उत्पाद 3-फॉस्फोग्लिसेरिक अम्ल (3-PGA) होता है।
C₄ पौधों में CO₂ स्थिरीकरण का पहला स्थायी उत्पाद ऑक्सालोएसिटिक अम्ल (OAA) होता है।
मक्का (Maize), गन्ना (Sugarcane) आदि C₄ पौधों के उदाहरण हैं।
गेहूँ, चावल और आलू सामान्यतः C₃ पौधों के उदाहरण हैं।
प्रकाश संश्लेषण का संतुलित समीकरण: 6CO₂ + 6H₂O → C₆H₁₂O₆ + 6O₂ (प्रकाश और क्लोरोफिल की उपस्थिति में)
स्थान: क्लोरोप्लास्ट
मुख्य वर्णक: क्लोरोफिल
CO₂ का प्रवेश: रंध्र
O₂ का स्रोत: जल
मुख्य भोजन: ग्लूकोज
प्रकाश अभिक्रिया: ग्राना
कैल्विन चक्र: स्ट्रोमा
C₄ पौधे: मक्का, गन्ना
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल
जब कोई सक्रिय धातु (जैसे मैग्नीशियम) तनु अम्ल के साथ अभिक्रिया करती है, तो संगत धातु लवण और हाइड्रोजन गैस बनती है:
\(\text{Mg (s)} + 2\text{HCl (aq)} \rightarrow \text{MgCl}_2\text{ (aq)} + \text{H}_2\text{ (g)}\)
पेशीय ऊतक | Muscular Tissue
पेशीय ऊतकों में गति या संचलन विशेष प्रकार के संकुचनशील प्रोटीनों (Contractile proteins) जैसे कि एक्टिन (Actin) और मायोसिन (Myosin) की उपस्थिति और उनकी परस्पर क्रिया के कारण संभव होता है।
पेशीय ऊतक (Muscular Tissue) शरीर में संचलन (Movement) के लिए उत्तरदायी होता है।
पेशीय ऊतक की कोशिकाएँ पेशी तंतु (Muscle Fibres) कहलाती हैं।
पेशियों में संकुचन (Contraction) और शिथिलन (Relaxation) की क्षमता होती है।
शरीर की गति मुख्यतः पेशियों के संकुचन और शिथिलन के कारण होती है।
पेशीय ऊतक के 3 प्रमुख प्रकार हैं:
रेखित/कंकालीय पेशी (Striated/Skeletal Muscle)
अरेखित/चिकनी पेशी (Unstriated/Smooth Muscle)
हृदय पेशी (Cardiac Muscle)
कंकालीय पेशी: हड्डियों से जुड़ी होती है और ऐच्छिक (Voluntary) गति कराती है।
चिकनी पेशी: आंत, पेट, रक्त वाहिकाओं आदि की दीवारों में पाई जाती है और अनैच्छिक (Involuntary) होती है।
हृदय पेशी: केवल हृदय में पाई जाती है और इसकी क्रिया अनैच्छिक होती है।
कंकालीय पेशियों में स्पष्ट धारियाँ (Striations) दिखाई देती हैं।
चिकनी पेशियों में धारियाँ नहीं होतीं।
हृदय पेशियों में धारियाँ होती हैं तथा इनमें शाखित तंतु और इंटरकलेटेड डिस्क पाए जाते हैं।
पेशियों का संकुचन मुख्यतः एक्टिन (Actin) और मायोसिन (Myosin) प्रोटीन के परस्पर खिसकने से होता है।
पेशीय संकुचन के लिए ऊर्जा मुख्यतः ATP से प्राप्त होती है।
मायोग्लोबिन (Myoglobin) पेशियों में ऑक्सीजन के भंडारण में सहायता करता है।
अलैंगिक जनन | Asexual reproduction
अलैंगिक जनन (Asexual reproduction) में युग्मकों (Gametes) का निर्माण या संलयन नहीं होता है, और इसमें केवल एक ही जनक जीव भाग लेता है (जैसे कायिक प्रवर्धन, मुकुलन, बीजाणु निर्माण)।
अलैंगिक जनन में केवल एक जनक (Parent) की आवश्यकता होती है।
इसमें नर और मादा युग्मक (Gametes) का निर्माण या संलयन नहीं होता।
इस प्रकार के जनन में संतति सामान्यतः जनक के आनुवंशिक रूप से समान (Clone) होती है।
अलैंगिक जनन मुख्यतः एककोशिकीय जीवों तथा कुछ बहुकोशिकीय जीवों में पाया जाता है।
इसमें जनन की प्रक्रिया सामान्यतः तेज होती है।
अलैंगिक जनन के प्रमुख प्रकार:
द्विखंडन (Binary Fission) — अमीबा, पैरामीशियम
बहुखंडन (Multiple Fission) — प्लाज्मोडियम
मुकुलन (Budding) — यीस्ट, हाइड्रा
खंडन (Fragmentation) — स्पाइरोगाइरा
बीजाणु निर्माण (Spore Formation) — राइजोपस
वानस्पतिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) — पौधों में
अमीबा में अलैंगिक जनन द्विखंडन द्वारा होता है।
यीस्ट में अलैंगिक जनन मुख्यतः मुकुलन द्वारा होता है।
हाइड्रा में अलैंगिक जनन मुकुलन द्वारा होता है।
स्पाइरोगाइरा में खंडन द्वारा नए जीव बनते हैं।
राइजोपस (ब्रेड मोल्ड) में बीजाणु निर्माण द्वारा जनन होता है।
आलू में वानस्पतिक प्रवर्धन तने (Stem) द्वारा होता है।
ब्रायोफिलम में वानस्पतिक प्रवर्धन पत्ती (Leaf) द्वारा होता है।
गन्ना में वानस्पतिक प्रवर्धन तने द्वारा होता है।
अलैंगिक जनन में आनुवंशिक विविधता (Genetic Variation) बहुत कम होती है।
अनुकूल परिस्थितियों में अलैंगिक जनन तेजी से संख्या बढ़ाने में सहायक होता है।
कलम, लेयरिंग और ग्राफ्टिंग कृत्रिम वानस्पतिक प्रवर्धन की विधियाँ हैं।
धातुकर्म | Metallurgy
धातुकर्म (Metallurgy) विज्ञान और इंजीनियरिंग की वह शाखा है जिसमें खनिजों या अयस्कों से धातुओं को उनके शुद्ध, उपयोगी रूप में निष्कर्षण, परिष्करण और मिश्रधातु बनाने की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है।
धातुकर्म (Metallurgy) — अयस्कों से धातुओं के निष्कर्षण, शोधन और उपयोग का विज्ञान।
खनिज (Mineral) — प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले धातु या उसके यौगिक।
अयस्क (Ore) — ऐसा खनिज जिससे धातु का आर्थिक रूप से निष्कर्षण किया जा सके।
गैंग/अशुद्धियाँ (Gangue) — अयस्क में उपस्थित अवांछित पदार्थ।
अयस्क का सांद्रण (Concentration) — अयस्क से गैंग को हटाने की प्रक्रिया।
भर्जन (Roasting) — सल्फाइड अयस्क को वायु की अधिकता में गर्म करने की प्रक्रिया।
निस्तापन (Calcination) — कार्बोनेट या हाइड्रॉक्साइड अयस्क को सीमित या बिना वायु के गर्म करना।
अपचयन (Reduction) — धातु के यौगिक से ऑक्सीजन आदि को हटाकर धातु प्राप्त करना।
गलन (Smelting) — उच्च ताप पर अयस्क/सांद्रित अयस्क को अपचायक के साथ गर्म करके धातु निकालना।
फ्लक्स (Flux) — गैंग के साथ अभिक्रिया करके स्लैग बनाने वाला पदार्थ।
स्लैग (Slag) — फ्लक्स और गैंग की अभिक्रिया से बनने वाला पदार्थ।
लोहे का प्रमुख अयस्क — हेमेटाइट (Fe₂O₃)।
लोहे का एक अन्य महत्वपूर्ण अयस्क — मैग्नेटाइट (Fe₃O₄)।
एल्युमिनियम का प्रमुख अयस्क — बॉक्साइट।
एल्युमिनियम का निष्कर्षण — विद्युत अपघटन (Electrolysis) द्वारा किया जाता है।
तांबे का प्रमुख अयस्क — कॉपर पाइराइट (CuFeS₂)।
जस्ता का प्रमुख अयस्क — जिंक ब्लेंड/स्फैलेराइट (ZnS)।
सीसे का प्रमुख अयस्क — गैलेना (PbS)।
पारे का प्रमुख अयस्क — सिनेबार (HgS)।
चाँदी का प्रमुख अयस्क — अर्जेन्टाइट (Ag₂S)।
सोने और चाँदी के निष्कर्षण में — सायनाइड प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है।
सल्फाइड अयस्कों के सांद्रण में — फेन प्लवन विधि (Froth Flotation) उपयोगी है।
ऑक्साइड अयस्कों के सांद्रण में — प्रायः गुरुत्वीय पृथक्करण जैसी विधियाँ उपयोग की जाती हैं।
अत्यधिक क्रियाशील धातुएँ जैसे Na, K, Ca, Mg, Al — सामान्यतः विद्युत अपघटन द्वारा प्राप्त की जाती हैं।
मध्यम क्रियाशील धातुएँ जैसे Zn, Fe, Pb — इनके अयस्कों को गर्म करके और उपयुक्त अपचायक से धातु प्राप्त की जाती है।
कम क्रियाशील धातुएँ जैसे Cu, Hg, Ag, Au — अपेक्षाकृत सरल विधियों से प्राप्त की जा सकती हैं।
थर्माइट अभिक्रिया में एल्युमिनियम पाउडर अपचायक के रूप में कार्य करता है।
थर्माइट अभिक्रिया का उपयोग लोहे की पटरियों की वेल्डिंग में किया जाता है।
विद्युत शोधन (Electrolytic Refining) में अशुद्ध धातु को सामान्यतः एनोड बनाया जाता है।
विद्युत शोधन में शुद्ध धातु कैथोड पर जमा होती है।
कॉपर के विद्युत शोधन में एनोड अशुद्ध तांबा और कैथोड शुद्ध तांबे की पतली पट्टी होती है।
विद्युत शोधन के दौरान नीचे बैठने वाली अशुद्धियों को एनोड मड (Anode Mud) कहते हैं।
24 कैरेट सोना लगभग शुद्ध सोना माना जाता है।
स्टील मुख्यतः लोहे और कार्बन का मिश्रधातु है।
स्टेनलेस स्टील में मुख्यतः Fe, Cr और Ni होते हैं।
पीतल (Brass) = तांबा + जस्ता।
कांसा (Bronze) = तांबा + टिन।
सोल्डर (Solder) = सीसा + टिन।
ड्यूरालुमिन (Duralumin) में मुख्य धातु एल्युमिनियम है तथा इसमें Cu, Mg और Mn आदि होते हैं।
जर्मन सिल्वर में चाँदी नहीं होती; यह मुख्यतः Cu + Zn + Ni की मिश्रधातु है।
धातुओं की क्रियाशीलता श्रेणी धातु के निष्कर्षण की विधि निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होती है।
समजातीय श्रेणी | Homologous series
कार्बनिक यौगिकों की किसी समजातीय श्रेणी (Homologous series) में दो क्रमिक सदस्यों के बीच हमेशा एक \(-CH_2-\) (मेथिलीन) समूह का अंतर होता है। कार्बन का परमाणु द्रव्यमान 12 u और हाइड्रोजन का 1 u होता है, अतः \(-CH_2-\) का द्रव्यमान \(12 + (2 \times 1) = \mathbf{14\text{ u}}\) होता है।
समजातीय श्रेणी ऐसे कार्बनिक यौगिकों का समूह है जिनका सामान्य रासायनिक सूत्र समान होता है।
श्रेणी के क्रमिक सदस्यों में –CH₂– का अंतर होता है।
दो क्रमिक सदस्यों के आणविक द्रव्यमान में 14 u का अंतर होता है।
समजातीय श्रेणी के सभी सदस्यों में समान क्रियात्मक समूह (Functional Group) पाया जाता है।
इनके रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं।
इनके भौतिक गुण क्रमशः बदलते हैं, जैसे क्वथनांक और गलनांक।
समजातीय श्रेणी के सदस्यों के रासायनिक गुणों में क्रमिक परिवर्तन देखा जाता है।
उदाहरण: एल्केन (Alkanes) की समजातीय श्रेणी का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₊₂ है।
एल्केन के क्रमिक सदस्य: CH₄, C₂H₆, C₃H₈, C₄H₁₀ आदि।
CH₄ और C₂H₆ के बीच अंतर = CH₂।
C₂H₆ और C₃H₈ के बीच अंतर = CH₂।
समजातीय श्रेणी में सदस्यों की कार्बन श्रृंखला क्रमशः बढ़ती जाती है।
क्रियात्मक समूह समान होने के कारण इनकी अभिक्रियाएँ सामान्यतः समान प्रकार की होती हैं।
SSC CGL में याद रखें: समान Functional Group + समान General Formula + क्रमिक सदस्यों में CH₂ का अंतर = समजातीय श्रेणी।
दूरी | distance
न्यूटन के सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम के अनुसार, गुरुत्वाकर्षण बल \(F = G \frac{m_1 m_2}{d^2}\) होता है, यानी \(F \propto \frac{1}{d^2}\)। दूरी (\(d\)) घटने पर बल \(F\) व्युत्क्रمانुपाती संबंध के कारण तेजी से बढ़ेगा।
पृथ्वी और चंद्रमा के बीच औसत दूरी = लगभग 3,84,400 km।
पृथ्वी और चंद्रमा की दूरी स्थिर नहीं रहती, क्योंकि चंद्रमा की कक्षा अंडाकार (Elliptical) है।
न्यूनतम दूरी (Perigee) = लगभग 3,63,300 km।
अधिकतम दूरी (Apogee) = लगभग 4,05,500 km।
चंद्रमा से पृथ्वी तक प्रकाश को आने में लगभग 1.28 सेकंड लगते हैं।
खेती | Farming
अंतरा सस्यन (Intercropping) में दो या दो से अधिक फसलों को एक ही खेत में एक निश्चित पाटन (जैसे कतारों के क्रम में) में उगाया जाता है, ताकि संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो सके और कीटों/रोगों से सुरक्षा मिले।
सीढ़ीनुमा खेती (Terrace Farming)
पहाड़ी एवं ढालदार क्षेत्रों में की जाती है।
ढलानों को सीढ़ीनुमा खेतों में बदलकर खेती की जाती है।
मृदा अपरदन (Soil Erosion) और जल के तेज बहाव को कम करती है।
भारत में हिमालयी क्षेत्रों में प्रचलित है।
शस्य आवर्तन (Crop Rotation)
एक ही खेत में अलग-अलग मौसम में विभिन्न फसलों को क्रम से उगाना।
मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायक।
दलहनी फसलें नाइट्रोजन स्थिरीकरण के कारण मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाने में सहायक होती हैं।
कीट एवं रोगों के प्रकोप को कम करने में मदद करता है।
मिश्रित सस्यन (Mixed Cropping)
एक ही खेत में दो या दो से अधिक फसलों को एक साथ उगाना।
मुख्य उद्देश्य फसल विफलता के जोखिम को कम करना है।
उदाहरण: गेहूँ + चना, गेहूँ + सरसों।
इसमें फसलों की निश्चित कतार व्यवस्था आवश्यक नहीं होती।
अंतरा सस्यन (Intercropping)
एक ही खेत में दो या दो से अधिक फसलों को निश्चित कतारों के पैटर्न में उगाया जाता है।
फसलों की कतारें एक निश्चित अनुपात/व्यवस्था में होती हैं।
भूमि, जल, पोषक तत्व और सूर्य के प्रकाश का अधिक कुशल उपयोग होता है।
उदाहरण: सोयाबीन + मक्का, बाजरा + लोबिया।
मुख्य अंतर: मिश्रित सस्यन में निश्चित कतार व्यवस्था नहीं होती, जबकि अंतरा सस्यन में निश्चित कतार व्यवस्था होती है।
डेन्ड्राइट | Dendrite
डेंड्राइट्स (Dendrites) न्यूरॉन का वह वृक्षवत हिस्सा है जो अन्य कोशिकाओं या संवेदी अंगों से रासायनिक/विद्युत सिग्नल प्राप्त करता है। यदि ये काम करना बंद कर दें, तो न्यूरॉन को बाहरी वातावरण या अन्य न्यूरॉन्स से संदेश प्राप्त नहीं हो पाएंगे।
डेंड्राइट न्यूरॉन की शाखित (branched) संरचनाएँ होती हैं।
इनका मुख्य कार्य अन्य न्यूरॉन्स या रिसेप्टर्स से तंत्रिका संकेत (nerve impulses) प्राप्त करना है।
डेंड्राइट प्राप्त संकेतों को कोशिका शरीर (Cell body/Cyton) की ओर ले जाते हैं।
ये सामान्यतः छोटे और अत्यधिक शाखित होते हैं।
डेंड्राइट की सतह पर डेंड्राइटिक स्पाइन (Dendritic spines) पाए जा सकते हैं, जो संकेत प्राप्त करने में महत्वपूर्ण हैं।
डेंड्राइट में सामान्यतः माइलिन आवरण (Myelin sheath) नहीं पाया जाता है।
डेंड्राइट की संख्या न्यूरॉन के प्रकार के अनुसार एक या अनेक हो सकती है।
डेंड्राइट और एक्सॉन (Axon) में मुख्य अंतर यह है कि डेंड्राइट सामान्यतः संकेत ग्रहण करते हैं, जबकि एक्सॉन संकेत को आगे ले जाता है।
डेंड्राइट, न्यूरॉन के सेल बॉडी के पास स्थित होते हैं।
न्यूरॉन का वह भाग जो मुख्य रूप से तंत्रिका आवेग प्राप्त करता है → डेंड्राइट।
सगर्भता | Pregnancy
मासिक धर्म चक्र (Menstrual Cycle) के दौरान गर्भाशय की दीवार (Endometrium) निषेचित अंडे (भ्रूण) को ग्रहण करने और उसके विकास के लिए आवश्यक पोषण, रक्त और आवरण प्रदान करने हेतु मोटी और स्पंजी बनती है। यदि निषेचन नहीं होता है, तो यह परत टूटकर बाहर निकल जाती है।
सगर्भता (Pregnancy) वह अवस्था है जिसमें महिला के गर्भाशय में भ्रूण (Embryo/Fetus) का विकास होता है।
मानव में निषेचन (Fertilization) सामान्यतः फैलोपियन ट्यूब (Fallopian Tube) में होता है।
निषेचन के बाद बनने वाली पहली कोशिका को युग्मनज (Zygote) कहते हैं।
युग्मनज लगातार विभाजित होकर भ्रूण (Embryo) का निर्माण करता है।
भ्रूण का गर्भाशय की दीवार में स्थापित होना आरोपण (Implantation) कहलाता है।
भ्रूण को पोषण और ऑक्सीजन अपरा (Placenta) के माध्यम से प्राप्त होती है।
अपरा (Placenta) माँ और भ्रूण के बीच पदार्थों के आदान-प्रदान का कार्य करती है।
नाल (Umbilical Cord) भ्रूण को अपरा से जोड़ती है।
गर्भावस्था की सामान्य अवधि लगभग 280 दिन या 40 सप्ताह होती है।
मानव में गर्भावस्था की औसत अवधि लगभग 9 महीने मानी जाती है।
भ्रूण को बाहरी आघात से सुरक्षा मुख्यतः एम्नियोटिक द्रव (Amniotic Fluid) प्रदान करता है।
एम्नियोटिक थैली (Amniotic Sac) भ्रूण को घेरकर रखती है।
गर्भावस्था के दौरान प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) हार्मोन गर्भाशय की आंतरिक परत को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
hCG (Human Chorionic Gonadotropin) हार्मोन का उपयोग गर्भावस्था परीक्षण में किया जाता है।
एस्ट्रोजन (Estrogen) और प्रोजेस्टेरोन गर्भावस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण हार्मोन हैं।
भ्रूण के विकास के लिए माँ से ऑक्सीजन और पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं।
भ्रूण का कार्बन डाइऑक्साइड और अपशिष्ट पदार्थ अपरा के माध्यम से माँ के रक्त में पहुँचते हैं।
सामान्यतः गर्भावस्था के दौरान मासिक धर्म (Menstruation) बंद हो जाता है।
प्रसव (Parturition) के समय गर्भाशय की मांसपेशियों के संकुचन में ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) हार्मोन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ऑक्सीटोसिन दूध के निष्कासन (Milk Ejection) में भी भूमिका निभाता है।
प्रसव के बाद प्रोलैक्टिन (Prolactin) हार्मोन दूध के निर्माण में महत्वपूर्ण है।
एल्केन | alkane
एल्केन और क्लोरीन (Halogenation) की प्रतिस्थापन अभिक्रिया (Substitution reaction) कमरे के तापमान पर अंधेरे में नहीं होती। यह अभिक्रिया अत्यधिक तीव्र या विस्फोटक रूप से केवल सूर्य के प्रकाश (पराबैंगनी प्रकाश) की उपस्थिति में मुक्त मूलक तंत्र के माध्यम से संपन्न होती है।
क्लोरीन + एल्केन (Alkane) → प्रकाश की उपस्थिति में प्रतिस्थापन अभिक्रिया
आवश्यक स्थिति → सूर्य का प्रकाश (UV प्रकाश)
उदाहरण: CH₄ + Cl₂ → CH₃Cl + HCl (सूर्य के प्रकाश में)
प्रतिस्थापन अभिक्रिया (Substitution Reaction) – वह रासायनिक अभिक्रिया जिसमें किसी यौगिक के एक परमाणु या समूह को किसी अन्य परमाणु या समूह द्वारा विस्थापित/प्रतिस्थापित किया जाता है।
इसका सामान्य रूप: A–B + C → A–C + B
यह अभिक्रिया मुख्यतः संतृप्त हाइड्रोकार्बन (Alkanes) में देखी जाती है।
एल्केन (Alkane) में हाइड्रोजन परमाणु को हैलोजन द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है।
उदाहरण: CH₄ + Cl₂ → CH₃Cl + HCl
मीथेन और क्लोरीन की अभिक्रिया सूर्य के प्रकाश/UV प्रकाश की उपस्थिति में होती है।
यह अभिक्रिया मुक्त मूलक (Free Radical) श्रृंखला अभिक्रिया के रूप में होती है।
मीथेन के क्लोरीनीकरण में क्रमशः CH₃Cl, CH₂Cl₂, CHCl₃ और CCl₄ बन सकते हैं।
CH₃Cl = क्लोरोमीथेन (Methyl chloride)
CH₂Cl₂ = डाइक्लोरोमीथेन (Methylene chloride)
CHCl₃ = क्लोरोफॉर्म (Chloroform)
CCl₄ = कार्बन टेट्राक्लोराइड (Carbon tetrachloride)
एल्केन + हैलोजन → हैलोएल्केन + हाइड्रोजन हैलाइड — प्रतिस्थापन अभिक्रिया का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
एल्कीन (Alkene) में सामान्यतः हैलोजन योग अभिक्रिया (Addition Reaction) करता है, न कि प्रतिस्थापन अभिक्रिया।
बेंजीन (Benzene) में मुख्यतः विद्युतरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया (Electrophilic Substitution) होती है।
स्टेथोस्कोप ध्वनि के बार-बार परावर्तन (Multiple Reflection of Sound) के सिद्धांत पर काम करता है। हृदय की धड़कन की ध्वनि चेस्ट-पीस से नली के भीतर दीवारों से लगातार परावर्तित होते हुए डॉक्टर के कानों तक संकेंद्रित होकर पहुँचती है, जिससे आवाज़ स्पष्ट सुनाई देती है।
स्टेथोस्कोप (Stethoscope) — स्टेथोस्कोप एक चिकित्सीय उपकरण है, जिसका उपयोग शरीर के अंदर उत्पन्न ध्वनियों को सुनने के लिए किया जाता है।
इसका उपयोग मुख्यतः हृदय, फेफड़ों और रक्त प्रवाह की ध्वनियाँ सुनने के लिए किया जाता है।
स्टेथोस्कोप का आविष्कार रेने लाएनेक (René Laennec) ने 1816 में किया था।
रेने लाएनेक एक फ्रांसीसी चिकित्सक थे।
प्रारंभिक स्टेथोस्कोप लकड़ी की बनी एकल नली के रूप में था।
आधुनिक स्टेथोस्कोप में सामान्यतः चेस्टपीस, रबर ट्यूब और ईयरपीस होते हैं।
स्टेथोस्कोप मुख्यतः ध्वनि के संचरण और प्रवर्धन (amplification) के सिद्धांत पर कार्य करता है।
हृदय की ध्वनियों को सुनने की प्रक्रिया को ऑस्कल्टेशन (Auscultation) कहा जाता है।
स्टेथोस्कोप से रक्तचाप मापते समय कोरोटकॉफ ध्वनियाँ सुनी जाती हैं।
स्टेथोस्कोप का उपयोग सांस की असामान्य ध्वनियों जैसे wheezing और crackles की पहचान में भी किया जाता है।
SSC CGL तथ्य: स्टेथोस्कोप का आविष्कार → रेने लाएनेक, 1816।