Updated on 04/05/26 by Mananjay MahatoShare on WhatsApp

झारखण्ड में वहाबी आंदोलन 

  • झारखण्ड में वहाबी आंदोलन का प्रसार – शाह मोहम्मद हुसैन ने
    • राजमहल में वहाबी आंदोलन की शाखा खोली गयी थी। 
  •  संथाल परगना क्षेत्र में पीर हुसैन ने वहाबी आंदोलन का प्रचार-प्रसार किया। 
  • पाकुड़ क्षेत्र के इब्राहिम मंडल को वहाबी आंदोलन के दौरान आजीवन कारावास की सजा दी गयी थी।

झारखण्ड में उग्र राष्ट्रीयता का प्रसार 

देवघर

  • उग्र राष्ट्रवाद के दौर में झारखण्ड में क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र – देवघर
    • देवघर में ‘शीलेर बाड़ी’ मकान में 1908 के अलीपुर बम कांड से जुड़े कई बंगाली क्रांतिकारी छुपकर रहते थे
    • इस मकान का प्रयोग बन बनाने एवं प्रशिक्षण हेतु किया जाता था।
    • 1915 ई. में देवघर के ‘शीलेर बाड़ी’ नामक मकान से बम बनाने की सामग्रियां प्राप्त की गयी थी। 
  • वारीन्द्र कुमार घोष द्वारा देवघर में स्वर्ण संघ (गोल्डन लीग) का गठन किया गया था।
  • देवघर में स्थित मित्रा उच्च विद्यालय के प्राचार्य शांति कुमार बख्शी द्वारा युवाओं को क्रांतिकारी प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था।
  • वर्ष 1927 ई. में देवघर षड़यंत्र केस में वीरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य के घर छापा मारकर हथियार तथा क्रांतिकारी साहित्य बरामद किया गया था।
    • देवघर षड्यंत्र केस में 20 व्यक्तियों की गिरफ्तारी
      • वीरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य, सुरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य तथा तेजेश चंद्र घोष आदि
  • दुमका के प्रभुदयाल हिम्मद सिंह एवं बैद्यनाथ विश्वास को ‘रोड्डा आर्म्स  केस’  में अभियुक्त बनाया गया था।
    • यह कलकत्ता के रोड्डा एंड कंपनी नामक बंदूक निर्माण कंपनी की दुकान से माउजर पिस्तौल की चोरी से संबंधित मामला था।

राँची

  • राँची में क्रांतिकारियों का नेतृत्व – गणेश चंद्र घोष ने
  • हावड़ा के बेलूर मठ के शचिन्द्र कुमार सेन डोरंडा आकर अपने पिता के पास ठहरे थे।
  • नवंबर 1913 में हेमंत कुमार बोस (अंग्रेजों के संदिग्ध) राँची आकर पी. एन. बोस के घर रूके थे।

हजारीबाग 

  • निर्मल बनर्जी ने 1913 ई. में हजारीबाग जिले के गिरिडीह नगर में एक खंभे पर ‘आवर स्वाधीन भारत’ शीर्षक से परचे चिपकाए थे। 
    • ये पर्चे चौबीस परगना के क्रिस्टो राय बंगाल से लेकर आये थे। 
  • गिरिडीह के मनोरंजन गुहा (उपनाम – ठाकुर दा) तथा दुमका के हेमेन्द्र नाथ घोष द्वारा क्रांतिकारियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराया जाता था।
  • राम विनोद सिंह को ‘हजारीबाग का जतिन बाघा’ कहा जाता है। 
    • हजारीबाग के संत कोलंबा महाविद्यालय के छात्र
    •  राम विनोद सिंह को 14 सितंबर, 1918 को गिरफ्तार किया गया था
      • जिसके खिलाफ हजारीबाग में छात्रों द्वारा प्रदर्शन किया गया था।

सिंहभूम 

  •  ढाका, मैमनसिंह तथा कलकत्ता से कई क्रांतिकारी आकर सिंहभूम के जमशेदपुर एवं चाईबासा में छुपते थे तथा क्रांति का गुप्त प्रचार करते थे। 
  • 1908 ई. में टाटा कंपनी के कर्मचारी गिरीन्द्र नाथ मुखर्जी ने न्यूयॉर्क से घोषणा की थी कि ‘रक्तरंजित क्रांति से ही भारत को मुक्त किया जा सकता है।’ इनके भाई अमरनाथ मुखर्जी भी क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल थे। 
  •  क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल दुर्गादास बनर्जी, सुरेंद्र कुमार राय आदि का संबंध टाटा कंपनी से है।
  • सुधांशु भूषण मुखर्जी अप्रैल, 1916 में अलीपुर जेल से रिहा होने के बाद सिंहभूम के सोनुआ ग्राम में रहने लगे तथा बाद में हजारीबाग चले गये। 
  • आनंद कमल चक्रवर्ती ने चाईबासा से प्रकाशित ‘तरूण शक्ति’ नामक क्रांतिकारी पत्रिका का संपादन किया था। इस पत्रिका में ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध लिखने हेतु उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था।

अन्य तथ्य 

  •  काकोरी कांड के मुख्य आरोपी अशफाक उल्ला खाँ, कलकत्ता के प्रफुल्ल चंद्र घोष व ज्योति पंत राय जैसे क्रांतिकारियों ने भी कुछ दिनों तक छुपने हेतु झारखण्ड में शरण ली थी। 
  • छोटानागपुर क्षेत्र डॉ. यदुगोपाल मुखर्जी एवं बसावन सिंह के नेतृत्व में 1931-32 के आसपास भी क्रांतिकारी आंदोलन संचालित था। 
  • बिहार के गया में राजनैतिक डकैती के मामले में गिरफ्तार 18 क्रांतिकारियों में डाल्टनगंज के परमथ नाथ मुखर्जी तथा गणेश प्रसाद वर्मा भी शामिल थे।

गाँधी युग 

गाँधीजी का झारखण्ड आगमन (1917-1940 के बीच) 

  • महात्मा गाँधी 1917 से 1940 के बीच विभिन्न कारणों से कई बार झारखण्ड की यात्रा पर आए। इनमें से गाँधीजी की झारखण्ड की प्रथम 4 यात्राओं का संबंध चंपारण आंदोलन से है। 
  •  गाँधीजी पहली बार 3 जून, 1917 को झारखण्ड आए थे। गाँधीजी अंतिम बार रामगढ़ के कांग्रेस अधिवेशन के सिलसिले में झारखण्ड आए थे। 

चंपारण आंदोलन के सिलसिले में (पहली बार)

  •  महात्मा गाँधी को 29 मई, 1917 को सरकार की तरफ से एक पत्र मिला जिसमें उन्हें 4 जून को बिहार-ओडिशा के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर एडवर्ड अल्बर्ट गेट से मिलने हेतु आग्रह किया गया था। इसके अतिरिक्त श्याम कृष्ण सहाय ने भी 1917 में गाँधी जी को राँची आने का निमंत्रण दिया था। 
  • इन्हीं संदर्भों में 3 जून, 1917 को ब्रजकिशोर बाबू के साथ पहली बार महात्मा गाँधी का राँची आगमन हुआ। इस दौरान गाँधीजी श्याम कृष्ण सहाय के घर पर ही रुके। 4 जून को महात्मा गाँधी की पत्नी कस्तूरबा गाँधी तथा उनके पुत्र देवदास गाँधी भी राँची आए।
  • 4 जून से 6 जून तक तीन दिन बिहार के लेफ्टिनेंट गवर्नर अल्बर्ट गेट से उनकी वार्ता चली तथा 7 जून को वे पटना लौट गए। इस दौरान गांधीजी श्यामकृष्ण सहाय के घर पर रूके थे। 

चंपारण आंदोलन के सिलसिले में (दूसरी बार )

  • गाँधीजी 5 जुलाई को मोतिहारी से चलकर 7 जुलाई को दूसरी बार राँची पहुंचे। इस यात्रा का उद्देश्य 11 जुलाई, 1917 को चंपारण जांच समिति की एक बैठक में भाग लेना था। बैठक संपन्न होने के बाद गाँधीजी 13 जुलाई को पुनः मोतिहारी लौट गए।

चंपारण आंदोलन के सिलसिले में (तीसरी बार) 

  •  18 सितंबर को पूना से चलकर 22 सितंबर, 1917 को चंपारण आंदोलन के सिलसिले में पुनः राँची पहुंचे। उन्होनें ब्रजकिशोर प्रसाद को भी राँची बुला लिया। इस संदर्भ में 23 सितंबर को राँची के पते से मगनलाल गांधी को लिखा एक पत्र भी मिला है। 24 सितंबर, 1917 को राँची में चंपारण समिति की बैठक आयोजित की गयी जिसमें आंदोलन को लेकर काफी विचार-विमर्श किया गया। 
  •  गांधीजी 24 सितंबर से 28 सितंबर, 1917 तक चंपारण जांच समिति की बैठक में शामिल हुए जिसमें चंपारण आंदोलन की रूपरेखा तैयार की गयी। 
  •  3 अक्टूबर, 1917 को गांधीजी ने सरकार को चुनौती देते हुए अपनी एक रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किया तथा 4 अक्टूबर, 1917 को गांधीजी चंपारण हेतु निकल गए। 

चंपारण आंदोलन के सिलसिले में (चौथी बार)

  •  असहयोग आंदोलन (1920-21) के दौरान महात्मा गाँधी 1920 में राँची आए थे। इस दौरान वे भीमराज बंशीधर मोदी धर्मशाला में रुके थे। गांधीजी की उपस्थिति में ही इसी धर्मशाला के बाहर विदेशी कपड़ों की होली जलाई गयी थी। इस दौरान गाँधीजी टाना भगतों से भी मिले जिसके बाद टाना भगत गाँधीजी के प्रिय शिष्य बन गए।

गाँधीजी का पाँचवी बार झारखण्ड आगमन 

  •  गाँधीजी 5 फरवरी, 1921 में पहली बार धनबाद आए तथा यहाँ से झरिया गए। गाँधीजी के इस दौरे का उद्देश्य राष्ट्रीय विद्यालय हेतु कोष एकत्रित करना था। झरिया में कार्यक्रम समाप्त होने के बाद गाँधीजी पटना लौट गए। 

गाँधीजी का छठी बार झारखण्ड आगमन 

  • 8 अगस्त, 1925 गाँधीजी सी. एफ. एण्डूज के आग्रह पर गाँधीजी पहली बार जमशेदपुर आए। गाँधीजी की इस यात्रा का उद्देश्य टाटा प्रबंधन एवं मजदूर यूनियन के बीच 1921 से चल रहे हड़ताल के कारण उत्पन्न तनाव के मामले में समझौता कराना था। 
  • जमशेदपुर में आर. डी. टाटा ने गाँधीजी का भव्य स्वागत किया तथा इस प्रवास के दौरान गाँधीजी डायरेक्टर्स बंगला में रुके।
  • इसी दौरान जमशेदपुर की एक सभा में देशबंधु स्मृति कोष हेतु गाँधीजी को 5000 रुपये प्रदान किए गए। 
  •  गाँधीजी 1934 में दूसरी बार तथा 1940 में तीसरी बार जमशेदपुर आए थे।

गाँधीजी का सातवीं बार झारखण्ड आगमन 

  • 15 सितंबर, 1925 को गाँधीजी पहली बार पुरूलिया से चक्रधरपुर आए तथा यहाँ राष्ट्रीय विद्यालय में जाकर छात्रों को संबोधित किया (1934 में दूसरी बार चक्रधरपुर की यात्रा की)। 
  • चक्रधरपुर से चाईबासा व खूंटी होते हुए गांधीजी 16 सितंबर, 1925 को राँची पहुंच गए। राँची जाने के क्रम में गाँधीजी चाईबासा में हो आदिवासियों से तथा खूंटी में मुण्डाओं से बातचीत की। 
  • गाँधीजी ने राँची में 17 सितंबर, 1925 को संत पॉल स्कूल में एक सभा को संबोधित किया। इस सभा में गाँधीजी को देशबंधु स्मारक कोष हेतु 1,000 रुपये की थैली भेंट मिली। इस सभा के बाद गाँधीजी योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय भी गए (1 मई, 1934 को दूसरी बार योगदा सत्संग विद्यालय आए थे)।

गाँधीजी से टाना भगतों की मुलाकात व प्रभाव

  • 1925 के राँची दौरे के समय गाँधीजी से मिलने बड़ी संख्या में झारखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों से टाना भगत राँची आए। 
  • गाँधीजी के विचारों से ही प्रभावित होकर टाना भगतों ने अहिंसा का व्रत लेकर आजादी के आंदोलन में भागीदारी की थी। टाना भगतों ने अंग्रेजों को जमीन का लगान देना बंद कर दिया था जिसके बाद इनकी जमीनें नीलाम कर दी गयी। 
  • टाना भगत गाँधी टोपी पहनते थे तथा हाथ में घंटा लेकर आजादी का प्रचार करते थे। 
  • टाना भगतों ने कांग्रेस के कई अधिवेशनों (रामगढ़ सहित) में भाग लिया था। 
  • नमक आंदोलन के दौरान नमक नहीं बना पाने के कारण इन्होनें नमक खाना ही छोड़ दिया था। 
  • 1928 ई. में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में टाना भगत एक सप्ताह की पैदल यात्रा करके कोलकाता पहुँचे थे (कारण- अंग्रेजों ने इनके कोलकाता जाने पर पाबंदी लगा दी थी)। लेकिन यहाँ डेलिगेट व्यवस्था के कारण गाँधीजी से मिलने में असफल हो गए। 
  • इसके बाद इन्होंने एक उपाय निकाला और जोर-जोर से ‘गाँधीजी की जय, भारत माता की जय, वंदे मातरम्’ जैसे नारे लगाने लगे। इन्हें विश्वास था कि गाँधीजी इनकी आवाज सुनकर इनसे जरूर मिलेंगे। 
  • कुछ लोगों द्वारा इस प्रकार नारे लगाने की सूचना गाँधीजी को दी गयी जिसके बाद गाँधीजी ने इनके लिए नि:शुल्क पास भेजकर टाना भगतों को अधिवेशन में शामिल कराया। 
  • राँची के बाद गाँधीजी रामगढ़ होते हुए 18 सितंबर, 1925 को हजारीबाग पहुँचे तथा यहाँ कर्जन ग्राउंड (वर्तमान नाम- वीर कुंवर सिंह स्टेडियम) में एक सभा को संबोधित किया। सभा में गाँधीजी को 1,300 रुपये की एक थैली भेंट की गयी। 
  • 19 सितंबर, 1925 को गाँधीजी ने हजारीबाग के संत कोलंबा महाविद्यालय में छात्रों को संबोधित किया। 
  • हजारीबाग में कार्यक्रम की समाप्ति के बाद गाँधीजी ट्रेन से पटना के लिए रवाना होगा। ट्रेन से पटना जाने के क्रम में ट्रेन जब कोडरमा स्टेशन पर रुकी तो हजारों लोगों की भीड़ गांधीजी के दर्शनार्थ खडी थी। यहाँ होरिल राम नामक एक व्यक्ति ने गाँधीजी को देशबंधु स्मारक कोष हेतु 350 रुपये की एक थैली भेंट की। 

गाँधीजी का आठवीं बार झारखण्ड आगमन

  •  3 अक्टूबर, 1925 को भागलपुर से बांका होते हुए पहली बार देवघर की यात्रा पर आए। यहाँ गाँधीजी का भव्य स्वागत किया गया। गाँधीजी इस यात्रा के दौरान देवघर में सेठ गोवर्धनदास के मकान में रुके थे। इस दौरे में गाँधीजी कुछ समय के लिए नौलखा मंदिर के पास स्थित कोलकाता व्यवसायी हरगोविंद डालमिया के मकान में भी रहे। 
  • कोलकाता उच्च न्यायालय के सॉलिसिटर कृष्ण कुमार दत्ता के आमंत्रण पर गाँधीजी देवघर के रिखिया गाँव में भी गए। (रिखिया गाँव में स्वामी सत्यानंद सरस्वती जी द्वारा निर्मित आश्रम भी है।) 
  • 7 अक्टूबर, 1925 को देवघर से खड़गडीहा जाते समय गाँधीजी गिरिडीह भी पहुंचे थे। यहाँ गाँधीजी ने एक सार्वजनिक सभा तथा महिलाओं की एक सभा को संबोधित किया। 
  • 8 अक्टूबर, 1925 को गाँधीजी गिरिडीह से मधुपुर पहुंचे। यहाँ रेलवे स्टेशन के पास ही गाँधीजी का भव्य स्वागत किया गया। मधुपुर में गाँधीजी चंपा कोठी में ठहरे थे। यहाँ गाँधीजी ने मधुपुर नगरपालिका के नये भवन का उद्घाटन भी किया (पुराने भवन का उद्घाटन 1909 में हुआ था)। इस भवन के दरवाजे पर चांदी का ताला लगा था जिसे गाँधीजी ने चाँदी की चाबी से खोला। 
  • 1925 की अपनी देवघर यात्रा के बारे में लिखते हुए गाँधीजी ने ‘यंग इण्डिया’ में देवघर के पंडों और देवघर की परंपरा की तारीफ की। गाँधीजी के अनुसार “अन्य मंदिरों के विपरीत यहां छुआछूत नहीं माना जाता है तथा मंदिर सबके लिए खुले हैं।” 

गाँधीजी का नवीं बार झारखण्ड आगमन

  •  11 जनवरी, 1927 को गाँधीजी ने डाल्टनगंज (मेदिनीनगर) की यात्रा की। वे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के साथ काशी से रेलगाड़ी द्वारा यहां आए थे। यहाँ शिवाजी मैदान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया। इस सभा के बाद गाँधीजी मारवाड़ी सार्वजनिक पुस्तकालय भी गए। यहां के लोगों ने गाँधीजी को 525 रुपये एकत्र करके दिया। डाल्टनगंज के दौरे के बाद गाँधीजी धनबाद व झरिया के लिए रवाना हो गए। 
  • डाल्टनगंज की सभा के बाद गाँधीजी 12 जनवरी, 1927 को दूसरी बार धनबाद पहुँचे। यहाँ पहुँच कर उन्होनें खादी की दुकानों पर जाकर खादी की बिक्री का जायजा लिया। 12 जनवरी, 1927 को ही शाम में झरिया में आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए गाँधीजी ने खादी की कम बिक्री पर निराशा जाहिर की।
  •  13 जनवरी, 1927 को गाँधीजी कतरास आ गए। यहाँ एक विशाल पंडाल में गाँधीजी की सभा का आयोजन किया गया। इसके अलावा गाँधीजी ने यहाँ महिलाओं की एक सभा को भी संबोधित किया। 

गाँधीजी का दसवीं बार झारखण्ड आगमन

  •  1934 में गाँधीजी ने छोटानागपुर का बड़ा व लंबा दौरा किया। 26 अप्रैल, 1934 को गाँधीजी दूसरी बार देवघर आए। यहाँ जसीडीह स्टेशन पहुँचने पर ही गाँधीजी की कार पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया। इसमें कार के शीशे टूट गए परंतु गाँधीजी को स्वयंसेवकों ने बचा लिया। गाँधीजी पर इस हमले की पूरे देश में कड़ी निंदा की गयी। 
  •  28 अप्रैल, 1934 को गाँधीजी ने गोमिया के करमाटांड़ गाँव के गोबीटांड़ मैदान में एक सभा की। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संथाल आदिवासी गांधीजी को सुनने आए थे। इस सभा के आयोजन में होपन मांझी का प्रमुख योगदान था। सभा के बाद गाँधीजी होपन मांझी के घर भी गए। होपन माझी को 23 अगस्त, 1930 को 2,000 रूपया जुर्माना नहीं चुकाने के बाद हजारीबाग जेल में एक वर्ष कारावास की सजा दी गयी थी। परंतु हजारीबाग के उपायुक्त की अनुशंसा पर उसे सजा से पूर्व ही रिहा कर दिया गया था। 
  •  गोमिया की सभा के बाद गाँधीजी ने 28 अप्रैल, 1934 को ही बेरमो में एक सभा एवं महिलाओं की एक बैठक को भी संबोधित किया। यहाँ से गाँधीजी कतरासगढ़ होते हुए झरिया चले गए। यहाँ गाँधीजी ने एक सभा को संबोधित किया तथा हरिजन कल्याण कोष हेतु लोगों से सहयोग मांगा। रात्रि में गाँधीजी ने झरिया में ही विश्राम किया। 
  • 29 अप्रैल, 1934 को गाँधीजी ने जामाडोबा कोलियरी में टाटा कोलियरी वर्कर्स एवं हरिजन वर्कर्स को संबोधित किया तथा पुरुलिया व झालदा होते हुए राँची आए। इसी यात्रा के दौरान 1 मई, 1934 को गाँधीजी दूसरी बार राँची स्थित योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय भी गये। 
  • 1 मई को गाँधीजी ने स्वराजवादी नेताओं के साथ बैठक किया। इस बैठक में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, अरुणा आसफ अली, सरोजिनी नायडू, भूलाभाई देसाई, जमनालाल बजाज आदि ने भाग लिया। 
  •  3 मई, 1934 को गाँधीजी ने राँची में हरिजन छात्र संघ को संबोधित किया।
  • 4 मई, 1934 को गाँधीजी राँची से कार द्वारा चक्रधरपुर होते हुए जमशेदपुर (उद्देश्य – हरिजन आंदोलन) के लिए रवाना हो गये। लेकिन इस यात्रा के दौरान चक्रधरपुर के पास गाँधीजी की कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी जिसमें वे बाल-बाल बच गए। 
  •  इस दुर्घटना के बावजूद गाँधीजी ने 4 मई, 1934 को चक्रधरपुर जाकर रेलवे कर्मचारियों की एक सभा एवं महिलाओं की एक सभा को संबोधित किया। 

गांधी जी का ग्यारहवीं बार झारखण्ड आगमन

  •  गाँधीजी 1940 ई. में कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में भाग लेने हेतु झारखण्ड आए। वे 12 मार्च, 1940 को सेवाग्राम से चलकर 14 मार्च को रामगढ़ पहुँचे। 14 मार्च को रामगढ़ में उन्होनें खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। 
  • रामगढ़ अधिवेशन के बीच में ही 19 मार्च को गाँधीजी कार  द्वारा राँची आए तथा यहाँ ठक्कर भवन और हरिजनों-आदिवासियों के लिए एक औद्योगिक गृह का उद्घाटन किया। 
  • गांधीजी इस दौरान राँची के निवारणपुर में अस्वस्थ निवारण बाबू से मिलने भी गये। यहाँ गाँधीजी ने एक जनसभा को भी संबोधित किया। शाम में गाँधीजी पुनः रामगढ़ लौट गए। 
  •  रामगढ़ अधिवेशन की समाप्ति पर गाँधीजी 21 मार्च, 1940 को जमशेदपुर चले गए। इस दौरान जमशेदपुर में वे जहाँगीर मोदी के घर पर रुके थे। जमशेदपुर से गाँधीजी वर्धा के लिए रवाना हो गए। यह उनकी अंतिम झारखण्ड यात्रा थी। 
  • नोट- महात्मा गांधी की विभिन्न झारखण्ड यात्राओं से संबंधित तथ्यों एवं विवरण हेतु अनुज कुमार सिन्हा की पुस्तक ‘महात्मा गाँधी की झारखण्ड यात्रा’, महात्मा गाँधी के विभिन्न पत्र, समाचार पत्र एवं सरकारी दस्तावेजों का स्रोत के रूप में उपयोग किया गया है।

रॉलेट एक्ट का विरोध (1919) 

  •  ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों द्वारा सरकार विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से सिडनी रॉलेट रिपोर्ट के आधार पर एक कानून पारित किया जिसका पूरे देश भर में व्यापक विरोध किया गया। 
  •  झारखण्ड में इस कानून का विरोध किया। राँची में बारेश्वर सहाय एवं गुलाब तिवारी ने इस कानून के विरोध में सत्याग्रह का नेतृत्व किया। 
  •  6 अप्रैल, 1919 को पलामू के जिला स्कूल के शिक्षक रामदीन पाण्डेय ने 6 छात्रों के साथ उपवास भी रखा।

झारखण्ड में कांग्रेस कमिटी की स्थापना (1919-20) 

  •  1919 ई. में पलामू में जिला कांग्रेस कमिटी की स्थापना बिन्देश्वरी पाठक और भागवत पाण्डेय ने की थी। 
  •  1920 ई. में राँची तथा हजारीबाग में कांग्रेस कमिटी का गठन किया गया।

झारखण्ड में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन