असहयोग आंदोलन (1920-22 )
- अहिंसक आंदोलन का प्रस्ताव पारित : 1920 में कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में
- नेतृत्व – गाँधी जी को सौंपा गया।
- झारखण्ड में भी असहयोग आंदोलन प्रारंभ -1920 में
- असहयोग आंदोलन के समय गाँधी जी पुनः झारखण्ड आये।
- मोतीलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मजहरूल हक आदि प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं ने भी झारखण्ड की यात्रा की ।
- 1921 में इस आंदोलन में टाना/ताना भगतों ने भी उल्लेखनीय योगदान दिया ।
- ताना भगतों ने ब्रिटिश सरकार को कर देना बंद कर दिया, उनकी जमीनें नीलाम कर दी गयी।
- पहाड़िया जनजाति ने भी इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
- इनका नेतृत्व जबरा पहाड़िया ने किया ।
- जाबरा पहाडिया को गिरफ्तार कर उन्हें सश्रम कारावास की सजा दी गयी
- उनके घर को कुर्क कर दिया गया।
- इस आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय विद्यालय खोला गया – राँची, चतरा, गिरिडीह, धनबाद, पलामू व लोहरदगा में
- झारखण्ड में असहयोग आंदोलन का केन्द्र – राँची था।
- अन्य भागों में भी – पलामू, हजारीबाग, सिंहभूम आदि
राँची
- असहयोग आंदोलन के दौरान राँची एवं इसके आसपास के क्षेत्रों में कई सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया गया। इस आंदोलन में आदिवासियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
- 1921 में राँची में आयोजित वार्षिक पिंजरापोल समारोह में भोलानाथ बर्मन, अब्दुर रज्जाक, पद्मराज जैन आदि ने भाषण दिया।
- इस आंदोलन के दौरान राँची एवं लोहरदगा में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की गयी।
पलामू
- पलामू के आदिवासी नेता धनी सिंह खरवार के नेतृत्व में इस आंदोलन के दौरान जंगलों को काटकर कपास की खेती शुरू की गयी (ऐसा करने को 1920 के कलकत्ता अधिवेशन में गांधी जी ने कहा था) तथा धनी सिंह खरवार को पलामू का राजा घोषित कर दिया गया।
- धनी सिंह खरवार के नेतृत्व में आदिवासियों का एक विशाल जुलूस डाल्टनगंज पहुंचा जिसे लाठी चार्ज करके खदेड़ दिया गया।
- इसी दौरान बिहार स्टूडेंट कांफ्रेंस का 15वाँ अधिवेशन 10 अक्टूबर, 1920 ई. को सी. एफ.एंड्रयूज की अध्यक्षता में डाल्टनगंज में संपन्न हुआ। इस अधिवेशन में मजहरूल हक, अब्दुल बारी, जी. इमाम, हसर आरजू, चंद्रवंशी सहाय एवं कृष्ण प्रसन्न सेन आदि ने भाग लिया।
- इसी आंदोलन के दौरान पलामू कांग्रेस ने डाल्टनगंज में राष्ट्रीय विद्यालय खोला जिसका प्रधानाध्यापक बिन्देश्वरी पाठक को बनाया गया।
- इस आंदोलन के दौरान पलामू में शेख साहब ने अपनी वकालत छोड़ दी थी।
हजारीबाग
- इस आंदोलन के दौरान हजारीबाग में कई छात्रों ने अपनी पढ़ाई तथा राम नारायण सिंह के साथ-साथ कई वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी।
- हजारीबाग में आंदोलन के व्यापक होने पर आंदोलन के नेता बजरंग सहाय, कृष्ण बल्लभ सहाय, शालिग्राम सिंह, त्रिवेणी प्रसाद एवं सरस्वती देवी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
- बिहार स्टूडेंट कॉन्फ्रेंस का 16वां अधिवेशन 5-6 अक्टूबर, 1921 को हजारीबाग में सरला देवी की अध्यक्षता में हुआ। इस कॉन्फ्रेंस को बजरंग सहाय, कृष्ण बल्लभ सहाय, राम नारायण सिंह आदि ने संबोधित किया।
सिंहभूम
- इस आंदोलन के दौरान सिंहभूम के चक्रधरपुर में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की गयी।
- जमशेदपुर के गोलमुरी मैदान में 5-9 फरवरी के बीच कई सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया गया। इन सभाओं की अध्यक्षता बी. जी. साठे (5 फरवरी), प्रभास चंद्र मित्र (6 फरवरी), के. के भट्ट (8 फरवरी) तथा अब्दुल गनी (9 फरवरी) ने की।
- इसी दौरान 8 मार्च को जमशेदपुर के गोलमुरी मैदान में एवं 13 मार्च को चाईबासा में जनसभा का आयोजन किया गया।
- 15 मार्च, 1921 को पूरे जमशेदपुर में हड़ताल का आयोजन किया गया।
- जून, 1921 में मजरूल हक का आगमन चक्रधरपुर में हुआ।
अन्य तथ्य
- गिरिडीह में असहयोग आंदोलन को नेतृत्व – पचम्बा के बाबू बजरंग सहाय ने
- असहयोग आंदोलन के दौरान साहेबगंज को अशांत क्षेत्र घोषित – जनवरी, 1922 में
- “देशेर कथा’ की रचना – सखाराम गणेश देउस्कर द्वारा की गयी थी।
- ‘तिलक स्वराज कोष’ हेतु धन एकत्र – कांग्रेस के गया अधिवेशन (37 वाँ अधिवेशन) से लौटकर राँची के पी. सी. मित्रा एवं देवकी प्रसाद ने
- ‘राष्ट्रीय सप्ताह’ के रूप में मनाया गया – 6 अप्रैल से 13 अप्रैल, 1923 के बीच
- 1 मई से 18 अगस्त, 1923 के बीच राष्ट्रीय ध्वज की रक्षा हेतु आयोजित नागपुर झंडा सत्याग्रह में झारखण्ड के टाना भगतों ने भी भाग लिया।
स्वराज पार्टी
- झारखण्ड के छोटानागपुर क्षेत्र में राम नारायण सिंह एवं देवकी प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में स्वराज पार्टी की प्रचार समितियों का गठन किया गया था।
- 1923 ई. में हुए विधान परिषद् के चुनाव में कृष्ण बल्लभ सहाय को हजारीबाग में स्वराज पार्टी का प्रतिनिधि चुना गया।
- कृष्ण वल्लभ सहाय को बिहार प्रांतीय स्वराज पार्टी में सचिव का पद प्रदान किया गया।
- सोनार सिंह खरवार को संथाल परगना क्षेत्र में स्वराज पार्टी का कार्यभार दिया गया।
- 1923 ई. में रामेश्वर लाल को दक्षिणी संथाल परगना में स्वराज पार्टी का प्रतिनिधि चुना गया।
खादी आंदोलन
- झारखण्ड क्षेत्र से विधायक नीलकांत चटर्जी ने 1924 ई. में बिहार विधान परिषद् में खादी से संबंधित एक प्रस्ताव रखा था।
- सिंहभूम के आदिवासियों ने 1924 ई. में विष्णु माहुरी के नेतृत्व में हाट कर न देने हेतु आंदोलन चलाया था।
- झारखण्ड में विभिन्न स्थानों पर चरखा आंदोलन को प्रसारित करने हेतु सरला देवी के नेतृत्व में खादी डिपो की स्थापना की गयी।
- अखिल भारतीय खादी बोर्ड के अध्यक्ष जमनालाल बजाज ने देवघर में खादी मेला का शुभारंभ किया था।
- जमशेदपुर में टम्पल नामक अंग्रेज द्वारा खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया था।
साइमन कमीशन
- साइमन कमीशन 1928 ई. में झारखण्ड आया था।
- 1928 में श्याम कृष्ण सहाय की अध्यक्षता में एक सभा का आयोजन किया गया जिसमें साइमन कमीशन के विरोध का प्रस्ताव पारित किया गया था।
- राँची में साइमन कमीशन का मजबूती के साथ विरोध किया गया था। श्याम कृष्ण सहाय के नेतृत्व में राँची में ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारे लगाए गए थे।
- पलामू निवासी कोहड़ा पाण्डेय के नेतृत्व में भी राँची में साइमन कमीशन का व्यापक विरोध किया गया था।
- हजारीबाग में देवकी नंदन लाल एवं पी. सी. मित्रा के नेतृत्व में लोगों ने काला झंडा दिखाकर साइमन कमीशन का विरोध किया था।
- 1928 ई. में छोटानागपुर उन्नति समाज द्वारा छोटानागपुर राज्य के गठन हेतु साइमन कमीशन को मांग पत्र सौंपा गया था।
मजदूर आंदोलन
- राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान समय-समय पर मजदूरों द्वारा भी अपनी दयनीय स्थिति से बाहर निकलने तथा स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु व्यापक स्तर पर प्रयास किया गया जिसकी झलक झारखण्ड राज्य में भी दृष्टिगत होती है।
- इस क्रम में 1920 ई. में जमशेदपुर वर्कर्स एसोसिएशन की स्थापना की गयी जिसे एस. एन. हलधर तथा व्योमेश चक्रवर्ती ने नेतृत्व प्रदान किया।
- वर्ष 1920-22, 1925 तथा 1928 में टाटा आयरन एण्ड स्टील वर्कर्स तथा अन्य कई मिलों में व्यापक हड़ताल किया गया।
- 1928 ई. की टाटा आयरन एण्ड स्टील वर्कर्स की हड़ताल को समाप्त कराने में सुभाष चंद्र बोस का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होनें मजदूरों तथा मिल प्रबंधक के बीच समझौता कराने में अग्रणी भूमिका अदा की।
- 18 अगस्त, 1928 को सुभाष चंद्र बोस का जमशेदपुर आगमन हुआ तथा 20 अगस्त, 1928 को उन्हें जमशेदपुर/ टाटा लेबर एसोसिएशन का अध्यक्ष चुना गया। वे 9 वर्षों तक इस यूनियन के अध्यक्ष पद पर रहे।
- सुभाष चंद्र बोस के प्रयास से ही 12 सितंबर को टाटा यूनियन के मजदूरों ने अपनी हड़ताल वापस ली तथा कंपनी के प्रबंधक और मजदूरों के बीच समझौता संभव हो पाया।
- वर्ष 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में झरिया में भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित किया गया।
- 1929 ई. में जमशेदपुर स्थित गोलमुरी के एक टिन प्लेट कंपनी के मजदूरों ने हड़ताल की थी। यह हड़ताल 1938 ई. में समाप्त हुयी।
- 1929 ई. में जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में झरिया में ‘भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ का अधिवेशन आयोजित किया गया था।
- 1938 ई. में अब्दुल बारी सिद्दीकी द्वारा ‘टाटा वर्कर्स यूनियन’ (टाटा वर्कर्स एसोसिएशन – 1920) की स्थापना की गयी थी।
सविनय अवज्ञा आंदोलन
- गाँधी जी ने प्रसिद्ध दांडी यात्रा से 12 मार्च, 1930 को सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया। इस क्रम में गाँधी जी अपने अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी गाँव पहुंचे। 6 अप्रैल, 1930 को दांडी में सांकेतिक रूप से नमक कानून भंग किया गया।
- 26 जनवरी, 1930 को कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (1929) में पारित पूर्ण स्वाधीनता प्रस्ताव के आलोक में पूरे देश में स्वाधीनता दिवस मनाया गया। झारखण्ड में भी पूरे उल्लास के साथ स्वाधीनता दिवस का आयोजन किया गया।
- झारखण्ड के लोगों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
- गांधीजी द्वारा 6 अप्रैल, 1930 को प्रारंभ नमक आंदोलन में भी झारखण्ड के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया तथा 13 अप्रैल, 1930 झारखण्ड के लगभग 50 स्थानों पर नमक बनाया गया।
- झारखण्ड में सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रमुख केन्द्र राँची था। लेकिन राज्य के अन्य भागों में भी (हजारीबाग, पलामू, सिंहभूम, संथाल परगना आदि) में इस दौरान लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
राँची
- राँची में तरुण संघ द्वारा स्वाधीनता दिवस का आयोजन किया गया।
- 26 जनवरी, 1930 को डॉ. पूर्णचंद्र मित्रा ने राँची में स्वाधीनता दिवस मनाने के अवसर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। इस कार्यक्रम का आयोजन तरूण संघ नामक संगठन द्वारा किया गया था।
- इस आंदोलन के दौरान राँची व उसके आसपास के क्षेत्रों में कई सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया गया
- 8 अप्रैल, 1930 को चुटिया में नागरमल मोदी की अध्यक्षता में एक सभा का आयोजन किया गया जिसे पी. सी. मित्रा व देवकी नंदन लाल समेत कई व्यक्तियों ने संबोधित किया।
- 10 अप्रैल, 1930 को राँची में 1000 से अधिक लोगों की तथा हिनू में 100 बंगाली महिलाओं की सभा का आयोजन किया गया।
- 15 अप्रैल, 1930 को जिला स्कूल के छात्राओं ने विद्यालय का बहिष्कार किया तथा 16 अप्रैल, 1930 को बुंडू में पूर्ण हड़ताल का आयोजन किया गया।
- 17 अप्रैल, 1930 को सिल्ली में तथा 18 अप्रैल, 1930 को कुंडु में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया। कुंडू की सभा में सरस्वती देवी एवं मीरा देवी ने भाषण भी दिया।
- 3 मई, 1930 को राँची बार एसोसिएशन की एक बैठक आयोजित की गयी जिसमें विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार एवं खादी के उपयोग का प्रस्ताव पारित किया गया।
- 4 मई, 1930 को मांडर में महादेव स्वर्णकार ने गिरफ्तारी दी तथा 12 मई, 1930 को पी. सी. मित्रा. नागरमल मोदी व देवकी नंदन लाल और 31 मई, 1930 को रवीन्द्र चंद्र व रामधनी दूबे को गिरफ्तार किया गया।
- 2 जून, 1930 को लगभग 40 टाना भगतों ने राँची में एक जुलूस निकाला जिसके बाद 8 टाना भगतों को गिरफ्तार कर लिया गया।
- ब्रिटिश हुकूमत से अपनी बातें मनवाने के लिए जगह-जगह पर व्यापक हड़ताल एवं प्रदर्शनों का आयोजन किया गया जिसके तहत ‘स्वदेशी सप्ताह’ (सितंबर, 1930) में तथा ‘जवाहर सप्ताह’ (नवंबर, 1930 में) मनाया गया।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन का दूसरा चरण प्रारंभ होने के बाद 3 मार्च, 1932 को राँची के तरूण संघ नामक संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
- 27 जुलाई, 1932 को नागरमल मोदी, बुलु साहू व ख्वाजा नसीरुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया गया।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण के दौरान भी महात्मा गाँधी राँची आए थे।
हजारीबाग
- हजारीबाग में भी सविनय अवज्ञा आंदोलन में लोगों ने पूरे उत्साह के साथ सहभागिता दर्ज की थी।
- 26 जनवरी, 1930 को हजारीबाग में लाठी चार्ज होने के बावजूद कृष्ण बल्लभ सहाय ने कचहरी पर झंडा फहराया था।
- झारखण्ड के कृष्ण बल्लभ सहाय ने भी हजारीबाग में खजांची तालाब के निकट नमक बनाकर इस आंदोलन को प्रसारित किया जिसके लिए उन्हें एक वर्ष के कारावास की सजा मिली।
- हजारीबाग में नमक सत्याग्रह में सीताराम दुबे, चक्र सिंह, मथुरा प्रसाद, सरस्वती देवी, मीरा देवी आदि ने भाग लिया। सरस्वती देवी हजारीबाग जिला कांग्रेस कमिटी की अध्यक्षा थीं।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान कई पुरुषों के साथ-साथ सरस्वती देवी, मीरा देवी एवं साधना देवी को गिरफ्तार कर लिया गया। सितंबर, 1930 के तक हजारीबाग के 137 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
- बंगम माड़े (बंगम मांझी) के नेतृत्व में हजारीबाग में संथालों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में अपनी सहभागिता दर्ज की।
- आंदोलन के प्रचार-प्रसार के लिए हजारीबाग जेल में बंद रामवृक्ष बेनीपुरी ने ‘कैदी’ नामक हस्तलिखित पत्रिका निकाली।
- इसी क्रम में महामाया प्रसाद सिन्हा तथा भवानी दयाल सन्यासी ने भी हजारीबाग जेल में रहकर ‘कारागार’ नामक हस्तलिखित पत्रिका निकाली।
- इस आंदोलन के दौरान डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने हजारीबाग केंद्रीय कारागार में सूत कातकर कपड़ा तैयार किया था।
सिंहभूम
- नमक सत्याग्रह का नेतृत्व जमशेदपुर में ननी गोपाल मुखर्जी तथा पलामू में सोनार सिंह खरवार व चंद्रिका प्रसाद वर्मा ने किया।
- इस आंदोलन के दौरान सिंहभूम के आदिवासियों ने हाट कर देना बंद कर दिया।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान 6 अगस्त, 1930 को चक्रधरपुर में कांग्रेसियों ने जंगल काटकर सरकार के प्रति अपना विरोध प्रकट किया। इसे जंगल सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है। इसका नेतृत्व हरिसिंह हरिहर महतो तथा लालबाबू कर रहे थे। इन्हें सरकार ने गिरफ्तार कर लिया।
- 16 नवंबर को जमशेदपुर के गोलमुरी मैदान में झंडा फहराकर ‘जवाहर दिवस’ मनाया गया। इस कार्यक्रम के दौरान अंग्रेजों ने लाठीचार्ज कर दिया तथा कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
- 19 नवंबर, 1930 को गोलमुरी में 3000 लोगों की एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया जिसमें सरकार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया गया।
- भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को दी गयी फांसी के विरोध में 5 मार्च, 1931 को जमशेदपुर में हड़ताल किया गया।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण के शुरू होने के बाद महात्मा गाँधी व अन्य नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में 5 जनवरी, 1932 को गोलमुरी में एक सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में 500 से अधिक महिला-पुरुषों ने भाग लिया। सभा की समाप्ति के बाद कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
- 24 जनवरी, 1930 को जी. महंती के घर से स्वाधीनता दिवस से संबंधित एक परचा मिलने के बाद 4 लोगों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
- 26 जनवरी, 1930 को लोगों ने गोलमुरी मैदान में झंडा फहराने का प्रयास किया। पुलिस ने लाठीचार्ज किया तथा कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
पलामू
- पलामू में चंद्रिका प्रसाद वर्मा एवं सोनार सिंह खरवार ने नमक सत्याग्रह का नेतृत्व किया। इस आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी की गिरफ्तारी की खबर मिलने पर डाल्टनगंज एवं गढ़वा में 8 मई, 1930 को तथा लातेहार में 11 मई, 1930 को लोगों ने हड़ताल की।
- डाल्टनगंज में कांग्रेस का दफ्तर बंद करवाने में सरकार की मदद करने हेतु भोला नाथ सिंह नामक व्यक्ति को सरकार द्वारा ‘रायबहादुर’ की उपाधि दी गयी।
- यदुवंश सहाय के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान झारखण्ड में संपूर्ण किसान आंदोलन चलाया गया। (स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने संथाल परगना क्षेत्र में किसानों की दशा सुधारने के लिए आंदोलन चलाया। वे 1938 में संथाल परगना आए थे।)
संथाल परगना
- सविनय अवज्ञा आंदोलन में राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इसी क्रम में संथाल परगना में शैलबाला राय के नेतृत्व में महिलाओं ने इस आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी।
- संथाल परगना के कांग्रेसी नेता शशि भूषण राय को इस आंदोलन के सिलसिले में मुंगेर जाने के बाद वहाँ गिरफ्तार कर लिया गया।
अन्य तथ्य
- इस आंदोलन के दौरान झारखण्ड में चौकीदारी कर न देने हेतु आंदोलन चलाया गया, जिसका नेतृत्व निम्न लोगों ने किया
- जे. एल साव
- मथुरा सिह
- सीता राम दुबे
- सरस्वती देवी
- महादेव पाण्डेय
- चमन लाल
1935-39 के बीच झारखण्ड में प्रमुख गतिविधियाँ
- 1935 में पारित भारत शासन अधिनियम के अंतर्गत गवर्नरों को जनजातीय क्षेत्रों में बेहतर शासन प्रबंधन हेतु अधिक अधिकार प्रदान किये गये।
- 1936 ई. में उड़ीसा को बिहार-उड़ीसा संयुक्त प्रांत से अलग कर दिया गया तथा इसमें छोटानागपुर के कुछ हिस्से (जैसे – गांगपुर क्षेत्र आदि) को भी मिलाया गया।
- भारत शासन अधिनियम, 1935 के तहत जनवरी, 1937 में झारखण्ड में स्थित क्षेत्रीय विधायिका हेतु चुनाव कराये गये। इसमें आदिवासियों हेतु 6 सीट सुरक्षित थे। इस चुनाव में कांग्रेस, छोटानागपुर उन्नति समाज एवं किसान सभा ने भाग लिया, परंतु कांग्रेस के उम्मीदवारों की ही जीत हुई।
- इन चुनावों में इग्नेस बेक, बोनिफेस लकड़ा तथा देवेन्द्र प्रसाद सामंता (तीनों आदिवासी) को सामान्य सीटों पर विजय प्राप्त हुयी। इग्नेस बेक दिल्ली की संघीय विधायिका के जबकि बोनिफेस लकड़ा पटना की प्रांतीय विधानसभा के सदस्य बने।
- 30 मई, 1938 को रांची में छोटानागपुर उन्नति समाज की वार्षिक बैठक आयोजित हुयी, जिसमें छोटानागपुर उन्नति समाज के अलावा किसान सभा, छोटानागपुर कैथोलिक सभा, मुण्डा सभा एवं हो-मालतो मारंग सभा का एकीकरण करके छोटानागपुर-संथाल परगना आदिवासी सभा का गठन किया गया। 1939 में इस संगठन का नाम परिवर्तित करके छोटानागपुर आदिवासी सभा कर दिया गया। इस संस्था का गठन दिकुओं के खिलाफ संघर्ष करने तथा आदिवासियों के लिए पृथक राज्य की स्थापना के उद्देश्य के साथ किया गया था।
- 1939 ई. में गांगपुर क्षेत्र (1936 में इसे छोटानागपुर से उड़ीसा में शामिल कर लिया गया था) में भू-बंदोबस्त कानून व मालगुजारी बढ़ाने के खिलाफ निर्मल मुण्डा नामक आदिवासी के नेतृत्व में आंदोलन शुरू हो गया।
- निर्मल मुण्डा के नेतृत्व में 25 अप्रैल, 1939 को उड़ीसा के सुंदरगढ़ जिले के रायबोगा थानान्तर्गत आमको-सिमको गांव में आदिवासियों की एक विशाल जनसभा आयोजित की गयी। गांगपुर के पोलिटिकल एजेंट के आदेश पर ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों द्वारा इस जनसमूह पर जालियावाला बाग की तर्ज पर गोलियां चलाई गयी जिसमें लगभग 65 आदिवासियों की मौत हो गयी तथा 90 से अधिक लोग जख्मी हो गए। इस घटना को ‘सिमको हत्याकांड’ या ‘दूसरा जांलियावाला बाग हत्याकांड’ भी कहा जाता है। इस हत्याकांड के विरूद्ध छोटानागपुर में भी व्यापक प्रतिक्रिया हुयी।
