Updated on 21/05/26 by Maananjay MahatoShare on WhatsApp

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र: समस्याएँ एवं चुनौतियाँ

  • भारत में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME – Micro, Small and Medium Enterprises) क्षेत्र को देश की अर्थव्यवस्था की “रीढ़ की हड्डी” (Backbone of the Economy) कहा जाता है। यह क्षेत्र न केवल कृषि के बाद सबसे अधिक रोजगार पैदा करता है, बल्कि देश के कुल विनिर्माण (Manufacturing) और निर्यात (Exports) में भी बहुत बड़ी हिस्सेदारी रखता है।
  • औद्योगिक नीति सुधारों के क्रम में, MSME की परिभाषा से लेकर इसके संचालन के तरीकों में समय के साथ कई महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं।
  • 1. MSME की नई और वर्तमान परिभाषा (New Definition)
    • आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत सरकार ने 1 जुलाई 2020 से MSME की परिभाषा में ऐतिहासिक बदलाव किया। पुराने नियमों में ‘विनिर्माण’ (Manufacturing) और ‘सेवा’ (Service) क्षेत्रों के लिए अलग-अलग वित्तीय सीमाएं थीं, जिन्हें समाप्त करके अब दोनों को एक समान कर दिया गया है।
    • अब उद्योगों का वर्गीकरण “संयंत्र एवं मशीनरी में निवेश” (Investment in Plant & Machinery) और “वार्षिक टर्नओवर” (Annual Turnover) के संयुक्त आधार पर किया जाता है:
उद्यम का प्रकार निवेश की सीमा (Investment) वार्षिक टर्नओवर की सीमा (Turnover)
सूक्ष्म उद्यम (Micro) ₹1 करोड़ से कम ₹5 करोड़ से कम
लघु उद्यम (Small) ₹10 करोड़ से कम ₹50 करोड़ से कम
मध्यम उद्यम (Medium) ₹50 करोड़ से कम ₹250 करोड़ से कम
  • 2. भारतीय अर्थव्यवस्था में MSME का महत्व (Significance)- MSME क्षेत्र देश के समावेशी विकास (Inclusive Growth) के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है:
    • रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत: कृषि के बाद यह क्षेत्र भारत में लगभग 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है। यह बहुत कम पूंजी में बड़े पैमाने पर श्रम-प्रधान (Labour-Intensive) रोजगार पैदा करने की क्षमता रखता है।
    • जीडीपी और विनिर्माण में योगदान: भारत की कुल जीडीपी (GDP) में इस क्षेत्र का योगदान लगभग 30% है, जबकि देश के कुल विनिर्माण उत्पादन (Manufacturing Output) में इसकी हिस्सेदारी लगभग 45% है।
    • निर्यात (Exports) में बड़ी भूमिका: भारत से विदेशों में होने वाले कुल निर्यात में MSME क्षेत्र का योगदान लगभग 40% से 45% तक है।
    • ग्रामीण और क्षेत्रीय विकास: ये उद्योग देश के दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों में फैले हुए हैं, जिससे शहरों की ओर पलायन रुकता है और क्षेत्रीय आर्थिक असमानता कम होती है।
  • 3. MSME क्षेत्र के सामने मुख्य चुनौतियां (Challenges)- इतने महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद इस क्षेत्र को जमीन पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है:
    • औपचारिक लोन या पूंजी की कमी (Credit Crunch): अधिकांश छोटे उद्योगों के पास बैंकों को देने के लिए गारंटी (Collateral) नहीं होती, जिसके कारण उन्हें समय पर और सस्ता लोन नहीं मिल पाता। वे आज भी अनौपचारिक स्रोतों (साहूकारों) पर निर्भर हैं।
    • भुगतान में देरी (Delayed Payments): बड़ी कंपनियां और सरकारी विभाग छोटे वेंडर्स से सामान तो ले लेते हैं, लेकिन उनका भुगतान महीनों अटका कर रखते हैं। इससे MSME के पास वर्किंग कैपिटल (रोजमर्रा के खर्च की पूंजी) की भारी कमी हो जाती है।
    • तकनीकी पिछड़ापन: वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में भी कई लघु उद्योग आज पुरानी तकनीकों पर काम कर रहे हैं, जिससे उनके उत्पादों की गुणवत्ता और फिनिशिंग अंतरराष्ट्रीय स्तर की नहीं हो पाती।
    • कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव: स्टील, प्लास्टिक, और अन्य बुनियादी कच्चे माल की कीमतों में अचानक तेजी आने से इन छोटे उद्योगों का पूरा बजट और मुनाफा बिगड़ जाता है।
    • अनौपचारिकता और विनियामक दबाव: बड़ी संख्या में MSME अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं, जिसके कारण उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। साथ ही, कई तरह के सरकारी नियमों और कर अनुपालन का दबाव इन छोटे उद्यमों के लिए बोझिल साबित होता है।
    • अवसंरचनात्मक चुनौतियाँ: बिजली, पानी, परिवहन और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच का अभाव इनकी उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित करता है।
    • प्रौद्योगिकीय पिछड़ापन: अधिकांश MSMEs पारंपरिक तकनीकों पर निर्भर हैं, जिसके कारण उनकी दक्षता और उत्पाद की गुणवत्ता वैश्विक मानकों पर खरी नहीं उतर पाती। आधुनिक तकनीकों में निवेश की सीमित क्षमता एक प्रमुख चुनौती है।
    • बाजार पहुँच और विपणन: बड़े बाजारों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ने में इन उद्यमों को कठिनाई होती है। ब्रांडिंग और मार्केटिंग के सीमित संसाधन इनकी बाजार हिस्सेदारी को सीमित कर देते हैं।
    • कुशल श्रमशक्ति की कमी: प्रशिक्षित और कुशल कामगारों का पलायन बड़े उद्योगों की ओर होता है, जिससे MSMEs को सही प्रतिभा नहीं मिल पाती।
  • 4. सरकार द्वारा शुरू की गई प्रमुख योजनाएं (Government Initiatives)- सरकार ने इन चुनौतियों को दूर करने और MSME को डिजिटल व मजबूत बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं:
    • उद्यम पंजीकरण पोर्टल (Udyam Registration): MSME के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को पूरी तरह से पेपरलेस, मुफ़्त और डिजिटल कर दिया गया है। इसके जरिए मिलने वाला ‘उद्यम नंबर’ सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए जरूरी है।
    • मुद्रा योजना (PMMY): छोटे और नए व्यवसाय शुरू करने के लिए बिना किसी गारंटी के ₹10 लाख तक का लोन (शिशु, किशोर और तरुण श्रेणियों के तहत) दिया जाता है।
    • समाधान पोर्टल (MSME Samadhan): बड़ी कंपनियों या विभागों द्वारा भुगतान में देरी की शिकायत दर्ज कराने के लिए यह एक ऑनलाइन मंच है, जहां नियमानुसार 45 दिनों के भीतर भुगतान का प्रावधान है।
    • चैंपियंस पोर्टल (CHAMPIONS): यह छोटे उद्योगों की शिकायतों के निवारण, उनकी मदद करने और उन्हें नई तकनीकों व अवसरों से जोड़ने के लिए एक आधुनिक कंट्रोल रूम की तरह काम करता है।
    • RAMP योजना (Raising and Accelerating MSME Performance): विश्व बैंक की सहायता से शुरू की गई यह योजना MSME की कार्यक्षमता और बाजार तक उनकी पहुंच को बेहतर बनाने पर केंद्रित है।
  • निष्कर्ष: यदि भारत को अपनी जीडीपी को नई ऊंचाइयों पर ले जाना है और ‘मेक इन इंडिया’ को सफल बनाना है, तो MSME क्षेत्र को सशक्त करना सबसे पहली शर्त है। डिजिटल साक्षरता, आसान बैंकिंग लोन और समय पर भुगतान सुनिश्चित करके इन लघु उद्योगों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जा रहा है।

राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम लिमिटेड

  • राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम लिमिटेड (जिसका आधिकारिक नाम National Small Industries Corporation – NSIC है)
  • भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (MoMSME) के तहत एक अग्रणी आईएसओ (ISO) प्रमाणित मिनी-रत्न (Mini-Ratna) सार्वजनिक उपक्रम है।
  • इसकी स्थापना 1955 में देश में सूक्ष्म और लघु उद्योगों (MSMEs) के विकास को बढ़ावा देने, सहायता करने और उनके विपणन (Marketing) व परिचालन क्षमता को मजबूत करने के उद्देश्य से की गई थी।
  • नीतिगत और व्यावहारिक स्तर पर NSIC द्वारा छोटे व्यवसायों को दी जाने वाली मुख्य सहायता और इसकी कार्यप्रणाली का विवरण नीचे दिया गया है:
  • 1. NSIC के मुख्य कार्य और सहायता योजनाएं (Key Functions & Schemes)- एक छोटे व्यवसायी के लिए कच्चा माल खरीदने से लेकर अपना तैयार माल सरकारी विभागों में बेचने तक, NSIC हर कदम पर मदद करता है। इसके मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं:
  • क) विपणन सहायता (Marketing Assistance Scheme)
    • छोटे उद्योगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने उत्पाद को बाजार में बेचना होता है। इसके लिए NSIC दो तरह से मदद करता है:
    • सिंगल पॉइंट रजिस्ट्रेशन स्कीम (SPRS): इसके तहत रजिस्टर्ड MSMEs को सरकारी खरीद (Government Procurement) में विशेष लाभ मिलता है। उन्हें टेंडर फॉर्म मुफ्त मिलते हैं और बयाना राशि (EMD – Earnest Money Deposit) जमा करने से छूट मिलती है।
    • प्रदर्शनी और व्यापार मेले (Exhibitions): NSIC घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेलों का आयोजन करता है और उनमें भाग लेने के लिए MSMEs को वित्तीय सहायता (Stall Rent में सब्सिडी) देता है, जिससे उन्हें नए ग्राहक मिल सकें।
  • ख) कच्चे माल की सहायता (Raw Material Assistance – RMA) – छोटे व्यवसायों को भारी मात्रा में और सस्ते दाम पर कच्चा माल (जैसे- स्टील, एल्युमिनियम, कोयला, आदि) मिलने में दिक्कत होती है।
    • NSIC थोक प्रदाताओं से सीधे कच्चा माल लेता है और आर्थिक रूप से कमजोर MSMEs को आसान शर्तों पर साख (Credit Support) या नकद आधार पर कच्चा माल उपलब्ध कराता है। इससे उनकी वर्किंग कैपिटल की समस्या दूर होती है।
  • ग) तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण (Technical Support & Training)
    • देशभर में फैले अपने NSIC तकनीकी सेवा केंद्रों (NTSC) के माध्यम से यह संस्थान युवाओं और उद्यमियों को नए जमाने की तकनीकों (जैसे- CNC मशीनिंग, 3D प्रिंटिंग, रोबोटिक्स, सॉफ्टवेयर आदि) में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करता है।
  • घ) डिजिटल और इंफॉरमेशन सपोर्ट (B2B Web Portal)
    • NSIC अपना एक आधिकारिक MSME Global Mart (MSME Shopping Portal) चलाता है। यह एक B2B वेब पोर्टल है जो देश के छोटे उद्योगों को दुनिया भर के खरीदारों से सीधे डिजिटल माध्यम से जोड़ता है।
  • 2. भारतीय औद्योगिक विकास में NSIC का महत्व
    • एमएसएमई को प्रतिस्पर्धी बनाना: यह निगम छोटे विनिर्माताओं को बड़े कॉर्पोरेट और विदेशी उत्पादों के सामने टिकने के लिए वित्तीय, तकनीकी और बाजार संबंधी सुरक्षा कवच देता है।
    • आत्मनिर्भर भारत में भूमिका: ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियानों के तहत रक्षा उत्पादन, रेलवे और अन्य सरकारी क्षेत्रों में घरेलू MSMEs की भागीदारी बढ़ाने में NSIC एक नोडल एजेंसी की तरह काम कर रहा है।
    • ग्रामीण उद्यमों का सशक्तिकरण: जिला स्तर और औद्योगिक क्षेत्रों में अपनी पहुंच के कारण यह दूर-दराज के छोटे कारीगरों और उद्यमियों को भी मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने में सफल रहा है।
    • व्यवसायिक टिप (For Entrepreneurs): यदि आपका कोई सूक्ष्म या लघु उद्योग है, तो आपको NSIC के ‘सिंगल पॉइंट रजिस्ट्रेशन’ (SPRS) और ‘Raw Material Assistance’ योजना का लाभ जरूर उठाना चाहिए। यह आपको बिना किसी बड़ी सुरक्षा गारंटी के सरकारी निविदाओं (Tenders) में सीधे भाग लेने की शक्ति देता है।

मुख्य समितियां और उनके महत्वपूर्ण सुझाव

  • भारत में सूक्ष्म और लघु उद्योगों (Small Scale Industries – SSIs) के महत्व को देखते हुए, समय-समय पर सरकार द्वारा इनकी समस्याओं को समझने, परिभाषा तय करने और उनके वित्तीय व तकनीकी विकास के लिए कई महत्वपूर्ण समितियों का गठन किया गया है।
  • कार्वे समिति (Karve Committee)1955
  • महत्व: इसे ‘ग्राम और लघु उद्योग समिति’ (Village and Small Scale Industries Committee) भी कहा जाता है।मुख्य सिफारिश: इस समिति ने पहली बार सुझाव दिया कि ग्रामीण विकास और स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ाने के लिए लघु और कुटीर उद्योगों का विकास किया जाना चाहिए। इसी समिति की पृष्ठभूमि पर 1956 की औद्योगिक नीति में छोटे उद्योगों को विशेष संरक्षण दिया गया।
  • ख) नायक समिति (Nayak Committee) – 1991
  • महत्व: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा लघु उद्योगों को मिलने वाले बैंक लोन (Credit Support) की समीक्षा के लिए इसका गठन किया गया था।मुख्य सिफारिश: समिति ने सुझाव दिया कि बैंकों को छोटे उद्योगों की ‘वर्किंग कैपिटल’ (रोजमर्रा के खर्च की पूंजी) की जरूरतों को पूरा करने के लिए उनके कुल टर्नओवर का कम से कम 20% लोन के रूप में देना चाहिए। इसने जिला स्तर पर समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया।ग)
  • आबिद हुसैन समिति (Abid Hussain Committee) – 1997
  • महत्व: यह लघु उद्योगों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी सिफारिशें देने वाली समिति मानी जाती है।मुख्य सिफारिशें:इसने लघु उद्योगों के लिए उत्पादों के आरक्षण (Reservation Policy) को धीरे-धीरे समाप्त करने की वकालत की, ताकि वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो सकें।इसने लघु उद्योगों के विकास के लिए एक विशेष और समर्पित कानून बनाने का सुझाव दिया, जिसके परिणामस्वरूप आगे चलकर MSMED अधिनियम, 2006 पारित हुआ।
  • एस. पी. गुप्ता समिति (S. P. Gupta Committee) – 2000
  • महत्व: योजना आयोग (अब नीति आयोग) द्वारा लघु उद्योगों के रोजगार सृजन क्षमता का आकलन करने के लिए गठित।मुख्य सिफारिश: समिति ने लघु उद्योगों की वित्तीय सीमा (Investment Limit) को बढ़ाने और उनके लिए ₹2,500 करोड़ के एक विशेष विकास कोष (Development Fund) की स्थापना की सिफारिश की थी।
  • के. वी. कामथ समिति (K. V. Kamath Committee) – 2020
  • महत्व: कोविड-19 महामारी के दौरान एमएसएमई (MSME) और लघु उद्योगों पर आए वित्तीय संकट और लोन रीस्ट्रक्चरिंग (Loan Restructuring) के उपायों के लिए आरबीआई द्वारा गठित।मुख्य सिफारिश: इस समिति ने महामारी से प्रभावित छोटे उद्योगों के तनावग्रस्त ऋणों (Stressed Assets) को संभालने के लिए वित्तीय मापदंड तय किए, जिससे बैंकों द्वारा उन्हें आसानी से दोबारा लोन या राहत दी जा सके।
समिति का नाम गठन का वर्ष मुख्य कार्यक्षेत्र / फोकस
कार्वे समिति 1955 ग्रामीण एवं लघु उद्योगों का पहली बार व्यवस्थित विकास।
नायक समिति 1991 लघु उद्योगों को संस्थागत/बैंक ऋण उपलब्धता में सुधार।
आबिद हुसैन समिति 1997 आरक्षण नीति की समाप्ति और नए कानूनी ढांचे (MSME) की रूपरेखा।
एस. पी. गुप्ता समिति 2000 लघु उद्योगों के माध्यम से रोजगार के अवसरों में वृद्धि।
के. वी. कामथ समिति 2020 महामारी के दौरान छोटे उद्योगों के लिए वित्तीय राहत व लोन नियम।

 

JPSC MAINS PAPER 5/Chapter – 28