सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम
- सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (Public Sector Undertakings – PSUs) या जिन्हें केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (CPSEs) भी कहा जाता है, वे कंपनियां या सरकारी व्यावसायिक उपक्रम हैं जिनमें 51% या उससे अधिक की चुकता शेयर पूंजी (Paid-up Share Capital) सीधे केंद्र सरकार, किसी राज्य सरकार, या संयुक्त रूप से दोनों के पास होती है।
- स्वतंत्रता के बाद भारत ने जब ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ को चुना, तो देश के बुनियादी ढांचे (सड़क, बिजली, इस्पात, भारी मशीनरी) को खड़ा करने की मुख्य जिम्मेदारी इन्हीं सरकारी कंपनियों को सौंपी गई। पंडित नेहरू ने इन्हें “आधुनिक भारत के मंदिर” (Temples of Modern India) कहा था।
- 1. PSUs का वर्गीकरण: महारत्न, नवरत्न और मिनी-रत्न- सरकारी कंपनियों को वित्तीय स्वतंत्रता, टर्नओवर, शुद्ध लाभ (Net Profit) और वैश्विक स्तर पर विस्तार करने की छूट देने के उद्देश्य से सरकार ने इन्हें तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा है:
- क) महारत्न (Maharatna) कंपनियां
- यह दर्जा मूल रूप से 2010 में शुरू किया गया था।
- महारत्न दर्जा प्राप्त करने के मानदंड (Criteria)
- नवरत्न दर्जा: कंपनी को पहले से ही ‘नवरत्न’ का दर्जा प्राप्त होना चाहिए।
- शेयर बाजार में लिस्टिंग: कंपनी भारतीय शेयर बाजार (NSE/BSE) पर सूचीबद्ध होनी चाहिए और SEBI के नियमों के अनुसार न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता होनी चाहिए।
- वित्तीय क्षमता (पिछले 3 वर्षों का लगातार औसत):
- औसत वार्षिक शुद्ध लाभ (Net Profit After Tax) ₹5,000 करोड़ से अधिक होना चाहिए।
- औसत वार्षिक नेट वर्थ (Net Worth) ₹15,000 करोड़ से अधिक होनी चाहिए।
- औसत वार्षिक टर्नओवर (Turnover) ₹25,000 करोड़ से अधिक होना चाहिए।
- वैश्विक उपस्थिति: कंपनी का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण व्यापार या वैश्विक संचालन होना चाहिए।
- महारत्न कंपनियों को मिलने वाले लाभ (Benefits & Autonomy)- महारत्न का दर्जा मिलने के बाद इन कंपनियों को सरकार से विशेष वित्तीय अधिकार मिलते हैं:
- बड़ा निवेश अधिकार: ये कंपनियां सरकार की पूर्वानुमति के बिना किसी एक परियोजना (Project) में ₹5,000 करोड़ या अपनी कुल नेट वर्थ का 15% (दोनों में से जो भी कम हो) तक का निवेश खुद तय कर सकती हैं। (नवरत्न कंपनियों के लिए यह सीमा केवल ₹1,000 करोड़ होती है)।
- विलय और अधिग्रहण (M&A): ये कंपनियां भारत और विदेशों में तकनीकी संयुक्त उद्यम (Joint Ventures) या पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनियां बनाने और विलय करने के लिए स्वतंत्र होती हैं।
- ऋण जुटाना: ये बिना सरकारी मंजूरी के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों से पूंजी या ऋण जुटा सकती हैं।
- उदाहरण:
- वर्तमान में (वर्ष 2026 तक) भारत में कुल 14 महारत्न कंपनियां हैं।
- हाल ही में अक्टूबर 2024 में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को भारत की 14वीं महारत्न कंपनी का दर्जा दिया गया है।
- ख) नवरत्न (Navratna) कंपनियां
- यह दर्जा मूल रूप से 1997 में शुरू किया गया था।
- जैसे ही कोई नवरत्न कंपनी सरकार के तय मापदंडों से भी बड़ा टर्नओवर और मुनाफा हासिल कर लेती है, उसे प्रमोट करके ‘महारत्न’ का दर्जा दे दिया जाता है (जैसे हाल ही में अक्टूबर 2024 में HAL को नवरत्न से महारत्न बनाया गया था)।
- 1. नवरत्न दर्जा प्राप्त करने के कड़े मापदंड (Criteria)- किसी भी सरकारी कंपनी को नवरत्न का दर्जा हासिल करने के लिए निम्नलिखित दो मुख्य शर्तों को पूरा करना अनिवार्य है:
- मिनी-रत्न श्रेणी-1: कंपनी को पहले से ‘मिनी-रत्न श्रेणी-1’ (Miniratna Category-I) का दर्जा प्राप्त होना चाहिए और उसका ट्रैक रिकॉर्ड लगातार मुनाफे का होना चाहिए।
- 6 वित्तीय मापदंडों में 60 अंक: कंपनी को पिछले 3 वर्षों के प्रदर्शन के आधार पर निम्नलिखित 6 मुख्य मापदंडों (Key Performance Indicators) पर 100 में से कम से कम 60 अंक स्कोर करने होते हैं:
- शुद्ध लाभ बनाम नेट वर्थ (Net Profit to Net Worth)
- श्रम लागत बनाम कुल उत्पादन लागत (Manpower Cost to Total Cost of Production)
- मूल्यह्रास, ब्याज और कर से पहले लाभ बनाम निवेशित पूंजी (PBDIT to Capital Employed)
- ब्याज और कर से पहले लाभ बनाम कुल टर्नओवर (PBIT to Turnover)
- प्रति शेयर आय (Earning Per Share – EPS)
- अंतर-क्षेत्रीय प्रदर्शन (Inter-Sectoral Performance)
- 2. नवरत्न कंपनियों को मिलने वाले विशेष अधिकार व लाभ (Benefits)- नवरत्न का दर्जा मिलने के बाद कंपनियों को रोजमर्रा के फैसलों और निवेश के लिए सरकारी मंजूरी या मंत्रालयों के चक्कर नहीं काटने पड़ते:
- ₹1,000 करोड़ तक के निवेश की छूट: ये कंपनियां बिना किसी सरकारी मंजूरी या कैबिनेट की अनुमति के किसी एक प्रोजेक्ट में ₹1,000 करोड़ या अपनी कुल नेट वर्थ का 15% (दोनों में से जो भी कम हो) तक का निवेश स्वयं के फैसले पर कर सकती हैं।
- विदेशी निवेश और संयुक्त उद्यम: ये कंपनियां भारत के बाहर संयुक्त उद्यम (Joint Ventures) स्थापित करने, विदेशों में नए कार्यालय खोलने या तकनीकी सहयोग के लिए स्वतंत्र होती हैं।
- प्रशासनिक स्वतंत्रता: कंपनी के बोर्ड को संगठनात्मक पुनर्गठन (Restructuring), नई नियुक्तियों और कर्मचारियों की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजनाओं (VRS) पर खुद निर्णय लेने का अधिकार होता है।
- नवरत्न कंपनियों की सूची समय-समय पर बदलती रहती है क्योंकि बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियां ‘महारत्न’ की श्रेणी में चली जाती हैं और मिनी-रत्न कंपनियां अच्छा प्रदर्शन कर इसमें शामिल हो जाती हैं। देश की प्रमुख नवरत्न कंपनियों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- BEL (भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड) – रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र
- NBCC (एनबीसीसी इंडिया लिमिटेड) – सिविल कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर
- NMDC (राष्ट्रीय खनिज विकास निगम) – लौह अयस्क और खनिज खनन
- NALCO (नेशनल एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड) – एल्युमिनियम उत्पादन
- CONCOR (कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) – लॉजिस्टिक्स और परिवहन
- RINL (राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड – विशाखापत्तनम स्टील) – इस्पात निर्माण
- SJVN (सतलुज जल विद्युत निगम) – पनबिजली और नवीकरणीय ऊर्जा
- NFL (नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड) – उर्वरक और कृषि रसायन
- EIL (इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड) – इंजीनियरिंग और तकनीकी कंसल्टेंसी
- ग) मिनी-रत्न (Miniratna) कंपनियां
- इन्हें दो उप-श्रेणियों में बांटा गया है (श्रेणी-I और श्रेणी-II):
- श्रेणी-I (Category-I):
- पात्रता मापदंड (Criteria):
- कंपनी ने पिछले 3 वर्षों से लगातार लाभ कमाया हो
- तीन वर्षों में से कम से कम एक वर्ष उसका कर-पूर्व लाभ (Pre-tax Profit) ₹30 करोड़ या उससे अधिक रहा हो।
- इसके साथ ही कंपनी की नेट वर्थ (Net Worth) सकारात्मक (Positive) होनी चाहिए।
- वित्तीय अधिकार (Benefits):
- ये कंपनियां बिना किसी सरकारी या मंत्रालयी मंजूरी के किसी एक परियोजना (Project) में ₹500 करोड़ या अपनी कुल नेट वर्थ का 100% (दोनों में से जो भी कम हो) तक का निवेश स्वयं के फैसले पर कर सकती हैं।
- उदाहरण:
- NSIC (राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम)
- IRCTC (भारतीय रेलवे खानपान और पर्यटन निगम)
- कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड
- एचएमटी (HMT) इंटरनेशनल लिमिटेड।
- पात्रता मापदंड (Criteria):
- श्रेणी-II (Category-II):
- जो कंपनियां पिछले तीन वर्षों से लगातार लाभ कमा रही हैं
- उनकी नेटवर्थ सकारात्मक (Positive) है।
- (इसके लिए ₹30 करोड़ के न्यूनतम कर-पूर्व लाभ की शर्त अनिवार्य नहीं है)।
- ये कंपनियां बिना सरकारी अनुमति के किसी एक प्रोजेक्ट में ₹250 करोड़ या अपनी कुल नेट वर्थ का 50% (दोनों में से जो भी कम हो) तक का निवेश खुद तय कर सकती हैं।
- 2. भारतीय आर्थिक विकास में PSUs की भूमिका (Significance)
- मजबूत औद्योगिक आधार का निर्माण: निजी क्षेत्र के पास शुरुआती दौर में इतनी बड़ी पूंजी नहीं थी कि वे रिफाइनरी, बिजली स्टेशन या स्टील प्लांट लगा सकें। PSUs ने इस भारी बुनियादी ढांचे को तैयार किया।
- क्षेत्रीय संतुलन (Regional Balance): सरकार ने जानबूझकर देश के पिछड़े इलाकों में बड़े कारखाने लगाए (जैसे- भिलाई छत्तीसगढ़ में, राउरकेला ओडिशा में), जिससे उन राज्यों का आर्थिक और ढांचागत विकास हो सका।
- रोजगार सृजन: इन कंपनियों ने लाखों भारतीयों को सुरक्षित रोजगार दिया, साथ ही पिछड़े वर्गों (SC/ST/OBC) के लिए आरक्षण नीतियों को लागू कर सामाजिक न्याय में बड़ी भूमिका निभाई।
- 3. PSUs की मुख्य चुनौतियां और सरकार की नई नीति
- समय के साथ बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीच कई सरकारी कंपनियां कुछ बड़ी समस्याओं से घिर गईं:
- लालफीताशाही और राजनीतिक हस्तक्षेप: निर्णय लेने में देरी और अत्यधिक सरकारी नियंत्रण के कारण ये कंपनियां बाजार की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने लगीं।
- कार्यकुशलता की कमी: प्रतिस्पर्धा की कमी के कारण कई कंपनियां (जैसे एयर इंडिया, बीएसएनएल) भारी घाटे में चली गईं।
- सरकार का नया दृष्टिकोण: विनिवेश और निजीकरण (Disinvestment)
- 1991 के बाद से और विशेष रूप से वर्तमान राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (NMP) और नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति के तहत सरकार ने एक स्पष्ट रुख अपनाया है:
- रणनीतिक क्षेत्र (Strategic Sectors): जैसे परमाणु ऊर्जा, रक्षा, परिवहन और दूरसंचार। इन क्षेत्रों में सरकार अपनी न्यूनतम उपस्थिति (कम से कम एक कंपनी) बनाए रखेगी, बाकी को निजीकृत या समाहित किया जाएगा।
- गैर-रणनीतिक क्षेत्र (Non-Strategic Sectors): इस श्रेणी के सभी सार्वजनिक उपक्रमों का या तो पूरी तरह से निजीकरण (Privatization) कर दिया जाएगा या उन्हें पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा (जैसे पूर्व में एयर इंडिया का निजीकरण टाटा समूह को सौंपकर किया गया था)।
- निष्कर्ष: आज के दौर में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की भूमिका बदल रही है। सरकार अब “बिजनेस चलाना सरकार का काम नहीं है” (Government has no business to be in business) के सिद्धांत पर काम कर रही है। मजबूत और मुनाफा कमाने वाले PSUs (जैसे महारत्न और नवरत्न) को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जा रहा है, जबकि अक्षम और घाटे वाले उपक्रमों से सरकारी पूंजी निकालकर उसे देश के बुनियादी सामाजिक ढांचे (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य) में लगाया जा रहा है।
उदारीकरण के बाद के दौर में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (PSUs) की भूमिका में परिवर्तन
1991 के आर्थिक सुधारों से पहले, भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (Public Sector Undertakings – PSUs) ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ मॉडल के प्रमुख अंग थे। इन्हें “कमांडिंग हाइट्स” (आधारभूत और रणनीतिक उद्योगों पर नियंत्रण) की नीति के तहत प्राथमिकता दी गई थी। 1991 के बाद, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के नए युग में PSUs की भूमिका में महत्वपूर्ण बदलाव आया:
- प्रतिस्पर्धी बाजार में खिलाड़ी: PSUs को अब एक संरक्षित वातावरण नहीं मिला। उन्हें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निजी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी। इसने उन्हें अधिक दक्षतापूर्ण, लाभप्रद और ग्राहक-केंद्रित बनने के लिए मजबूर किया।
- आर्थिक स्थिरता का स्तंभ: रणनीतिक क्षेत्रों जैसे ऊर्जा, रक्षा, कोयला और दूरसंचार में PSUs का महत्व बना रहा। उन्होंने देश की ऊर्जा सुरक्षा और अवसंरचना विकास सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- राजस्व सृजन और लाभांश: कई लाभकारी PSUs सरकार के लिए राजस्व का एक स्थिर स्रोत बने हुए हैं, जो वित्तीय समावेशन और सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए धन जुटाने में मदद करते हैं।
- सामाजिक दायित्वों का निर्वहन: PSUs अब भी दूरदराज के इलाकों में विकासात्मक परियोजनाओं, CSR ( cooperate social responsibility) गतिविधियों और राष्ट्रीय महत्व के प्रोजेक्ट्स को चलाने में अग्रणी हैं।
सार्वजनिक उद्यमों का विनिवेश और निजीकरण: अर्थ, उद्देश्य और बहस
1991 के संकट के बाद, सार्वजनिक उद्यमों में सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री (विनिवेश) और उनका पूर्ण निजीकरण सरकार की एक प्रमुख नीति बन गई।
विनिवेश (Disinvestment) और निजीकरण (Privatization) में अंतर:
- विनिवेश: इसमें सरकार PSUs में अपनी कुछ हिस्सेदारी (शेयर) बेचती है, लेकिन प्रबंधनिक नियंत्रण उसके पास बना रह सकता है। उदाहरण: 5% या 10% शेयरों की बिक्री।
- निजीकरण: इसमें सरकार PSU में अपनी 51% से अधिक हिस्सेदारी बेच देती है, जिससे प्रबंधन और नियंत्रण पूरी तरह से निजी हाथों में चला जाता है। उदाहरण: VSNL, BALCO, Air India का निजीकरण।
विनिवेश/NITI के प्रमुख उद्देश्य:
- सरकारी राजस्व बढ़ाना और राजकोषीय घाटे को कम करना।
- PSUs की दक्षता, पेशेवर प्रबंधन और प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार लाना।
- आर्थिक गतिविधियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी और निवेश को बढ़ावा देना।
- सार्वजनिक संसाधनों को केवल रणनीतिक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में केंद्रित करना।
विनिवेश नीति पर बहस:
समर्थन में तर्क:
- निजी प्रबंधन से दक्षता, नवाचार और लाभप्रदता बढ़ती है।
- सरकार बेचे गए शेयरों से प्राप्त धन को स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे सामाजिक क्षेत्रों में निवेश कर सकती है।
- यह बाजार अनुशासन लाता है और भ्रष्टाचार तथा नौकरशाही को कम करता है।
विरोध में तर्क:
- इससे ‘राष्ट्रीय संपत्ति’ की कम कीमत पर बिक्री होने और ‘पूंजीपतियों’ को लाभ होने का खतरा रहता है।
- रोजगार सुरक्षा को खतरा हो सकता है और सेवा शर्तें खराब हो सकती हैं।
- लाभ का मकसद सामाजिक कल्याण (जैसे ग्रामीण इलाकों में सस्ती बिजली) से ऊपर हो सकता है।
- रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों (जैसे रक्षा, ऊर्जा) पर विदेशी स्वामित्व की आशंका हो सकती है।
निष्कर्षतः, भारत का आर्थिक सफर MSMEs के विकास, PSUs की बदलती भूमिका और एक संतुलित विनिवेश नीति के बीच तालमेल बिठाने की चुनौती को दर्शाता है। एक मजबूत MSME क्षेत्र उद्यमशीलता को बढ़ावा देता है, जबकि सुशासन और दक्षता पर जोर देने वाली एक सुविचारित विनिवेश नीति PSUs को वैश्विक दिग्गज बनने में मदद कर सकती है, जो भारत को एक $5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य की ओर ले जाती है।
